Atal Bihari Vajpayee को मां क्या कहकर बुलाती थीं? लॉ की डिग्री का क्या था पिता से संबंध; पढ़ें 10 अनसुनी बातें

Atal Bihari Vajpayee birth anniversary 25 जनवरी, 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया है. बीमार होने के चलते 16 अगस्त, 2018 में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.

Atal Bihari Vajpayee को मां क्या कहकर बुलाती थीं? लॉ की डिग्री का क्या था पिता से संबंध; पढ़ें 10 अनसुनी बातें

Atal Bihari Vajpayee birth anniversary 2023 भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उन शख्सियत में थे, जिन्हें दुश्मन भी सराहते थे. सही मायनों में वह भारतीय राजनीति में अजातशत्रु थे यानी जिनका राजनीति में कोई दुश्मन नहीं था. वह देश के कुछ लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में शुमार रहे. वह कवि भी थे और उनका नाम उम्दा कवियों में शुमार था. 25 जनवरी, 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया है. बीमार होने के चलते 16 अगस्त, 2018 में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया. बेशक अटल बिहारी वाजपेयी देश के दिग्गज नेता थे. उन्होंने देश को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. आइये जयंती (Atal Bihari Vajpayee birth anniversary ) पर जानते हैं उनके बारे में 10 बड़ी बातें. 

UN में दिया था हिंदी में शानदार भाषण
 
अटल बिहारी वाजपेयी वर्ष 1997 में जनता पार्टी सरकार से विदेश मंत्री बने और संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations organisation) के एक सत्र में उन्होंने हिंदी में अपना भाषण भी दिया था. जिसकी देश-दुनिया में तारीफ हुई. वह हिंदी बोलने और लिखने में दक्ष थे, इसलिए उनके भाषणों को आज भी लोग उतने ही चाव से सुनते हैं. 

3 बार ली पीएम पद की शपथ

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने  16 मई, 1996 को देश के 10वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी. दुर्भाग्य से बहुमत नहीं जुटा पाए तो उन्हें त्याग-पत्र देना पड़ गया. 2 वर्ष के भीतर 19 मार्च 1998 को फिर मौका आया उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी ने देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई. इसके बाद 13 अक्टूबर 1999 को उन्होंने तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी और वह लगातार 2024 तक पीएम रहे.

बाबा ने नाम रखा था अटल, मां कहती थी अटल्ला

25 दिसंबर, 1924 को ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी का नाम उनके बाबा श्यामलाल वाजपेयी ने अटल रखा था. वहीं, उनकी मां कृष्णादेवी प्यार से प्यार से 'अटल्ला' कहकर पुकारती थीं. कृष्णा देवी के अलावा कोई अटल्ला नाम से पुकारता तो वह नाराज हो जाती थी. सिर्फ अटल्ला नाम मां कृष्णादेवी ही बुलाती थीं. 

 

Amrita Pritam Imroz Love Story प्यार की कितनी कहानियां आपने पढ़ी होंगी-सुनी होंगी. कुछ सतही होती हैं तो कुछ हमारा मनोरंजन करती हैं. वहीं, कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो हमारे दिल को छू जाती है. ऐसी कहानियां हमें जीवन भर याद रहती हैं. यह भी सच है कि ये कहानियां कहीं न कहीं हकीकत के करीब भी होती हैं. दो लोगों के बीच का फसाना कैसे अमर हो जाता है. इसका जीता जागता नमूना है-अमृता प्रीतम और इंदरजीत उर्फ इमरोज की लव स्टोरी. अब दोनों ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन अगर इस धरती से परे कोई दुनिया है तो वहां जरूर एक-दूसरे से मिले होंगे. क्योंकि जब लेखिका अमृता गंभीर रूप से बीमार थीं तो उस दौरान ये कविता इमरोज के ल‍िए ल‍िखी थी. 

मैं तैनू फ़िर मिलांगी
कित्थे ? किस तरह पता नई
शायद तेरे ताखियल दी चिंगारी बण के
तेरे केनवास ते उतरांगी.

सदियों तक रहेगी दास्तां अपनी

खैर आने वाली सदियों में भी अमृता और इमरोज की मोहब्बत का जिक्र जरूर होगा. 'जब-जब जिक्र होगा वफा और मोहब्बत की बात होगी, कई सदियों तक जमाना गुनगुनाएगा तुम्हारा फसाना' यह किसी कविता की पंक्ति नहीं, बल्कि यह सच है कि अमृता प्रीतम और इंद्रजीत उर्फ इमरोज कई सदियों तक मोहब्बत के अफसानों में जिंदा रहेंगे. 

