India Nepal Disaster Relief: नेपाल में बालेन शाह की सरकार को बने अभी सिर्फ पांच महीने ही हुए थे कि देश एक बड़ी प्राकृतिक आपदा की चपेट में आ गया. नेपाल और चीन की सीमा पर आई अचानक बाढ़ ने हिमालयी इलाके में भारी तबाही मचा दी है. इस संकट के बीच काठमांडू से सरकार और विदेशी मदद को लेकर खींचतान की खबर सामने आई.
शुरुआत में नेपाल सरकार ने किसी विदेशी टीम की मदद लेने से इनकार कर दिया था. लेकिन कुछ ही घंटों में हालात इतने बिगड़ गए कि उसे अपना फैसला बदलना पड़ा. अब नेपाल ने भारत समेत कई देशों से आपात मदद और तकनीकी विशेषज्ञ भेजने की अपील की है.
पहले ‘नहीं’ फिर ‘हां’, नेपाल ने क्यों बदला फैसला?
नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर छेत्री ने शुरुआत में कहा था कि देश की अपनी सुरक्षा एजेंसियां राहत और बचाव अभियान चला रही हैं और फिलहाल किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं है. लेकिन जमीनी हालात सामने आने के बाद सरकार को जल्द ही अपना फैसला बदलना पड़ा.
आपदा में बड़ी संख्या में लोग लापता बताए जा रहे हैं. इनमें विदेशी पर्यटक और ट्रेकर्स भी शामिल हैं. भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के नागरिकों के भी प्रभावित होने की खबरों के बीच नेपाल पर जल्द राहत अभियान तेज करने का दबाव बढ़ गया.
रसुवा इलाके में जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में मजदूरों और विदेशी इंजीनियरों के फंसे होने की भी जानकारी सामने आई. पानी और मलबे से भरी इन गहरी सुरंगों में बचाव अभियान चलाना आसान नहीं है. इसके लिए खास मशीनों और अनुभवी टीमों की जरूरत है.
नदियों में बह गए शवों की पहचान जारी
इसके अलावा मलबे में दबे और नदियों में बह गए शवों की पहचान भी बड़ी चुनौती बन गई है. कई शवों की हालत खराब होने के कारण उनकी पहचान के लिए डीएनए जांच और आधुनिक फॉरेंसिक सुविधा की जरूरत पड़ रही है.
बाढ़ में कई सड़कें और पुल भी बह गए हैं. इससे प्रभावित इलाकों का संपर्क टूट गया है. ऐसे में राहत सामग्री पहुंचाने के साथ-साथ रास्तों को दोबारा खोलना भी बड़ी चुनौती बन गया है. इन हालातों के बाद नेपाल ने भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से विशेषज्ञ टीमों की मदद लेने की अनुमति दे दी.
भारत ने तुरंत बढ़ाया मदद का हाथ
नेपाल की ओर से आधिकारिक अनुरोध मिलते ही भारत ने राहत और बचाव के लिए तैयारी शुरू कर दी. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को बताया कि भारत नेपाल के अनुरोध पर हर संभव मदद भेज रहा है.
भारत की ओर से राहत सामग्री लेकर दो विमान पहले ही काठमांडू भेजे जा चुके हैं. मानवीय सहायता से भरा एक और विमान भेजने की तैयारी है. नेपाल के विशेष अनुरोध पर भारत टनल रेस्क्यू टीम भी भेज रहा है. इससे पहले एक रेकी टीम मौके पर जाएगी और वहां के हालात देखकर तय करेगी कि किस तरह की मशीनों और उपकरणों की जरूरत है.
भारत एक मेडिकल टीम के साथ बेली ब्रिज और उसे बनाने वाली विशेषज्ञ इंजीनियर टीम भी भेज रहा है. इसका मकसद बाढ़ में टूटे रास्तों और संपर्क को जल्द बहाल करना है. इसके अलावा भारत ने राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी एनडीआरएफ की विशेष टीम भेजने की पेशकश भी की है. अब नेपाल सरकार की मंजूरी का इंतजार है.
समय कम, खतरा बड़ा
नेपाल में आई यह आपदा नई नहीं है. इससे पहले 2015 के भूकंप के दौरान भी भारत ने बड़े स्तर पर राहत और बचाव अभियान चलाया था. ‘ऑपरेशन मैत्री’ के जरिए भारत ने हजारों लोगों को मदद पहुंचाई थी.
इस बार भी रसुवा, भोटे कोशी और त्रिशूली नदी के आसपास के इलाकों में हालात बेहद गंभीर बताए जा रहे हैं. तिब्बत में जमा पानी वाली एक झील के टूटने का खतरा भी बताया जा रहा है. अगर ऐसा हुआ तो एक और बड़ा सैलाब आ सकता है.
ऐसे हालात में राहत और बचाव के लिए हर मिनट बेहद अहम है. शुरुआत में नेपाल ने विदेशी मदद से दूरी बनाई थी, लेकिन हालात बिगड़ने के बाद उसे अपना फैसला बदलना पड़ा. भारत अब टनल रेस्क्यू टीम, बेली ब्रिज, मेडिकल मदद और एनडीआरएफ के जरिए नेपाल की मदद के लिए तैयार है. इस मुश्किल घड़ी में यह मदद प्रभावित लोगों के लिए बड़ी उम्मीद बन सकती है.
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