नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर लंबे समय से चल रही बातचीत अब एक निर्णायक मोड़ पर है. अमेरिका की ओर से दी गई डेडलाइन 9 जुलाई को खत्म होने जा रही है. इस बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति और अब फिर से उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप का बयान—"या तो डील करो या टैरिफ झेलो"—भारत जैसे देशों के लिए एक कड़ा संदेश है.
हालांकि, भारत सरकार का रुख साफ है—कोई भी समझौता राष्ट्रीय हितों को ताक पर रखकर नहीं किया जाएगा, और न ही किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव में.
अमेरिका की रणनीति: दबाव की नीति
डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को कहा कि उन्होंने 12 देशों को पत्र भेजे हैं, जिनमें भारत भी शामिल माना जा रहा है. इन पत्रों में साफ तौर पर चेताया गया है कि अगर ये देश अमेरिका के साथ डील नहीं करते, तो उन्हें रेसिप्रोकल टैरिफ का सामना करना पड़ेगा.
अमेरिका ने यूके और वियतनाम जैसे देशों के साथ समझौते फाइनल कर लिए हैं, जबकि चीन के साथ भी बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है. भारत को लेकर ट्रंप प्रशासन अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सका है.
भारत की नीति: "दबाव नहीं, संतुलन चाहिए"
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने दो दिन पहले साफ कर दिया कि भारत किसी डेडलाइन के दबाव में नहीं है. उन्होंने कहा, "हम कोई भी व्यापार समझौता तब ही करेंगे जब वह देश और किसानों के हित में हो. हमारी प्राथमिकता है कि हम अपने किसानों और घरेलू उद्योगों को सुरक्षा दें."
भारत की नीति अब तक स्पष्ट रही है—यूके, ऑस्ट्रेलिया, UAE और EFTA के साथ हुए समझौतों में भी कृषि और डेयरी सेक्टर की रक्षा को प्राथमिकता दी गई है.
असली टकराव का बिंदु: कृषि और डेयरी
भारत और अमेरिका के बीच बातचीत की सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आया है कृषि और डेयरी सेक्टर. अमेरिका चाहता है कि भारत मक्का (maize), सोयाबीन (soybean), और डेयरी उत्पादों पर टैरिफ कम करे, ताकि अमेरिकी उत्पाद भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें.
लेकिन भारत साफ कह चुका है कि, "यदि इन उत्पादों पर टैरिफ घटाया गया, तो देश के छोटे किसानों और घरेलू डेयरी उद्योग पर गंभीर असर पड़ेगा."
भारत सरकार का रुख है कि भारत की कृषि अर्थव्यवस्था अभी भी संवेदनशील है और विदेशी आयात के दबाव को झेलने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है.
भारत की मांगें: सिर्फ व्यापार नहीं, सुरक्षा भी
भारत अमेरिका से सिर्फ बेहतर टैरिफ नहीं, भविष्य में टैरिफ स्थिरता और सेक्टोरल संरक्षण की गारंटी भी चाहता है.
भारत चाहता है कि:
सरकार का मानना है कि जब तक ये गारंटियां नहीं मिलतीं, कोई समझौता स्थायी और सुरक्षित नहीं कहा जा सकता.
ट्रंप की धमकी बनाम मोदी की प्राथमिकता
ट्रंप जहां एक ओर व्यापार को लेकर आक्रामक और परिणाम-केंद्रित रणनीति अपनाए हुए हैं, वहीं भारत की मोदी सरकार "भारत फर्स्ट" सिद्धांत पर टिकी हुई है.
भारत के लिए यह केवल व्यापारिक डील नहीं, बल्कि खेती-किसानी, रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता का मुद्दा है. और यही कारण है कि सरकार जल्दबाज़ी में कोई निर्णय नहीं लेना चाहती.
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