Zorawar Tank: लद्दाख के बर्फीले और ऊंचे पहाड़ी इलाकों में 2020 में भारत और चीन के बीच हुए तनाव ने यह दिखा दिया था कि ऐसे क्षेत्रों में भारी टैंकों की अपनी सीमाएं हैं. इसी दौरान चीन ने अपने हल्के Type-15 टैंकों को तैनात किया था. इसके जवाब में भारत ने भी ऊंचाई वाले इलाकों के लिए स्वदेशी लाइट टैंक जोरावर तैयार किया है.
जोरावर टैंक को खास तौर पर कठिन पहाड़ी इलाकों में तेजी से तैनात करने और वहां बेहतर तरीके से काम करने के लिए बनाया गया है. भारत में इसके निर्माण को लेकर बेल्जियम की कंपनी जॉन कॉकरिल और इलेक्ट्रो न्यूमैटिक्स एंड हाइड्रोलिक्स के बीच भी साझेदारी हुई है. पुणे में कॉकरिल 3105 बुर्ज के निर्माण की व्यवस्था की जा रही है. यूरोप के बाहर इस बुर्ज की यह पहली उत्पादन लाइन बताई जा रही है.
जोरावर और Type-15 में कितना अंतर?
चीन का Type-15 करीब 33 से 36 टन वजन का है, जबकि भारत का जोरावर करीब 25 टन का लाइट टैंक है. कम वजन होने की वजह से इसे ऊंचाई वाले इलाकों में ले जाना आसान होगा. भारतीय वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर जैसे बड़े परिवहन विमान के जरिए इसे सीमावर्ती इलाकों में तेजी से पहुंचाया जा सकता है.
तकनीकी तौर पर दोनों टैंकों में 105 एमएम की मुख्य तोप दी गई है. जोरावर में 760 हॉर्सपावर का कमिंस डीजल इंजन और रेंक ट्रांसमिशन दिया गया है. इसकी अधिकतम रफ्तार करीब 70 किलोमीटर प्रति घंटा और परिचालन सीमा करीब 450 किलोमीटर बताई जाती है.
वहीं, Type-15 में करीब 1000 हॉर्सपावर का इंजन है और इसकी रफ्तार भी लगभग 65 से 70 किलोमीटर प्रति घंटा है. दोनों टैंकों में हाइड्रोन्यूमैटिक सस्पेंशन का इस्तेमाल किया गया है, जो खराब और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर काम करने में मदद करता है.
ऊंचे पहाड़ों में जोरावर क्यों खास है?
जोरावर को खास तौर पर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे ऊंचाई वाले इलाकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. इन जगहों पर कम ऑक्सीजन, बेहद कम तापमान और मुश्किल रास्तों के कारण भारी सैन्य वाहनों के संचालन में परेशानी आती है. करीब 25 टन का हल्का ढांचा जोरावर को ऐसे इलाकों में तेजी से चलने और तैनात होने में मदद कर सकता है.
105 एमएम तोप और मिसाइल की ताकत
जोरावर में बेल्जियम की जॉन कॉकरिल 3105 बुर्ज के साथ 105 एमएम की तोप दी गई है. इसमें ऑटोलोडर भी लगाया गया है, जिससे चालक दल को तेजी से गोला दागने में मदद मिलती है.
इसके अलावा टैंक में एंटी-टैंक मिसाइल लगाने की क्षमता भी है. इसमें नाग परिवार की मिसाइलों का इस्तेमाल किए जाने की बात कही गई है. इससे यह दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ ज्यादा प्रभावी हो सकता है.
भारत में ही होगा निर्माण
जोरावर परियोजना में भारत की कंपनियों और डीआरडीओ की भी अहम भूमिका है. शुरुआती तौर पर 59 लाइट टैंकों का ऑर्डर दिया गया है, जबकि सेना को आगे चलकर कुल 354 ऐसे टैंकों की जरूरत बताई गई है. भारत में ही इसके कई अहम हिस्सों का निर्माण होने से देश की रक्षा उत्पादन क्षमता और आपूर्ति व्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी.
किसके नाम पर रखा गया जोरावर नाम?
इस लाइट टैंक का नाम डोगरा सेना के प्रसिद्ध जनरल जोरावर सिंह के नाम पर रखा गया है. उन्हें लद्दाख का विजेता भी कहा जाता है. उनका नाम जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के सैन्य इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.
जोरावर का मुख्य उद्देश्य ऊंचाई वाले इलाकों में भारतीय सेना की ताकत बढ़ाना है. चीन के Type-15 जैसे हल्के टैंकों के सामने यह भारत को एक ऐसा विकल्प देता है, जिसे कठिन और ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से तैनात किया जा सकता है.
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