तेल अवीवः 13 जून को जब इजराइल ने "ऑपरेशन लॉयन राइजिंग" की शुरुआत की, तब शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि इसके चंद घंटों बाद ही पूरा पश्चिम एशिया एक भयानक युद्ध की चपेट में आ जाएगा. इस हमले के जवाब में ईरान ने "ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3" को अंजाम दिया और इजराइल पर मिसाइलों की बौछार कर दी. 12 दिनों तक चले इस खूनी संघर्ष में दोनों देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ा, वहीं अमेरिका भी इस लड़ाई की आंच से नहीं बच सका.
इस युद्ध में ईरान को जानमाल के लिहाज से सबसे बड़ी क्षति झेलनी पड़ी. जहां 657 से 800 ईरानी नागरिकों और सैनिकों की जान चली गई, वहीं लगभग 2500 से 3500 लोग घायल हो गए. मरने वालों में 200 से 365 तक ईरानी सैनिक थे, जिनमें ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के 19 शीर्ष अधिकारी भी शामिल हैं. इनमें ईरानी थल सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों के साथ-साथ IRGC का चीफ ऑफ स्टाफ भी था. इतना ही नहीं, ईरान के 10 शीर्ष न्यूक्लियर वैज्ञानिकों की मौत ने उसकी परमाणु ताकत को भी गहरा झटका दिया है.
तेल अवीव, हाइफा और बीर शेवा जैसे शहरों को निशाना बनाया
इजराइल ने अपने हमलों में ईरान के परमाणु ठिकानों—नतांज, फोर्दो और इस्फहान—को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया. इसके पीछे उसका मकसद था ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमता को जड़ से खत्म करना. लेकिन, ईरान ने भी करारा जवाब देने में देर नहीं लगाई. ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3 के तहत उसने इजराइल के तेल अवीव, हाइफा और बीर शेवा जैसे शहरों को निशाना बनाया. हमलों में मोसाद हेडक्वार्टर, इजराइली रक्षा बलों (IDF) का मुख्यालय, तेल अवीव स्टॉक एक्सचेंज और सोरोका मेडिकल सेंटर जैसे अहम ठिकाने बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए. इसके अलावा हाइफा पोर्ट, नेवी बेस और तेल रिफाइनरी को भी काफी नुकसान हुआ.
ईरान अब सिर्फ बचाव में नहीं, बल्कि पलटवार करने के मूड में
इस जंग में इजराइल को भी जान का नुकसान हुआ. करीब 24 से 30 नागरिकों की मौत हुई और 804 से अधिक लोग घायल हुए. हालांकि, इजराइली सैनिकों की हताहत संख्या के बारे में अब तक कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है. युद्ध के अंतिम 24 घंटों में अमेरिका ने भी इसमें हस्तक्षेप किया, लेकिन उसका यह कदम उल्टा पड़ गया. सैन्य रूप से भले ही उसे कोई बड़ा नुकसान न हुआ हो, लेकिन कूटनीतिक मोर्चे पर अमेरिका की प्रतिष्ठा को तगड़ा झटका लगा है. अरब देशों में उसकी पकड़ कमजोर होती नजर आ रही है और उसकी वैश्विक विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं.
ईरान ने अमेरिकी हस्तक्षेप का जवाब कतर स्थित अमेरिकी बेस पर मिसाइल हमला करके दिया. यह कार्रवाई न सिर्फ अमेरिका के लिए चेतावनी थी, बल्कि ईरानी जनता में एक नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार भी कर गई. यह जता दिया गया कि ईरान अब सिर्फ बचाव में नहीं, बल्कि पलटवार करने के मूड में है.
ये भी पढ़ेंः तकनीक की ताकत या चोरी का जाल? ऐसा कोई सगा नहीं जिसको चीन ने ठगा नहीं, ड्रैगन की रिवर्स इंजीनियरिंग का कड़वा सच