ट्रंप टैरिफ के एक साल पूरे, 'ट्रेड वॉर' में अमेरिका पर भारी पड़ा भारत! अपनी शर्तों पर कराया समझौता

2 अप्रैल 2025 को जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी नई व्यापार नीति को ‘लिबरेशन डे’ का नाम देते हुए दुनिया के कई देशों पर भारी टैरिफ लगाने का ऐलान किया, तब इसका सीधा असर भारत पर भी पड़ा.

One year of Trump tariffs India overshadows America in trade war
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Trump Tariff: 2 अप्रैल 2025 को जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी नई व्यापार नीति को ‘लिबरेशन डे’ का नाम देते हुए दुनिया के कई देशों पर भारी टैरिफ लगाने का ऐलान किया, तब इसका सीधा असर भारत पर भी पड़ा. भारतीय उत्पादों पर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क ने शुरुआत में उद्योग और निर्यात क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी.

लेकिन बीते एक साल की घटनाएं यह दिखाती हैं कि भारत ने इस दबाव का सामना न सिर्फ मजबूती से किया, बल्कि कूटनीति, रणनीति और आर्थिक सुधारों के जरिए खुद को और मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया.

शुरुआत: अचानक टैरिफ से लगा झटका

ट्रंप प्रशासन ने भारतीय उत्पादों पर करीब 26% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया था. इसका असर खासतौर पर टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और केमिकल सेक्टर पर पड़ा. यह कदम भारत के निर्यात के लिए एक बड़ा झटका माना गया.

हालांकि, भारत ने जल्दबाजी में कोई प्रतिक्रिया देने के बजाय धैर्य और रणनीति का रास्ता अपनाया. नई दिल्ली ने साफ कर दिया कि कृषि, डेयरी और आईटी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा.

कूटनीतिक मोर्चे पर सख्त रुख

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के नेतृत्व में दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत हुई. अमेरिका ने टैरिफ लागू करने में 90 दिनों की राहत दी, लेकिन भारत अपने रुख पर कायम रहा.

इस दौरान भारत ने यह संकेत दिया कि वह दबाव में आकर अपने दीर्घकालिक हितों से समझौता नहीं करेगा.

तनाव चरम पर, टैरिफ 50% तक पहुंचा

अगस्त 2025 तक स्थिति और गंभीर हो गई. अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ बढ़ाकर करीब 50% तक कर दिया. इसमें रूसी तेल खरीदने को लेकर लगाया गया 25% अतिरिक्त शुल्क भी शामिल था.

इसका असर खासतौर पर MSME सेक्टर पर पड़ा. निर्यात धीमा हुआ और व्यापारियों की लागत बढ़ गई. साथ ही, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण शिपिंग लागत भी बढ़ गई, जिससे स्थिति और कठिन हो गई.

भारत का जवाब: आर्थिक और नीतिगत कदम

इस चुनौतीपूर्ण दौर में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने बड़ा कदम उठाते हुए निर्यात ऋण (Export Credit) की अवधि 450 दिनों तक बढ़ा दी, जिससे निर्यातकों को राहत मिली.

इसके साथ ही ‘GST 2.0’ जैसे सुधारों ने घरेलू मांग को बढ़ावा दिया. स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) की कंपनियों को अतिरिक्त उत्पादन घरेलू बाजार में कम शुल्क पर बेचने की अनुमति दी गई.

इन कदमों ने यह साबित किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था दबाव में भी लचीली और मजबूत बनी रह सकती है.

वैश्विक स्तर पर रणनीतिक विस्तार

अमेरिका के दबाव के बीच भारत ने अपनी रणनीति को और व्यापक बनाया. उसने निर्यात के लिए नए बाजार तलाशने शुरू किए, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम हो सके.

जुलाई 2025 में ब्रिटेन के साथ एक बड़ा मुक्त व्यापार समझौता (CETA) हुआ, जिससे भारत के लगभग 99% उत्पादों को ड्यूटी-फ्री पहुंच मिली. इसके बाद जनवरी 2026 में यूरोपीय संघ (EU) के साथ भी व्यापार समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया.

इन समझौतों ने अमेरिका को यह संकेत दिया कि भारत के पास वैश्विक स्तर पर कई विकल्प मौजूद हैं.

अंततः समझौता और टैरिफ में राहत

लगातार बातचीत और दबाव के बीच 2 फरवरी 2026 को अमेरिका को अपने रुख में बदलाव करना पड़ा. नए समझौते के तहत भारतीय उत्पादों पर टैरिफ 25% से घटाकर 18% कर दिया गया. साथ ही रूसी तेल से जुड़ा 25% अतिरिक्त शुल्क भी पूरी तरह हटा लिया गया.

यह भारत की कूटनीतिक जीत के रूप में देखा गया, जहां उसने अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए समझौता हासिल किया.

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

इसी दौरान एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया. फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के कई टैरिफ फैसलों को विश्व व्यापार नियमों के खिलाफ बताते हुए अवैध करार दिया.

इस फैसले के बाद वैश्विक व्यापार पर अमेरिका की स्थिति कमजोर होती दिखाई दी. भारत ने भी इस बदलते परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए अपनी आगामी अमेरिका यात्रा टाल दी, ताकि नए हालात में बेहतर शर्तों पर बातचीत की जा सके.

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