नई दिल्ली: भारत और आर्मेनिया के बीच रक्षा सहयोग में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय तेजी आई है. यह प्रवृत्ति केवल हथियारों की बिक्री भर नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक दृष्टिकोण से क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करने वाला घटनाक्रम बन चुकी है. खासतौर पर तब, जब तुर्की, अजरबैजान और पाकिस्तान के बीच बढ़ते रक्षा और कूटनीतिक सहयोग ने दक्षिण एशिया से लेकर काकेशस तक की भूराजनीति में नई चुनौती उत्पन्न कर दी है.
भारत और आर्मेनिया: रणनीतिक सहयोग
भारत और आर्मेनिया के रक्षा संबंध 2020 के बाद से गहराने लगे, जब नागोर्नो-कराबाख युद्ध के दौरान आर्मेनिया को रूस से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला. रूस की Collective Security Treaty Organization (CSTO) सदस्यता के बावजूद निष्क्रियता ने येरेवन को वैकल्पिक साझेदारों की ओर देखने के लिए प्रेरित किया. ऐसे में भारत एक भरोसेमंद और रणनीतिक रूप से संतुलित विकल्प बनकर उभरा.
भारत पहले ही पिनाका मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम, होवित्जर तोपें, और आकाश-1एस सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें जैसे उन्नत हथियारों की आपूर्ति कर चुका है. 2022 में हुई एक प्रमुख रक्षा डील के तहत भारत आर्मेनिया को इन प्रणालियों की दूसरी खेप देने की तैयारी में है.
तुर्की, अजरबैजान और पाकिस्तान: भारत की चिंता
पिछले कुछ वर्षों में तुर्की-पाकिस्तान-अजरबैजान त्रिकोणीय सहयोग में तेजी आई है. तीनों देशों ने न केवल रक्षा अभ्यास साझा किए हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत विरोधी स्वर भी मुखर किए हैं. विशेष रूप से:
इस पृष्ठभूमि में भारत द्वारा आर्मेनिया को रणनीतिक समर्थन प्रदान करना केवल रक्षा निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट भू-राजनीतिक संकेत है.
क्षेत्रीय संदेश और शक्ति संतुलन
इंडिक रिसर्चर्स फोरम के रक्षा विशेषज्ञ रिटायर्ड मेजर जनरल राजन कोचर के अनुसार, भारत की आर्मेनिया के साथ रक्षा साझेदारी एक संतुलनकारी कूटनीति का हिस्सा है. वे कहते हैं, "भारत यह संदेश दे रहा है कि यदि पाकिस्तान और उसके रणनीतिक साझेदार भारत विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहते हैं, तो भारत भी उन देशों का समर्थन करेगा जो इन शक्तियों का प्रतिरोध कर रहे हैं."
इसी तरह, लंदन स्थित विश्लेषक क्रिस ब्लैकबर्न मानते हैं कि भारत की मिसाइल डिप्लोमेसी तुर्की और पाकिस्तान को संतुलित करने की रणनीति है.
रूस की भूमिका: विरोध या सहमति?
हालांकि रूस पारंपरिक रूप से आर्मेनिया का मुख्य रक्षा आपूर्तिकर्ता रहा है, यूक्रेन युद्ध के बाद उसकी भूमिका सीमित हो गई है. दिलचस्प बात यह है कि भारत के बढ़ते रक्षा सहयोग को लेकर रूस ने कोई सार्वजनिक आपत्ति नहीं जताई है. विश्लेषकों का मानना है कि भारत और रूस के दीर्घकालिक रक्षा संबंधों के चलते यह एक मौन सहमति के तहत हो रहा है.
आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव
भारत द्वारा आर्मेनिया को हथियारों की आपूर्ति न केवल रक्षा निर्यात में वृद्धि है, बल्कि इससे काकेशस क्षेत्र में भारत की राजनीतिक उपस्थिति भी मजबूत हो रही है. इसके साथ-साथ:
भारत सरकार ने हाल ही में तुर्की की ग्राउंड हैंडलिंग कंपनी सेलेबी को सुरक्षा कारणों से हटाने का निर्णय लिया है.
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