रेटिंग: ⭐⭐½/5
DAAYRA REVIEW: मेघना गुलज़ार की DAAYRA एक गंभीर क्राइम-थ्रिलर है, जो न्याय, सिस्टम और जवाबदेही जैसे संवेदनशील मुद्दों को सामने रखती है. करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन जैसे मजबूत कलाकारों के बावजूद फिल्म का असर हर जगह उतना प्रभावी नहीं रह पाता, जितना इसकी कहानी से उम्मीद बनती है.फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष इसका दूसरा हाफ और क्लाइमेक्स है. शुरुआत में कहानी जिस तरह माहौल बनाती है, उसके बाद स्क्रीनप्ले उस तनाव को लगातार बनाए रखने में संघर्ष करता है. 2 घंटे 23 मिनट की फिल्म में कई हिस्से ऐसे लगते हैं जहां कहानी को और टाइट किया जा सकता था.
STARCAST
फिल्म की कमान करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन के हाथों में है. दोनों पुलिस अधिकारियों की भूमिका में नजर आते हैं. सपोर्टिंग कास्ट में जितेंद्र जोशी, क्शिती जोग, अचिंत कौर, कनवलजीत सिंह समेत कई कलाकार हैं.स्टारकास्ट फिल्म की ताकत जरूर है, लेकिन इतनी मजबूत कास्ट के बावजूद स्क्रीनप्ले उन्हें उस स्तर की सिनेमाई ऊंचाई नहीं दे पाता जिसकी उम्मीद की जाती है.
फिल्म की कहानी DCP रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन) और DCP अजूनी कोहली (करीना कपूर खान) के इर्द-गिर्द घूमती है. रमन और उसकी टीम पर एक युवती के रेप और मर्डर के आरोपियों को एनकाउंटर में मारने का मामला है. अब इस केस की जांच अजूनी को सौंपी जाती है. यहीं से फिल्म का असली खेल शुरू होता है. फिल्म कई रियल इंसीडेंट्स से प्रेरणा लेते हुए अपनी कहानी बनाती है. 2012 के निर्भया केस के बाद कानून और रेप के मामलों में हुई बहस भी कहानी में आते हैं .लेकिन अच्छी बात ये है कि फिल्म सिर्फ उस घटना को दोहराने के बजाय देरी से मिलने वाले इंसाफ और पुलिस की जिम्मेदारी जैसे सवालों को कहानी का हिस्सा बनाती है.
ACTING
करीना कपूर खान का काम फिल्म के मजबूत हिस्सों में शामिल है. उनका किरदार नियंत्रित और गंभीर अंदाज में दिखाई देता है. पृथ्वीराज सुकुमारन भी अपने किरदार में गंभीरता लेकर आते हैं.लेकिन समस्या एक्टिंग से ज्यादा किरदारों की लिखावट में दिखाई देती है. कुछ जगहों पर किरदारों की भावनात्मक जटिलता को और गहराई दी जा सकती थी.फिल्म का पहला हाफ सबसे मजबूत हिस्सा है. अजूनी की जांच, रमन का नजरिया और दोनों के बीच बढ़ता टकराव आपको कहानी में बनाए रखता है.शुरुआती हिस्से में जो सवाल खड़े किए जाते हैं, उनसे उम्मीद होती है कि फिल्म आगे जाकर इंसाफ और कानून की पूरी बहस को और गहराई से खोलेगी.
लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म कुछ हद तक एक्शन और घटनाओं के नतीजों पर ज्यादा चली जाती है. अपराधियों की तलाश और आगे की घटनाओं को स्क्रीनप्ले थोड़ा सुविधाजनक तरीके से समेटता है. जिस सिस्टम और कानूनी प्रक्रिया की गहराई पहले हाफ में महसूस होती है, दूसरे हाफ में उस पर उतना फोकस नहीं रहता. यहीं फिल्म थोड़ी अपनी शुरुआती धार खोती है. पहला हाफ जबरदस्त तरीके से माहौल बनाता है, करीना और पृथ्वीराज उसे पूरी ताकत देते हैं, जबकि दूसरे हाफ में कहानी थोड़ी सीधी हो जाती है. सपोर्टिंग कास्ट अच्छा साथ देती है और जितेंद्र जोशी तथा कुछ अन्य कलाकार अपने छोटे-छोटे हिस्सों में प्रभाव छोड़ते हैं.
STORY & SCREENPLAY
यहीं फिल्म सबसे ज्यादा कमजोर पड़ती है.फिल्म का बेसिक आइडिया गंभीर और दिलचस्प है, लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ उसकी पकड़ ढीली पड़ती है. पहला हाफ उम्मीद जगाता है, मगर इंटरवल के बाद स्क्रीनप्ले खिंचा हुआ महसूस होने लगता है.कुछ घटनाओं और टकरावों को ज्यादा प्रभावी तरीके से विकसित किया जा सकता था. सबसे बड़ी निराशा क्लाइमेक्स से होती है, क्योंकि जिस तरह का payoff कहानी तैयार करती है, उसके मुकाबले अंत उतना संतोषजनक नहीं लगता. यही वजह है कि फिल्म का शुरुआती प्रभाव आखिर तक कायम नहीं रह पाता.कहानी खिंची हुई लगने लगती है.
