Nuclear Espionage: भारत की राजधानी दिल्ली एक बार फिर जासूसी के सनसनीखेज मामले से दहल गई है. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 59 वर्षीय मोहम्मद आदिल हुसैनी नामक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है, जिसने खुद को भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) का वैज्ञानिक बताकर विदेशी एजेंसियों से संपर्क साधा था.
पुलिस के अनुसार, आदिल और उसका भाई अख्तर हुसैनी संवेदनशील परमाणु जानकारियां विदेशों में बेचने की साजिश रच रहे थे. यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित पाकिस्तान के परमाणु जासूस अब्दुल कादिर खान (A.Q. Khan) की याद दिलाता है, जिसने 1970-80 के दशक में परमाणु तकनीक की चोरी कर कई देशों को हथियार बनाने में मदद की थी.
सीमापुरी से गिरफ्तारी, फर्जी पहचान और परमाणु ब्लूप्रिंट
दिल्ली पुलिस ने 26 अक्टूबर को आदिल को सीमापुरी इलाके से पकड़ा. झारखंड के जमशेदपुर का रहने वाला यह शख्स सैयद आदिल हुसैन और नसीमुद्दीन जैसे कई नामों से पहचान बदलकर रह रहा था. उसके पास से पुलिस ने एक असली और दो फर्जी पासपोर्ट, BARC के नकली पहचान पत्र और संवेदनशील परमाणु नक्शे बरामद किए हैं.
पुलिस पूछताछ में आदिल ने कबूल किया कि उसने एक रूसी वैज्ञानिक से परमाणु डिजाइन खरीदी थी और उसे भारी रकम में ईरान की एटॉमिक एनर्जी ऑर्गेनाइजेशन (AEOI) को बेचा. इस पैसे से उसने दुबई में संपत्ति खरीदी और खुद को BARC वैज्ञानिक के रूप में पेश करना शुरू किया. हालांकि, वह असली परमाणु केंद्र में कभी प्रवेश नहीं कर सका.
एक्यू खान की छाया में नया ‘परमाणु व्यापारी’
आदिल की करतूतें पाकिस्तान के अब्दुल कादिर खान की गतिविधियों से काफी मिलती-जुलती हैं. खान को पाकिस्तान का ‘परमाणु बम का जनक’ कहा जाता है, लेकिन हकीकत में वह परमाणु तकनीक का अंतरराष्ट्रीय तस्कर था. 1970 के दशक में नीदरलैंड की URINCO कंपनी में काम करते हुए उसने गैस सेंट्रीफ्यूज तकनीक के ब्लूप्रिंट चुरा लिए और पाकिस्तान को परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ाया.
बाद में उसने ईरान, उत्तर कोरिया और लीबिया जैसे देशों को यह तकनीक बेची. उसने ईरान को सेंट्रीफ्यूज डिजाइन, उत्तर कोरिया को यूरेनियम संवर्धन तकनीक, और लीबिया को पूरा ‘परमाणु किट’ लगभग 100 मिलियन डॉलर में दिया. 2004 में अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद पाकिस्तान ने खान को नजरबंद किया, हालांकि यह अब भी सवाल बना हुआ है कि क्या सरकार वास्तव में उसकी गतिविधियों से अनजान थी.
आदिल और खान में चौंकाने वाली समानताएं
दोनों मामलों में एक अजीब समानता है, तकनीक की चोरी और परमाणु रहस्यों की दलाली. फर्क सिर्फ इतना है कि एक्यू खान असली वैज्ञानिक था, जिसने अपने ज्ञान का दुरुपयोग किया, जबकि आदिल हुसैनी ने झूठ का जाल बुनकर खुद को वैज्ञानिक साबित करने की कोशिश की. दोनों का मकसद एक ही था, गोपनीय परमाणु जानकारियों को बेचकर पैसा कमाना. और दोनों के धागे किसी न किसी रूप में ईरान और पाकिस्तान से जाकर जुड़ते हैं.
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