"अंधेरे में हैं तो समाधान कैसे होगा?", SIR सुनवाई के दौरान सु्प्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी; दिए ये निर्देश

Bihar Chunav SIR: देश की मतदाता सूची से लाखों नामों को हटाने को लेकर जारी विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच चुका है. सिलेक्टिव इलेक्टोरल रिवीजन (SIR) के तहत मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं, खासकर यह कि क्या यह प्रक्रिया पारदर्शिता और निष्पक्षता के मानकों पर खरी उतरती है?

Important comment of Supreme Court during SIR hearing Gave these instructions
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Bihar Chunav SIR: देश की मतदाता सूची से लाखों नामों को हटाने को लेकर जारी विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच चुका है. सिलेक्टिव इलेक्टोरल रिवीजन (SIR) के तहत मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं, खासकर यह कि क्या यह प्रक्रिया पारदर्शिता और निष्पक्षता के मानकों पर खरी उतरती है?

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट से अनुरोध किया कि सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव को 10 मिनट का समय दिया जाए ताकि वे यह समझा सकें कि कैसे इस प्रक्रिया ने महिलाओं, मुसलमानों और अन्य वर्गों को अनुपातहीन रूप से प्रभावित किया है. इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं, लेकिन पूछा कि आगे की कार्यवाही SIR की वैधता पर केंद्रित होनी चाहिए या किसी अन्य पहलू पर?

"अंधेरे में हैं तो समाधान कैसे होगा?"

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं. उन्होंने कहा, "अगर कोई हमें यह सूची दे सके कि 3.66 लाख हटाए गए मतदाताओं में से किन्हें आदेश की जानकारी नहीं दी गई, तो हम चुनाव आयोग को निर्देश देंगे कि उन्हें सूचना दी जाए." उन्होंने यह भी जोड़ा कि हर व्यक्ति को अपील करने का अधिकार है.

वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि जिनके नाम हटाए गए हैं, उन्हें न तो नोटिस दिया गया और न ही हटाने का कारण बताया गया. साथ ही उन्होंने यह सवाल उठाया कि यदि जानकारी ही नहीं दी गई, तो अपील कैसे की जा सकती है?

"हलफनामे के बिना कोई बात नहीं मानी जाएगी"

चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील राकेश द्विवेदी ने इन दावों का विरोध करते हुए कहा कि यह कहना गलत है कि जानकारी नहीं दी गई. उन्होंने तर्क दिया कि सभी प्रभावित लोगों को आदेश की जानकारी दी गई है. उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि बिना किसी हलफनामे के इस तरह की बातें स्वीकार नहीं की जानी चाहिए.

इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने दो टूक कहा, "किसी को तो हलफनामा दाखिल करना होगा कि वह प्रभावित व्यक्ति है." वहीं जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुझाव दिया कि योगेंद्र यादव स्वयं एक हलफनामा देकर स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं.

डेटा क्यों नहीं किया गया सार्वजनिक?

प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग को प्रतिदिन मिलने वाली आपत्तियों की सूची को अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करना चाहिए था, जैसा कि उनके नियमों में स्पष्ट तौर पर लिखा है. उन्होंने कहा कि 3.66 लाख नाम आपत्तियों के आधार पर हटाए गए हैं, लेकिन इसका ब्योरा सामने नहीं लाया गया. इस पर वृंदा ग्रोवर ने भी समर्थन करते हुए कहा कि विस्तृत आंकड़े आज भी उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें सामने नहीं लाया जा रहा.

क्या कहती है अदालत?

सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वह फिलहाल संख्याओं पर नहीं, बल्कि कुछ प्रतिकात्मक उदाहरणों की जांच पर ध्यान दे रही है. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "अगर मुझे पता है कि संशोधित मतदाता सूची में मेरा नाम नहीं है, तो मैं व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दाखिल कर सकता हूं."

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