मेघना गुलजार का अप्रोच तो रियलिस्टिक लगता है, लेकिन फिल्म की पेसिंग और सबसे कमजोर कड़ी, इसका खराब एक्जीक्यूशन, फिल्म को पूरी तरह से डुबो देता है. ना तो कानून पर सही सवाल खड़े होते हैं और ना ही एनकाउंटर की कड़ी समझ आती है. ऐसा लगता है कि मेघना खुद इस गुत्थी में उलझकर रह गईं और दर्शकों के सामने एक मत नहीं परोस पाईं.'तलवार' जैसी इन्वेस्टिगेटिव और 'राजी' जैसी स्पाई थ्रिलर देखने के बाद अगली फिल्म से ये उम्मीद और भी बढ़ जाती है, लेकिन कहानी का दायरा मेघना शायद सिर्फ सोच तक ही सीमित रख पाती हैं और पर्दे पर नहीं उतार पातीं और इसीलिए 'दायरा' आपको सिर्फ निराश ही करती है.
दायरा की कहानी अच्छी है, लेकिन इस कहानी को कहने का तरीका बिल्कुल फैला हुआ है. यश केसवानी , सीमा अग्रवाल और मेघना गुलजार ने मिलकर कहानी को गढ़ा लेकिन स्क्रीनप्ले इतना वीक है कि शायद आप फिल्म के बीच में सो भी जाएं. एक अच्छा आइडिया तभी काम करता है जब उसकी कहानी आखिरी तक बांधे रखने का काम करे, पर दायरा की कहानी पेपर वर्क तक ही रह जाती है. इसके अलावा सुकुमारन और करीना के सीन अलग-अलग दिखाने की जद्दोजहद में बीच-बीच में कहानी का रिदम टूटता है और फिर असली मुद्दे से ध्यान भटक जाता है.
MUSIC
फिल्म का म्यूजिक अमित त्रिवेदी ने दिया है और गीतों के बोल गुलज़ार ने लिखे हैं. लेकिन फिल्म का संगीत ऐसा प्रभाव नहीं छोड़ता कि थिएटर से बाहर निकलने के बाद कोई खास धुन याद रह जाए.
फिल्म में बैकग्राउंड स्कोर का इस्तेमाल ज्यादा प्रभावी है. केतन सोढ़ा का बैकग्राउंड स्कोर कई गंभीर और तनावपूर्ण दृश्यों को बेहतर बनाता है. इसके मुकाबले मुख्य गीत कमजोर कड़ी नजर आता है.
CINEMATOGRAPHY
सौरभ गोस्वामी की सिनेमैटोग्राफी फिल्म के तकनीकी रूप से बेहतर हिस्सों में है. खास तौर पर क्लोज-अप शॉट्स का इस्तेमाल किरदारों के तनाव और भावनाओं को उभारता है.
फिर भी विजुअल ट्रीटमेंट कहानी की कमियों को पूरी तरह ढक नहीं पाता. फिल्म का मूड गंभीर है और कैमरा उसी टोन को बरकरार रखता है, लेकिन कई जगह विजुअल्स से ज्यादा स्क्रीनप्ले को धार की जरूरत महसूस होती है.
DIRECTION
मेघना गुलज़ार की पकड़ विषय पर साफ दिखाई देती है. फिल्म संवेदनशील मुद्दे को सनसनीखेज बनाने के बजाय गंभीर तरीके से पेश करने की कोशिश करती है.लेकिन निर्देशन की सबसे बड़ी चुनौती पेसिंग बन जाती है. फिल्म का दूसरा भाग ज्यादा टाइट होता तो इसका प्रभाव कहीं ज्यादा मजबूत हो सकता था.
FINAL VERDICT
DAAYRA की नीयत और मुद्दा मजबूत है, कलाकार मजबूत हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले की कमजोरी फिल्म के असर को कम कर देती है.पहले हाफ में उम्मीद जगाने के बाद फिल्म दूसरे हाफ में धीमी पड़ती है और क्लाइमेक्स तक पहुंचते-पहुंचते वह impact नहीं दे पाती जिसकी इस तरह की क्राइम-थ्रिलर से उम्मीद होती है.DAAYRA में दमदार मुद्दा है, दमदार कलाकार हैं… लेकिन कहानी का दायरा जितना बड़ा होना चाहिए था, फिल्म उतना असर पैदा नहीं कर पाती.
अगर आप मेघना गुलजार की फिल्मों को पसंद करते हैं और उनकी पहली फिल्में आपने देखी हैं, तो शायद दायरा आपको निराश कर सकती है. सस्पेंस और ड्रामे के बीच उलझी हुई कहानी से शायद आप बोर हो सकते हैं, लेकिन फिर भी सवाल खड़े करने वाली कहानी और करीना-पृथ्वी की एक्टिंग देखने के लिए इसका हिस्सा आप बनना चाहते हैं तो आप दायरा जाकर देख सकते हैं.
ये भी पढ़ें- पाकिस्तान को ट्रंप ने दिखाया ठेंगा! ईरान को लेकर अमेरिका करने जा रहा कुछ बड़ा, मिडिल ईस्ट में हलचल तेज