चीन द्वारा शिनजियांग में उइगर मुसलमानों पर कड़े नियंत्रण और कथित यातना शिविरों की खबरें पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का विषय बनी हुई थीं. अब एक और संवेदनशील क्षेत्र – तिब्बत – चीन की सांस्कृतिक इंजीनियरिंग का नया केंद्र बनता जा रहा है. इस बार निशाने पर हैं तिब्बती बच्चे, जिन्हें उनके परिवारों से अलग कर "औपनिवेशिक" शिक्षा प्रणाली के तहत बोर्डिंग स्कूलों में रखा जा रहा है.
बचपन की आज़ादी छीनी जा रही है
तिब्बत एक्शन इंस्टिट्यूट (TAI) द्वारा जारी ताज़ा रिपोर्ट "जब वे हमारे बच्चों को लेने आए: चीन के औपनिवेशिक बोर्डिंग स्कूल और तिब्बत का भविष्य" ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान तिब्बत में हो रहे सांस्कृतिक दमन की ओर खींचा है. रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 10 लाख तिब्बती बच्चों को जबरन उनके परिवारों से अलग कर बोर्डिंग स्कूलों में डाला गया है, जहां वे न तो अपनी भाषा बोल सकते हैं और न ही अपने धार्मिक रीति-रिवाज़ों का पालन कर सकते हैं.
संस्कृति से दूर करने की नीति
इन स्कूलों में बच्चों को सिर्फ चीनी भाषा में शिक्षा दी जाती है और तिब्बती भाषा या धर्म से जुड़ी किसी भी गतिविधि पर सख्त पाबंदी है. यहां तक कि छुट्टियों के दौरान भी उन्हें तिब्बती संस्कृति से दूर रखा जाता है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कई ग्रामीण क्षेत्रों में चार साल की उम्र के बच्चों को भी जबरन इन स्कूलों में भर्ती किया जा रहा है.
TAI का कहना है कि यह प्रक्रिया केवल शिक्षा के नाम पर नहीं हो रही, बल्कि यह एक सुनियोजित प्रयास है जिससे तिब्बती लोगों की सांस्कृतिक पहचान को धीरे-धीरे मिटाया जा सके. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी बच्चों को ‘राष्ट्रभक्ति’ की शिक्षा दे रही है और उन्हें पार्टी के प्रति वफादार बनाने की कोशिश कर रही है.
क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय सोया हुआ है?
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब दुनिया पहले से ही चीन की मानवाधिकार नीतियों को लेकर गंभीर सवाल उठा रही है. हालांकि तिब्बत के मामले में अब तक कूटनीतिक प्रतिक्रियाएं बेहद सीमित रही हैं. लेकिन जब इतने छोटे बच्चों के भविष्य, भाषा और धार्मिक स्वतंत्रता पर चोट की जा रही हो, तो यह केवल तिब्बत की नहीं बल्कि मानवाधिकारों की वैश्विक लड़ाई बन जाती है.
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