Iran-Israel War: ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते संघर्ष के साथ ही अमेरिका की सक्रिय भूमिका ने दुनिया भर के तेल बाजारों में उथल-पुथल मचा दी है. इस युद्ध के परिणामस्वरूप, पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि देखने को मिली है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समय दुनिया के 85 देशों में तेल की कीमतों में 15% से लेकर 50% तक का इजाफा हुआ है, और यह संकट तब आया है जब पहले से ही वैश्विक अर्थव्यवस्था महंगाई और आर्थिक मंदी के दबाव में थी.
तेल संकट और वैश्विक अर्थव्यवस्था
मिडल ईस्ट, जो कि दुनिया के ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है, इस संघर्ष से बुरी तरह प्रभावित हुआ है. जब भी इस क्षेत्र में कोई सैन्य तनाव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर विश्व के तेल बाजारों पर पड़ता है. यही कारण है कि इस युद्ध ने वैश्विक महंगाई को और बढ़ा दिया है, और आर्थिक अनिश्चितता को भी जन्म दिया है. जहां एक ओर तेल की कीमतों में वृद्धि से विकसित देशों में चिंता बढ़ी है, वहीं विकासशील देशों में इसका असर और भी गहरा हुआ है.
किस देश पर पड़ा सबसे ज्यादा असर?
ईंधन की कीमतों में सबसे ज्यादा उछाल उन देशों में देखा गया है जो इंपोर्ट पर निर्भर हैं या जहां पहले से ही आर्थिक असंतुलन था. इन देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है, और इसके साथ-साथ खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामानों की कीमतें भी बढ़ी हैं. इस बढ़ोतरी ने उपभोक्ताओं की परेशानियों को और बढ़ा दिया है.
पेट्रोल-डीजल कीमतों पर असर वाले प्रमुख देश
कंबोडिया, वियतनाम, मिश्र और नाइजीरिया जैसे देशों में तेल की कीमतों में सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई है. कंबोडिया में कीमतों में 68% तक का इजाफा हुआ है, जो सबसे बड़ी वृद्धि है. वियतनाम में भी तेल आपूर्ति में अनिश्चितता के कारण 50% तक की बढ़ोतरी हुई है. मिश्र, नाइजीरिया और लाओस जैसे देशों में भी ईंधन की कीमतों में 35% से 50% तक का इजाफा हुआ है. इन देशों में ऊर्जा आयात बिल दोगुना होने के कारण उनकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव बढ़ा है.
मिस्र में बढ़ती ऊर्जा लागत और उसके प्रभाव
मिस्र पर तेल कीमतों की बढ़ोतरी का सबसे बड़ा असर देखा गया है. देश का ऊर्जा आयात बिल अब डबल हो चुका है, और इसके कारण सरकार के बजट, मुद्रा और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है. इसके साथ ही, ऊर्जा लागत में बढ़ोतरी से बिजली दरें, औद्योगिक उत्पादन और सार्वजनिक परिवहन खर्चों में भी वृद्धि हुई है, जिसका सीधा असर आम लोगों की जीवनयापन पर पड़ा है.
विकसित देशों में भी चिंता
यह संकट केवल विकासशील देशों तक ही सीमित नहीं है. ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश भी इस संकट के प्रभाव से बच नहीं पाए हैं. ऑस्ट्रेलिया में महंगाई बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं, और तेल कीमतों में अस्थिरता का असर उसके आर्थिक विकास पर भी देखने को मिल सकता है. तेल की कीमतों में अस्थिरता ने वैश्विक बाजारों में चिंता पैदा कर दी है, और कई केंद्रीय बैंक अपनी नीतियों को लेकर सतर्क हो गए हैं.
तेल कीमतों में वृद्धि और जीवनयापन की लागत
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ा है. परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य सामग्री और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी तेजी आई है, जिससे जीवनयापन की लागत में भारी उछाल आया है. विशेष रूप से मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोगों को इस वृद्धि से अधिक नुकसान हुआ है. भारत जैसे आयातक देश के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि देश अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 85% आयात करता है.
भारत में संकट का प्रबंधन
भारत ने इस संकट को "मैनेज्ड शॉक" के रूप में संभालने की रणनीति अपनाई है. यानी, सरकार ने सीधे उपभोक्ताओं पर बोझ डालने के बजाय नीतिगत संतुलन के जरिए इस असर को नियंत्रित करने की कोशिश की है. हालांकि, अगर वैश्विक तेल कीमतों में बढ़ोतरी लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत में भी महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है.
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