Blood Moon 2025: 8 सितंबर की रात, आकाश में एक दुर्लभ खगोलीय घटना ने विज्ञान प्रेमियों और आम लोगों दोनों को मंत्रमुग्ध कर दिया. यह था पूर्ण चंद्रग्रहण, जो न केवल अपनी अवधि के कारण खास था, बल्कि इसलिए भी कि इस दौरान चंद्रमा ने लालिमा ओढ़ ली, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ब्लड मून कहा जाता है.
करीब 82 मिनट तक पूर्ण ग्रहण का यह चरण चला, और इस दौरान चंद्रमा ने गहरे तांबे जैसे रंग में बदलकर आकाश में अद्भुत दृश्य रच दिया. यह घटना न केवल एशिया, बल्कि यूरोप, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया तक दिखाई दी, जिससे यह एक वैश्विक खगोलीय तमाशा बन गया.
चंद्रग्रहण: कैसे और क्यों बनता है ‘ब्लड मून’?
चंद्रग्रहण तब होता है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है, जिससे सूर्य का प्रकाश चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाता. परंतु पूर्ण अंधकार नहीं होता, पृथ्वी के वायुमंडल से छनकर सूर्य की लाल और नारंगी किरणें चंद्रमा पर पड़ती हैं, और वह लाल रंग में चमकने लगता है. यही वजह है कि इसे 'ब्लड मून' कहा जाता है.
भारत में दिखा पूरा ग्रहण, देर रात तक रहा दृश्य
भारत के लगभग हर हिस्से में यह खगोलीय दृश्य नज़र आया. हालांकि कुछ क्षेत्रों में बादलों ने रुकावट डाली, फिर भी दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में लोगों ने इस अद्भुत नज़ारे का आनंद लिया.
विशेषज्ञों के अनुसार, रात्रि में करीब 9:30 बजे के बाद चंद्रमा धीरे-धीरे ग्रहण की छाया में गया और करीब 11:00 बजे वह पूर्णतः लाल दिखाई देने लगा, यह अवस्था 82 मिनट तक बनी रही.
दुनियाभर में दिखा खगोलीय तमाशा
भारत के साथ-साथ यह चंद्रग्रहण टोक्यो, लंदन, पेरिस, सिडनी, बैंकॉक, बीजिंग, रोम जैसे शहरों में भी शानदार तरीके से देखा गया. अनुमान है कि करीब 70 लाख से अधिक लोगों ने इस दृश्य को लाइव देखा, चाहे वह नंगी आंखों से हो या दूरबीन की मदद से.
बिना सुरक्षा उपकरण के भी सुरक्षित था देखना
सूर्यग्रहण के विपरीत, चंद्रग्रहण को देखने के लिए किसी सुरक्षात्मक चश्मे की जरूरत नहीं होती. लोग खुले आसमान के नीचे, बिना किसी उपकरण के, इस प्राकृतिक घटना का भरपूर आनंद ले सकते हैं.
आख़िर क्यों ख़ास है ये ग्रहण?
इतने लंबे समय तक चलने वाला पूर्ण चंद्रग्रहण दशक में बहुत कम बार देखने को मिलता है. यह केवल एक रोमांचक खगोलीय घटना ही नहीं, बल्कि हमें यह भी याद दिलाता है कि हम ब्रह्मांड की एक बेहद अनूठी प्रणाली का हिस्सा हैं.
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