मोहब्बत का देवता

कहते हैं ना देने वाला देवता होता है तो इस लिहाज से इमरोज धरती के देवता बन गए-मोहब्बत के देवता बन गए. उन्होंने यह जानते हुए भी अमृता प्रीतम को अपनाया कि वह साहिर लुधियानवी से प्यार करती हैं और ताउम्र करती रहेंगी. बावजूद इसके न केवल उन्होंने अमृता प्रीतम को अपनाया बल्कि उन पर मोहब्बत लुटाते हुए. अमृता प्रीतम ने एक बार लिखा था- 'मैं सारी ज़िंदगी जो भी सोचती और लिखती रही, वो सब देवताओं को जगाने की कोशिश थी, उन देवताओं को जो इंसान के भीतर सो गए हैं.' कह नहीं सकते हैं, लेकिन अमृता प्रीतम के लिए इमरोज वही देवता तो नहीं थे?

अमर हो गया प्यार

नाटककार तारिक हमीद का कहना है कि मेरी चंद मुलाकातें इमरोज साहब के साथ हैं. उनके साथ हुई संक्षिप्त मुलाकात मेरे लिए जीवन के बड़े तजुर्बे की तरह है. वह जिंदगी और प्यार दोनों को बहुत प्यार करते थे. यही वजह थी कि उन्होंने जिंदगी और प्यार दोनों को बड़ी शिद्दत से जिया. 97 वर्ष की उम्र में एक ही बार प्यार किया और वह अमर हो गया. 

इमरोज के लिए कभी अमृता कभी दुनिया से गई ही नहीं. 

तारिक हमीद का कहना है कि इमरोज के लिए अमृता कभी दुनिया से गई ही नहींं-मरी ही नहीं. वह इमरोज के लिए हमेशा जिंदा रहीं. वह बात करने के दौरान इस तरह अपनी बात रखते जैसे अमृता जिंदा हैं. वह कहते थे कि लोगों की शिकायत रहती है कि उन्होंने अपनी तरह जिंदगी नहीं जी, लेकिन लोगों को चाहिए क्या महज 500 रुपये जिंदगी जीने के लिए. और हां अमृता के लिए कभी भी 'थे' शब्द का जिक्र नहीं करके 'हैं' का जिक्र करते थे. मसलन 'वह खाना खाती है. वह सोती है और वह लिखती है' जैसे वाक्य. कुलमिलाकर अमृता का जिक्र आने पर इमरोज के चेहरे पर तेज आ जाता था.

बाखबर होकर भी बेखकर रहे इमरोज

इमरोज़ दरअसल, अमृता से बेहद प्यार करते थे और अमृता के लिए यह एक सपने के पूरा होने जैसा था. कहा जाता है कि अमृता और इमरोज के लिए यह बिना सीमाओं का प्यार था और बिना किसी शर्त का प्यार था. यह भी कम हैरत की बात नहीं कि इमरोज़ को साहिर के प्रति अमृता के प्यार के बारे में पता था लेकिन उन्होंने कभी इस बात से नाराजगी नहीं जताई.

अजब ट्रैएंगल लव

अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी दोनों एक-दूसरे को प्यार करते थे. अमृता अपने प्यार साहिर को पाना चाहती थीं, लेकिन चोट खाए साहिर आगे बढ़ने को तैयार नहीं थे. इस बीच यह जानते हुए भी साहिर और इमरोज दोनों दोस्त बन गए. यहां यह जानना दिलचस्प है कि इमरोज़ ने ही साहिर की किताब 'आओ कोई ख्वाब बुनें' (आओ एक सपना बुनें) का कवर डिजाइन किया था.  इमरोज ने अमृता से एक बार कहा भी था कि वह जानते हैं कि वह साहिर से कितना प्यार करती हैं लेकिन इस बात पर जोर दिया कि वह यह भी जानते हैं कि वह खुद अमृता से कितना प्यार करते हैं.

