काठमांडू: नेपाल की बालेन शाह सरकार ने भोटेकोशी में आई भीषण बाढ़ के बाद भारत, चीन समेत कई देशों से मिले खोज और बचाव दल भेजने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है. इन देशों ने हेलीकॉप्टर और प्रशिक्षित टीमें भेजने की पेशकश की थी. नेपाल का कहना है कि उसकी अपनी सुरक्षा एजेंसियां बचाव अभियान चलाने में सक्षम हैं. वहीं, लापता विदेशी नागरिकों की जानकारी के लिए एक केंद्रीय व्यवस्था बनाई गई है.
नेपाल राहत सामग्री और आर्थिक मदद स्वीकार कर रहा है, लेकिन विदेशी रेस्क्यू टीमों को अनुमति नहीं दे रहा है. भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश ने मदद की पेशकश की थी.
भारत ने भेजी राहत सामग्री
भारत ने नेपाल को पहले 10 टन मानवीय सहायता भेजी. इसके बाद सी-130जे और सी-17 विमानों से 37.5 टन और राहत सामग्री भेजी गई. इसमें अस्थायी शेल्टर, कंबल, दवाएं, सोलर लैंप और खाने के पैकेट शामिल थे. भारत ने बाढ़ में टूटे पुलों के लिए बेली और प्री-फैब्रिकेटेड ट्रस ब्रिज देने की भी पेशकश की है.
विदेशी टीमों की जगह अपना सिस्टम
नेपाल के अधिकारियों के मुताबिक, कई विदेशी बचाव टीमों के आने से उनके बीच तालमेल और आवाजाही को संभालना मुश्किल हो सकता था. बाढ़ के बाद एयरपोर्ट, सड़क और संचार व्यवस्था पहले से दबाव में है. इसलिए नेपाल अपनी सुरक्षा एजेंसियों के जरिए बचाव अभियान चलाना चाहता है.
नेपाल ने विदेशी मदद को व्यवस्थित करने के लिए ‘वन डोर सिस्टम’ भी बनाया है. इसके तहत आर्थिक सहायता प्रधानमंत्री राहत कोष के जरिए लेने को कहा गया है. इसका मकसद मदद को एक जगह जुटाना और जरूरत के हिसाब से सही जगह पहुंचाना है.
2015 में भारत ने चलाया था ऑपरेशन मैत्री
2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने नेपाल में बड़े स्तर पर राहत और बचाव अभियान चलाया था. ‘ऑपरेशन मैत्री’ के तहत भारतीय वायु सेना, एनडीआरएफ, मेडिकल टीम और इंजीनियरों को नेपाल भेजा गया था. भारत ने फंसे लोगों को निकालने और राहत सामग्री पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी.
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