ट्रंप और वेंस समेत हर अमेरिकी का डेटा चोरी! चीन के हैकर्स ने कैसे किया इतना बड़ा साइबर हमला?

अमेरिका एक अभूतपूर्व साइबर खतरे से जूझ रहा है. दुनिया की सबसे ताकतवर डिजिटल सुरक्षा प्रणाली को चीन से जुड़े एक खतरनाक हैकर समूह ने भेद दिया है.

Chinese hackers stole data of every American
प्रतिकात्मक तस्वीर/ Sociel Media

वाशिंगटन: अमेरिका एक अभूतपूर्व साइबर खतरे से जूझ रहा है. दुनिया की सबसे ताकतवर डिजिटल सुरक्षा प्रणाली को चीन से जुड़े एक खतरनाक हैकर समूह ने भेद दिया है. इस साइबर हमले की गूंज न केवल अमेरिका तक सीमित है, बल्कि यह हमला वैश्विक साइबर सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी बन गया है.

हमला कितना बड़ा और खतरनाक था?

दिसंबर 2024 में इस साइबर हमले का पता चला, जब अमेरिका की प्रमुख खुफिया एजेंसियों ने जांच के दौरान पाया कि देश की कई टेलीकॉम कंपनियों का नेटवर्क गहरे स्तर पर हैक किया जा चुका है. यह हमला किसी मामूली डेटा चोरी की घटना से कहीं बड़ा था इसमें अमेरिकी नागरिकों की निजी जानकारियां, फोन कॉल्स, मैसेज, लोकेशन डेटा और यहां तक कि डिवाइसों में संग्रहीत फाइल्स तक एक्सेस कर ली गई थी.

प्रमुख तथ्य:

  • कम से कम 8 अमेरिकी टेलीकॉम कंपनियों पर यह हमला हुआ.
  • लाखों नागरिकों के कॉल रिकॉर्ड्स, मैसेज और पर्सनल डेटा चोरी हुआ.

हमला इतना व्यापक था कि हर अमेरिकी नागरिक इससे प्रभावित हो सकता है, जैसा कि एफबीआई के पूर्व साइबर प्रमुख ने कहा.

अमेरिका के शीर्ष नेता भी निशाने पर

इस साइबर हमले की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि इसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस तक की संचार प्रणाली को निशाना बनाया गया. बताया गया है कि 2024 के चुनाव प्रचार के दौरान उनके डिजिटल कम्युनिकेशन को हैक कर लिया गया था.

यह सिर्फ एक राजनीतिक हस्तियों की जासूसी का मामला नहीं है, बल्कि अमेरिका के संचार ढांचे को सीधे कमजोर करने की कोशिश है. एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के शब्दों में, "यह सिर्फ डेटा चोरी नहीं, बल्कि संचार तंत्र का शस्त्रीकरण (weaponization) है."

साइबर हमला कैसे हुआ?

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, हैकर्स ने अमेरिका की प्रमुख टेलीकॉम कंपनियों की सुरक्षा खामियों का फायदा उठाया. पुराने नेटवर्क प्रोटोकॉल्स और सॉफ़्टवेयर वल्नरेबिलिटीज के जरिए उन्होंने धीरे-धीरे नेटवर्क में प्रवेश किया और बिना पकड़े महीनों तक सिस्टम के भीतर रहे.

ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने भी अपनी जांच में पाया कि हैकर्स सीधे कॉल्स सुन सकते थे, मैसेज पढ़ सकते थे, और कई मामलों में मोबाइल फोन की स्थानीय फाइलें भी डाउनलोड की गईं.

कौन हैं हमले के पीछे?

इस साइबर हमले के पीछे ‘Salt Typhoon’ नामक हैकर ग्रुप को जिम्मेदार माना जा रहा है. साइबर सुरक्षा में इस्तेमाल होने वाले कोडनामिंग सिस्टम के अनुसार, “Typhoon” शब्द आमतौर पर चीन से संचालित साइबर ग्रुप्स के लिए उपयोग होता है.

यह समूह पहले Ghost Emperor और Famous Sparrow नामों से भी पहचाना गया है और इसे चीन की सरकारी खुफिया एजेंसी Ministry of State Security (MSS) से जोड़ा जा रहा है.

Salt Typhoon की रणनीति:

  • धीमे और छुपे हुए साइबर हमले
  • लंबे समय तक नेटवर्क में मौजूदगी बनाए रखना
  • सटीक और उच्चस्तरीय टारगेटिंग- जैसे कि सरकार, सेना, और राजनेता

तीन चीनी कंपनियों पर भी आरोप

अमेरिकी जांच में पता चला कि इस ऑपरेशन को तीन चीनी निजी कंपनियों का समर्थन प्राप्त था:

  • Huanyu Tianqiong Information Technology – बीजिंग आधारित
  • Zhixin Ruijie Network Technology – सिचुआन प्रांत की कंपनी
  • Juxinhe Network Technology – पहले से प्रतिबंधित

अमेरिका ने इनमें से Juxinhe पर जनवरी 2025 में प्रतिबंध लगा दिया था, और बाकी दो पर भी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव

यह हमला केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहा. जांच में सामने आया है कि 80 से अधिक देशों की सरकारी, रक्षा, ट्रांसपोर्ट और हॉस्पिटैलिटी सर्विसेज को भी टारगेट किया गया.

जिन देशों पर असर पड़ा:

  • अमेरिका
  • ब्रिटेन
  • जर्मनी
  • इटली
  • स्पेन
  • और कई एशियाई व अफ्रीकी देश

ब्रिटेन की खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, चीन की रणनीति अब केवल व्यापारिक जानकारी चुराने तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह दुनिया के प्रमुख संचार नेटवर्कों को हथियार बना रहा है.

साइबर सुरक्षा की नई चेतावनी

अमेरिकी सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी के प्रमुख मार्क वॉर्नर ने इस हमले को “अमेरिका के इतिहास का सबसे खतरनाक साइबर हमला” बताया. उनके अनुसार यह हमला रूस के पुराने साइबर हमलों की तुलना में कहीं अधिक संगठित, गहरा और खतरनाक है.

पूर्व CIA अधिकारी जेनिफर इवबैंक के अनुसार, “दस साल पहले चीन केवल व्यापारिक जानकारियों में दिलचस्पी रखता था. लेकिन अब उसने रणनीति बदल ली है. अब उसका फोकस वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और सैन्य दबदबा कायम करने पर है और यह हमला उसी दिशा में एक संकेत है.”

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