National Farmers Day 2023 पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती (chaudhary charan singh) पर शनिवार (23 दिसंबर) को पूरा देश उन्हें याद कर रहा है. उन्हें किसानों का मसीहा भी कहा जाता है. 23 दिसंबर को उनके जन्मदिन (जयंती) पर प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय किसान दिवस मनाया जाता है. किसान परिवार में जन्मे देश के पांचवें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह कभी संसद नहीं गए. किसानों से जुड़ी समस्याओं को लेकर अपनी आवाज बुलंद करने के लिए चर्चित चरण सिंह को सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर अधिक याद किया जाता है. यहां पर हम बता रहे हैं चौधरी चरण सिंह के बारे में 10 रोचक तथ्य.
सिर्फ 5 महीने रहे पीएम
चौधरी चरण सिंह ने 28 जुलाई, 1979 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन 14 जनवरी, 1980 तक ही देश के प्रधानमंत्री रहे. दरअसल, इस हिसाब से वह सिर्फ 5 महीने और कुछ दिन ही प्रधानमंत्री पद पर रह पाए. हुआ यह कि कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया और इसके बाद चौधरी चरण सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई. वहीं, बहुमत साबित करने से पहले ही उन्होंने पीएम पद से इस्तीफा दे दिया. इस तरह वह देश के पहले प्रधानमंत्री बने, जो कभी संसद नहीं गए और अपने पद से इस्तीफा दे दिया.
किसान दिवस के रूप में मनाई जाती है जयंती
देश के 5वें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को देशभर में किसानों की आवाज बुलंद करने वाले नेता के तौर पर देखा जाता है. यही वजह है कि उनके जन्मदिवस/जयंती (23 दिसंबर) को 'किसान दिवस' के रूप में मनाया जाता है.
लेखक भी थे पूर्व पीएम
यह बात कम ही लोगों को पता होगी कि पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह राजनेता होने के साथ-साथ एक उम्दा लेखक भी थे. उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी हैं, जिनमें 'अबॉलिशन ऑफ जमींदारी', ‘लिजेण्ड प्रोपराइटरशिप’ और ‘इंडियास पॉवर्टी एंड इट्स सोल्यूशंस' लिखी हैं, जो छात्रों के लिए भी उपयोगी हैं. इसके साथ ही उनका हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा पर भी अच्छा अधिकार था.
नेहरू का विरोध कर अचानक आए थे चर्चा में
चौधरी चरण सिंह को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वर्तमान में भी पूर्व पीएम के तौर पर कम और एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर अधिक जाना जाता है. वह अचानक उस समय चर्चा में आए थे, जब उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के सोवियत-पद्धति पर आधारित आर्थिक सुधारों का विरोध किया था. उन्होंने विरोध के पक्ष में तर्क दिया था कि सहकारी-पद्धति की खेती भारत देश में सफल नहीं हो सकती है. वह किसानों के हितों के लिए किसी भी स्थिति तक जाने के लिए तैयार रहते थे. यही वजह है कि उन्हें किसानों का मसीहा भी कहा जाता है.
बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह से था संबंध
यह बात भी कम ही लोग जानते होंगे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नूरपुर गांव (मेरठ) में जन्मे चौधरी चरण सिंह के परिवार का संबंध बल्लभगढ़ (हरियाणा) के राजा नाहर सिंह से था. ब्रिटिश हुकूमत ने दिल्ली के चांदनी चौक में राजा नाहर सिंह को फांसी दे दी थी. फरीदाबाद में राजा नाहर सिंह के नाम से एक क्रिकेट स्टेडियम भी है.
वकालत भी की थी चरण सिंह ने
चौधरी चरण सिंह की पढ़ाई-लिखाई पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, आगरा और गाजियाबाद जिले में हुई थी. उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई की, फिर इसके बाद उन्होंने गाजियाबाद में वकालत (प्रैक्टिस) भी की. चरण सिंह के बारे में कहा जाता है कि वह उन्हीं मुकदमों को स्वीकार करते थे, जिसमें उन्हें पीड़ित की सच्चाई नजर आती थी.
6 महीने जेल की काटी थी सजा
चौधरी चरण सिंह ने वर्ष 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान 'नमक कानून’ तोड़ा था, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. कोर्ट ने उन्हें 6 महीने की सजा सुनाई थी. वहीं जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने स्वयं को देश के स्वतन्त्रता संग्राम में पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया था. वह भी उस समय महात्मा गांधी से प्रभावित थे.
किया था कांग्रेस कमेटी का गठन
गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन चौधरी चरण सिंह ने ही किया था. दरअसल, कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (1929) वह लौटे तो उन्होंने दिल्ली से सटे गाजियाबाद जिले में कांग्रेस कमेटी का गठन किया था. बताया जाता है कि वह पहले से ही इसकी योजना बना चुके थे और लाहौर से आते ही इसे अंजाम दिया.
किसानों के पक्ष में पेश किया था बिल
चौधरी चरण सिंह वर्ष 1937 में सिर्फ 34 साल की उम्र में बागपत की छपरौली सीट से विधायक चुने गए थे. किसानों के प्रति समर्पित चरण सिंह ने किसानों के अधिकारों की रक्षा की खातिर एक बिल भी पेश किया था. यह बिल इतना अच्छा था कि बाद में बाकी राज्यों ने इस बिल को हूबहू अपनाया.
उपप्रधानमंत्री पद भी संभाल चुके हैं
आपातकाल के बाद हुए चुनाव में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में 'जनता पार्टी' की सरकार बनी तो काबिलियत के देखते हुए चौधरी चरण सिंह को गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री बनाया गया था. यह दुर्भाग्य था कि जनता पार्टी की आपसी कलह से मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई. इसके बाद कांग्रेस और सीपीआई की मदद से चरण सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. इस बीच राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने बहुमत साबित करने का समय तो दिया, लेकिन इंदिरा गांधी ने पहले ही समर्थन वापस ले लिया. इसके बाद नैतिकता के आधार पर चौधरी चरण सिंह ने बिना संसद का एक बार भी सामना किए बिना प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया.
पूरा थाना हुआ सस्पेंड
वर्ष 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह अचानक यूपी के इटावा इलाके के ऊसराहार पुलिस स्टेशन पहुंचे. दरअसल, पीएम होने के बावजूद वह किसान के रूप में थाने के अंदर एंट्री की. उन्होंने रिपोर्ट लिखाने की बात कही तो तैनात एएसआई ने कहा कि ऐसे थोड़े रपट लिखा जाता है. कुछ देर बाद पूरे थाने को सस्पेंड कर दिया गया.