दोनों ने कभी नहीं कहा- हमें तुमसे मोहब्बत है

अमृता प्रीतम और इंदरजीत उर्फ इमरोज का प्यार इस लिहाज से अनूठा था कि दोनों ही एक-दूसरे से प्यार तो करते थे, लेकिन इजहार कभी नहीं किया. शायद प्यार को जुबां की जरूरत नहीं होती है क्योंकि प्यार तो एक एहसास है. कहा भी जाता है कि जब किसी चीज का एहसास बार-बार कराया जाए तो वह एहसान में तब्दील हो जाता है. अमृता और इमरोज करीब-करीब पति-पत्नी की रहे और दोनों के बच्चे भी हुए, लेकिन दोनों ने कभी नहीं कहा- 'मुझे मोहब्बत है'.

 

पिता और अटल ने एक साथ ली कानून की डिग्री

अटल बिहारी वाजपेयी के पिता का नाम  कृष्ण बिहारी वाजपेयी और माता का नाम कृष्णा देवी था. शुरुआती शिक्षा ग्वालियर में हुई थी. इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए विक्टोरिया कॉलेज में दाखिला लिया. यहां से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और कानपुर के डीएवी कॉलेज से राजनीति विज्ञान में एमए किया था. दरअसल, वह राजनीति विषय में बचपन से ही गहरी रुचि रखते थे. यह भी रोचक है कि अटल बिहारी वाजपेयी और उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ने एक साथ ही कानूनी की पढ़ाई की और  कानपुर के डीएवी कॉलेज से डिग्री हासिल की. वह न केवल एक कक्षा में पढ़ते थे बल्कि इस दौरान दोनों एक ही साथ हॉस्टल में भी रहे थे.

 

बाप जी कह कर बुलाते थे करीबी रिश्तेदार

यह बात भी बहुत कम लोगों को मालूम होगी कि अटल बिहारी वाजपेयी को उनके करीबी दोस्त और रिश्तेदार बचपन से ही 'बाप जी' कहकर बुलाते थे. यह अलग बात है कि जैसे-जैसे वह राजनीति में सक्रिय होते गए यह नाम लोग भूल गए.

राजनीति का भीष्म पितामह

राजनीति की दुनिया में अटल बिहारी वाजपेयी गजब का सम्मान हासिल थी. उनके संबंध प्रत्येक दल के नेताओं से थे और सभी उनका दिल से सम्मान करते थे. यहां पर बता दें कि  पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में अपने संबोधन के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय राजनीति का 'भीष्म पितामाह' कहा था.

जीवन भर रहे अविवाहित

अटल बिहारी वाजपेयी जीवनभर अविवाहित रहे और उन्होंने शादी नहीं की. यह अलग बात है कि उन्होंने एक लड़की को गोद लिया था जिसका नाम नमिता है. उन्हें मांस-मच्छी खाने का बहुत शोक था. वह प्रोन्स खाने के शौकीन थे. यह बहुत कम लोग जानते होंगे कि पुरानी दिल्ली का करीम होटल उनका पसंदीदा मांसाहारी होटल है. यहां वह अक्सर आते थे या कहें जब उनका मन होता था तब आते थे.

संघ से बचपन में जुड़ गए थे

वर्ष 1942 में हुए महात्मा गांधी के 'भारत छोड़ो' आन्दोलन में उन्होंने भी भाग लिया था और 24 दिन तक कारावास में रहे थे. हालांकि वह यानी अटल बिहारी वाजपेयी अपने शुरुआती जीवन में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के करीब आ गए थे. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी से की.

10 बार लोकसभा सांसद बने

अटल बिहारी वाजपेयी 10 बार लोकसभा में और 2 बार राज्यसभा में सांसद रहे. यह उपलब्धि भी अटल बिहारी वाजपेयी के नाम है, जो वह 4 अलग-अलग राज्यों दिल्ली, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से सांसद बने थे. वह आखिरी बार लखनऊ (उत्तर प्रदेश) से सांसद थे.

राजनीतिक गुरु मानते थे पीवी नरसिम्हा राव

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव भाजपा के उस दौर के लोकप्रिय नेता अटल बिहारी बाजपेयी को अपना राजनैतिक गुरु मानते थे. मन से कोमल अटल बिहारी पाकिस्तान के साथ मजबूत संबंध बनाने के पक्ष में थे. उन्होंने 19 फरवरी 1999 को दिल्ली से लाहौर तक सदा-ए-सरहद नाम की एक बस सेवा भी शुरू की थी जिसमें उन्होंने भी एक बार यात्रा की थी. उनके साथ दिग्गज कलाकार भी गए थे. 6 अप्रैल 1980 वह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने थे.