ब्रह्मपुत्र पर चीन का 'जल दांव', इसकी काट के लिए क्या कर रहा भारत? जानिए पूरी कहानी

चीन ने तिब्बत के दूरस्थ और संवेदनशील मेदोग इलाके में ब्रह्मपुत्र (जिसे वह यारलुंग त्सांगपो कहता है) पर दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर बांध बनाना शुरू कर दिया है.

China water bet on Brahmaputra India
जिनपिंग | Photo: ANI

ब्रह्मपुत्र—यह सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि उत्तर-पूर्व भारत के लिए जीवन की धारा है. सदियों से इस नदी ने असम, अरुणाचल और आसपास के राज्यों की धरती को सींचा है, जीवन को दिशा दी है. लेकिन अब, इस नदी की दिशा बदलने की कोशिश हो रही है—वो भी सरहद पार से.

चीन ने तिब्बत के दूरस्थ और संवेदनशील मेदोग इलाके में ब्रह्मपुत्र (जिसे वह यारलुंग त्सांगपो कहता है) पर दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर बांध बनाना शुरू कर दिया है. उसका दावा है कि यह परियोजना चीन के थ्री गॉर्जेस डैम से भी तीन गुना अधिक बिजली पैदा करेगी. यह बांध 2030 तक पूरा हो जाएगा—ऐसा उसका लक्ष्य है.

ऊर्जा या रणनीति? चीन की मंशा पर सवाल

चीन इस कदम को अपने 'कार्बन न्यूट्रल' लक्ष्य की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल बता रहा है. उसका कहना है कि यह ग्रीन एनर्जी उत्पन्न करेगा और जीवाश्म ईंधन पर उसकी निर्भरता घटेगी. लेकिन इस तर्क के परे, विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ ऊर्जा परियोजना नहीं, बल्कि जल को हथियार बनाने की रणनीति का हिस्सा है. तिब्बत में पहले से चीन के कई छोटे-बड़े बांध मौजूद हैं, लेकिन यह परियोजना ब्रह्मपुत्र के प्रवाह को पूरी तरह नियंत्रित करने की मंशा से जुड़ी है.

भारत के लिए क्या है असली खतरा?

भारत की चिंता यह नहीं कि चीन बिजली बनाएगा—बल्कि यह है कि वह इस नदी के बहाव पर नियंत्रण पा लेगा. असम, अरुणाचल और मिजोरम जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था, खेती और पानी की जरूरतें पूरी तरह ब्रह्मपुत्र पर निर्भर हैं.

अगर चीन चाहे, तो नदी का बहाव कम कर सूखा पैदा कर सकता है, या फिर अचानक ज्यादा पानी छोड़कर बाढ़ जैसी तबाही ला सकता है. अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने हाल ही में इस प्रोजेक्ट को "चलता-फिरता वाटर बम" करार दिया. यह चिंता महज आशंका नहीं, बल्कि एक रणनीतिक खतरे की ओर इशारा करती है.

भूकंप का जोखिम भी कम नहीं

इस बांध का निर्माण जिस इलाके में हो रहा है, वह भूकंप-प्रवण क्षेत्र है. ज़रा सी टेक्टोनिक हलचल भी इस मेगाप्रोजेक्ट को ज़मींदोज कर सकती है. साथ ही, इस इलाके की जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है.

भारत की तैयारी क्या है?

भारत सरकार ने इस मुद्दे को चीन के सामने कूटनीतिक तौर पर उठाया है. जनवरी 2025 में दोनों देशों के बीच इस पर औपचारिक बातचीत भी हुई. इसके अलावा, भारत ने अरुणाचल प्रदेश के सियांग क्षेत्र में ‘सियांग मल्टीपर्पस प्रोजेक्ट’ की योजना को तेज़ी से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है.

इस परियोजना का उद्देश्य है एक ‘बफर बांध’ तैयार करना, जो चीन की ओर से पानी के प्रवाह में किसी भी अनियमितता का मुकाबला कर सके. यह 11,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन करने में सक्षम होगा और 9 अरब घन मीटर पानी संग्रहित कर सकेगा. लेकिन इस प्रोजेक्ट की रफ्तार अभी तक स्थानीय विरोध और नौकरशाही अड़चनों के कारण धीमी रही है.

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