Hindu In Pakistan: पाकिस्तान के सिंध प्रांत से एक 15 वर्षीय मूक-बधिर हिंदू लड़की की कहानी सामने आई है, जो न सिर्फ अल्पसंख्यकों की हालत बयां करती है, बल्कि इंसानियत की उस आवाज़ को भी खामोश कर देती है, जिसे अब सुनने वाला कोई नहीं दिखता.
लगभग 9 दिन तक लापता रहने के बाद यह नाबालिग लड़की अचानक मीडिया के सामने आती है, इस बार एक बुज़ुर्ग मुस्लिम व्यक्ति की पत्नी बनकर. उसके हाथ में एक प्रमाण-पत्र है, जो बताता है कि उसने इस्लाम कबूल कर लिया है और विवाह कर चुकी है. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब उसकी मर्ज़ी से हुआ, या यह एक और जबरन धर्मांतरण और शादी का मामला है, जिसे पाकिस्तान में अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है?
कहानी सिंध के बदिन की, चुप्पी में दबी चीख़
यह लड़की कोरवाह कस्बे, जिला बदिन की रहने वाली है. उसके मूक-बधिर होने की पुष्टि उसके माता-पिता पहले ही कर चुके हैं. जब वह अचानक लापता हुई, तो परिवार ने तुरंत अपहरण की शिकायत दर्ज कराई. मगर पुलिस की ओर से कोई त्वरित कार्रवाई नहीं हुई.
अब जब लड़की "खुद से लौट आई" और प्रेस क्लब में एक बुज़ुर्ग व्यक्ति के साथ दिखाई दी, जिसके सात बेटियां पहले से हैं और जो मादक पदार्थों की तस्करी के मामलों में नामजद बताया जा रहा है, तो सवाल और गहरे हो गए हैं.
“मूक-बधिर लड़की अपनी मर्ज़ी से शादी कैसे कर सकती है?”
लड़की के पिता का दर्द साफ है. उनका कहना है, "वो बोल नहीं सकती, सुन नहीं सकती. ऐसे में क्या वो सच में समझ सकती थी कि वो क्या कर रही है?" यह सवाल सिर्फ उनके परिवार का नहीं, बल्कि पाकिस्तान में रह रहे हिंदू और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों का भी है, जो ऐसे मामलों को वर्षों से झेल रहे हैं, पर न्याय की कोई सशक्त आवाज़ नहीं बन पाई.
“अपहरण था, धर्मांतरण नहीं”
दरवार इत्तेहाद पाकिस्तान नामक संगठन के प्रमुख शिव कच्छी ने साफ कहा है कि यह मामला स्पष्ट अपहरण और जबरन धर्मांतरण का है. उनके अनुसार, "हमने कानूनी सलाह ले ली है और मामले को अदालत तक ले जाने की तैयारी कर रहे हैं. हमें यकीन है कि लड़की से यह सब उसकी मर्ज़ी के खिलाफ करवाया गया है." उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को पत्र लिखकर निष्पक्ष जांच की मांग भी की है.
नाबालिग लड़कियों के लिए पाकिस्तान बनता जा रहा है एक भयावह जगह
रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान में हिंदू आबादी करीब 1.2 प्रतिशत, यानी लगभग 19.6 लाख है. इनमें से अधिकांश सिंध के ग्रामीण इलाकों में बसते हैं. Minority Rights और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टें साफ कहती हैं कि बीते कुछ वर्षों में जबरन धर्मांतरण, नाबालिग लड़कियों की शादी और अल्पसंख्यकों पर हिंसा, जैसे मामलों में खतरनाक इजाफा हुआ है. और चिंता की बात यह है कि अधिकांश घटनाओं में कानून प्रवर्तन एजेंसियां मूक दर्शक बनी रहती हैं.
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