वॉशिंगटन: आज की दुनिया में यह समझ पाना मुश्किल नहीं है कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन. लेकिन जब बात अमेरिका जैसे ताकतवर देश की हो, जो खुद को लोकतंत्र और मानवाधिकारों का सबसे बड़ा प्रहरी बताता है, तब यह सवाल और भी अहम हो जाता है. हाल ही में जिस तरह से अमेरिका और पाकिस्तान की सैन्य नेतृत्व के बीच नजदीकियां बढ़ रही हैं, उसने भारत में चिंता की लहर पैदा कर दी है.
डोनाल्ड ट्रंप की पुरानी और अब दोबारा उभरती विदेश नीति की रणनीति में पाकिस्तान को जिस तरह से अहमियत दी जा रही है, वह न केवल भारत के लिए, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के शांति-प्रिय नागरिकों के लिए चिंता का विषय है.
अमेरिका-पाकिस्तान की नजदीकी: इत्तेफाक या रणनीति?
अमेरिका का इतिहास रहा है कि वह कभी भी अपने मित्र देशों के साथ स्थायी और भरोसेमंद संबंध नहीं रखता. यही कारण है कि जब अमेरिका ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर के साथ गर्मजोशी दिखानी शुरू की, तो सवाल उठने लगे.
डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान की कठपुतली सरकार को दरकिनार कर सीधे सेना प्रमुख से न केवल मुलाकात की, बल्कि लंच जैसे दोस्ताना माहौल में बातचीत भी की. इससे भी बड़ा झटका तब लगा जब अमेरिका ने मुनीर के कहने पर बलूच संगठनों को आतंकवादी घोषित कर दिया जबकि इनका अमेरिका से कोई सीधा संबंध भी नहीं था.
बलूच मुद्दे पर अमेरिका का भारतविरोधी रुख?
बलूचिस्तान का मामला पाकिस्तान के लिए एक लंबे समय से संवेदनशील मुद्दा रहा है. पाकिस्तान हमेशा से इस विद्रोह को भारत से जोड़ने की कोशिश करता रहा है, लेकिन अब जब अमेरिका खुद बलूच संगठन के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है, तो इससे पाकिस्तान को भारत पर उंगली उठाने का एक और बहाना मिल गया है.
इस बात की आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका, विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन, आने वाले समय में बलूच विद्रोह के पीछे भारत का हाथ होने का झूठा नैरेटिव गढ़ सकता है. यह कोई नई बात नहीं है. इससे पहले खालिस्तान मुद्दे पर भी अमेरिका ने भारत पर उंगलियां उठाई थीं, जो कि बाद में गलत साबित हुईं.
खालिस्तान मामले में अमेरिका की भूमिका
अमेरिका ने इससे पहले भी भारत पर आरोप लगाने की जल्दबाजी दिखाई है. निखिल गुप्ता नाम के एक भारतीय मूल के नागरिक को खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया गया. अमेरिका ने दावा किया कि एक पूर्व भारतीय अधिकारी भी इसमें शामिल थे, जबकि इन दावों पर कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला.
यही नहीं, अमेरिका ने कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की मौत से जुड़ी जानकारी दी, जिसके आधार पर ट्रूडो ने भारत पर आरोप लगाए. बाद में खुद ट्रूडो को स्वीकार करना पड़ा कि उनके पास कोई सबूत नहीं था. और नतीजा यह हुआ कि कनाडा में भारत के साथ संबंध बिगड़ गए और ट्रूडो को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा.
ट्रंप की विदेश नीति: भरोसे की जगह आशंका
डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति पर पहले भी कई सवाल उठे हैं. उन्होंने चुनाव जीतने के लिए चीन के खिलाफ तीखे बयान दिए, लेकिन सत्ता में आते ही उन्हीं चीन के सामने झुक गए.
भारत, जो इंडो-पैसिफिक में अमेरिका का अहम साझेदार रहा है, आज ट्रंप के टैरिफ फैसलों की वजह से आर्थिक रूप से नुकसान झेल रहा है. इस संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका कोई भी अप्रत्याशित कदम उठा सकता है और अगर वो पाकिस्तान को खुश करने के लिए भारत को बलूचिस्तान मुद्दे से जोड़ दे, तो इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए.
पाकिस्तान का झूठा नैरेटिव: अमेरिका से मिल रहा है साथ?
पाकिस्तान लंबे समय से यह प्रचार करता आ रहा है कि भारत बलूच विद्रोहियों को समर्थन देता है. हालांकि, इसका कोई पुख्ता सबूत आज तक सामने नहीं आया है. लेकिन अब जब अमेरिका ने बीएलए और मजीद ब्रिगेड पर प्रतिबंध लगाए हैं, तो पाकिस्तान को यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने का एक नया औजार मिल गया है.
यह कदम भारत के लिए कूटनीतिक रूप से एक नई चुनौती खड़ी कर सकता है. अगर अमेरिका इसी रास्ते पर चलता रहा, तो वह पाकिस्तान के झूठे आरोपों का समर्थन कर सकता है, जिससे भारत की छवि को नुकसान पहुंचने की आशंका है.
भारत को सतर्क रहने की जरूरत
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ होती है अमेरिका पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता. चाहे वह खालिस्तान का मामला हो या बलूचिस्तान का, अमेरिका की रणनीति अक्सर अपने हितों के हिसाब से बदल जाती है.
भारत को अब केवल कूटनीति के भरोसे नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्थिति और ज्यादा मजबूत करनी होगी. इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है कि भारत अपने मित्र देशों के साथ ऐसे संबंध बनाए जो केवल राजनीतिक लाभ तक सीमित न हों.
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