उसकी सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी... हिंद महासागर को लेकर NSA अजीत डोभाल का बड़ा बयान, जानें क्या हैं इसके मायने

    Ajit Doval Indian Ocean: कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का बयान, “समुद्र हमारी सबसे बड़ी विरासत है और उसकी सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी”, दरअसल भारत की नई समुद्री रणनीति का सीधा संकेत है.

    NSA Ajit Doval big statement regarding Indian Ocean know its meaning
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    Ajit Doval Indian Ocean: कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का बयान, “समुद्र हमारी सबसे बड़ी विरासत है और उसकी सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी”, दरअसल भारत की नई समुद्री रणनीति का सीधा संकेत है. यह टिप्पणी सिर्फ नौसैनिक मुद्दों तक सीमित नहीं, बल्कि भू-रणनीतिक नेतृत्व, क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन और भारत की व्यापक सुरक्षा रणनीति को दर्शाती है. यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत के आसपास की समुद्री राजनीति तेजी से बदल रही है, और चीन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है.

    विश्व राजनीति आज एक ही बड़े प्रश्न पर टिकी है कि 2050 तक अमेरिका और चीन के बीच कौन आगे निकल जाएगा. चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका के मुकाबले तेजी से बढ़ रही है और अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले कुछ दशकों में वह ट्रिलियन डॉलर के अंतर से अमेरिका को पीछे छोड़ सकता है. ऐसे वैश्विक परिदृश्य में भारत तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है. यह शक्ति-संतुलन केवल जमीन पर नहीं, बल्कि समुद्र पर तय होगा, क्योंकि एशिया का वास्तविक आर्थिक और रणनीतिक खेल समुद्री मार्गों पर निर्भर करता है.

    चीन की समुद्री रणनीति और भारत की प्रतिक्रिया

    भारत अच्छी तरह समझता है कि चीन की पूरी आर्थिक और सैन्य महत्वाकांक्षा समुद्री रूट्स पर आधारित है. चीन के 80% से अधिक व्यापारिक जहाज और 60% ऊर्जा सप्लाई हिंद महासागर के रास्ते से गुजरते हैं. यदि इन मार्गों को खतरा पहुंचा, तो चीन की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी. यही चीन की कमजोर कड़ी है और यही भारत के लिए रणनीतिक अवसर.

    चीन वर्षों से हिंद महासागर में स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स रणनीति के तहत प्रभाव बढ़ा रहा है, चिटगांव, सिटवे, हम्बनटोटा और ग्वादर जैसे पोर्ट्स के जरिए वह भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है. इन पोर्ट्स का नेटवर्क चीन को सीधे भारत की समुद्री सीमा तक पहुंच देता है, जिससे नई रणनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है.

    डोभाल का संदेश: हिंद महासागर में भारत का नेतृत्व

    CSC की बैठक में डोभाल ने जिस तरह सेफ्टी, सिक्योरिटी और स्टेबिलिटी की बात की, वह स्पष्ट संकेत है कि भारत अब हिंद महासागर क्षेत्र में नेतृत्व करना चाहता है. इस कॉन्क्लेव में भारत के साथ श्रीलंका, मालदीव, मॉरीशस और अब सेशेल्स शामिल हैं, ये सभी देश हिंद महासागर के प्रवेश द्वार नियंत्रित करते हैं. बांग्लादेश और पाकिस्तान ऑब्जर्वर भूमिका में हैं. ऐसे में डोभाल का समुद्र-संबंधी बयान भारत की भविष्य की रणनीति का केंद्र दिखाता है.

    रूस की दिलचस्पी और समुद्री समीकरण

    दो दिन पहले रूस के मैरिटाइम सिक्योरिटी हेड का डोभाल से मिलना साधारण घटना नहीं थी. रूस जानता है कि चीन का नया फोकस इंडो-पैसिफिक पर है और अमेरिका पहले से इस क्षेत्र में सक्रिय है. इसलिए रूस के लिए भारत एक निर्णायक बैलेंस-मेकर के रूप में उभर रहा है. यह मुलाकात संकेत देती है कि समुद्री सुरक्षा भविष्य की विश्व राजनीति का मुख्य अक्ष बनने जा रही है और भारत उसके केंद्र में है.

    भारत की Sea Power बनने की आवश्यकता

    भारत का समुद्री शक्ति बनने का लक्ष्य स्पष्ट है. हिंद महासागर दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री कॉरिडोर है, और उसकी धुरी भारत है. मलक्का स्ट्रेट, जहां से चीन का व्यापार गुजरता है, और होर्मूज व बाब-अल-मंडेब जैसे तेल मार्ग, इन सभी पर भारत का भौगोलिक प्रभाव निर्णायक है. यह रणनीतिक लाभ चीन की आर्थिक गति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है.

    भारत यह भी जानता है कि चीन की असली कमजोरी समुद्र में है. उसके लिए समुद्री रूट्स बंद होना किसी भी युद्ध या तनाव से बड़ा खतरा है. इसलिए भारत समुद्र में अपनी सैन्य और रणनीतिक उपस्थिति मजबूत कर रहा है. इसी बीच भारतीय नौसेना आत्मनिर्भर योजनाओं के तहत आधुनिक जहाज, पनडुब्बियाँ और मिसाइल प्रणालियाँ तेजी से विकसित कर रही है.

    इन कारणों से फिलीपींस, वियतनाम, जापान, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश, जो चीन के विस्तारवादी रवैये से परेशान हैं, भारत की ओर नए सहयोगी के रूप में देख रहे हैं. भारत इन देशों के साथ समुद्री प्रशिक्षण, सैन्य सहयोग, निवेश और सुरक्षा समझौते बढ़ा रहा है.

    चीन की बेचैनी बढ़ी

    भारत जिस गति से साउथ चाइना सी के देशों के साथ साझेदारी मजबूत कर रहा है, वह बीजिंग के लिए चिंता का विषय है. चीन अपनी नौसेना पर भारी निवेश कर रहा है, उसके जहाजों और पनडुब्बियों की संख्या दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही है. इसके बावजूद भारत की समन्वित समुद्री रणनीति चीन को असहज कर रही है, क्योंकि भारत उस क्षेत्र में कदम बढ़ा चुका है जिसे चीन अपना पिछवाड़ा समझता था.

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