हाल ही में ब्रिटेन में रह रही भारतीय मूल की महिला प्रेमा वांगियोम थोंगडोक के साथ हुई एक घटना ने भारत–चीन सीमा विवाद को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है. प्रेमा लंदन से जापान के लिए यात्रा कर रही थीं और शंघाई में ट्रांज़िट के दौरान उन्हें रोककर कठिन पूछताछ की गई. कारण ये था कि उनके भारतीय पासपोर्ट पर जन्मस्थान: अरुणाचल प्रदेश लिखा था.
चीनी अधिकारियों ने यह दावा करते हुए कि अरुणाचल प्रदेश चीन का हिस्सा है, उनके भारतीय पासपोर्ट और वीज़ा को अमान्य बताया. अधिकारियों ने यहां तक कह दिया कि यदि उनका जन्म “दक्षिणी तिब्बत” में हुआ है, तो उन्हें चीनी नागरिक माना जाएगा और चीनी पासपोर्ट बनवाना चाहिए.
प्रेमा ने बताया कि वह शंघाई एयरपोर्ट से पहले भी कई बार गुज़र चुकी हैं, लेकिन कभी ऐसी दिक्कत नहीं हुई. वह पिछले 14 वर्षों से ब्रिटेन में बस चुकी हैं और उनका परिवार आज भी अरुणाचल प्रदेश में रहता है. यह एक घटना जरूर है, पर यह उस पुराने विवाद की याद दिलाती है जिसने दशकों से भारत और चीन के संबंधों को प्रभावित किया है.
चीन क्यों अरुणाचल को अपना हिस्सा बताता है?
चीन आधिकारिक रूप से अरुणाचल प्रदेश को “दक्षिणी तिब्बत” कहता है. उसका कहना है कि तिब्बत से जुड़े कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक क्षेत्र उसके अधीन थे, इसलिए अरुणाचल प्रदेश भी उसी का हिस्सा है.
भारत इस दावे को पूरी तरह खारिज करता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी अरुणाचल प्रदेश को भारत ही का अभिन्न हिस्सा मानता है.
चीन का दावा मुख्यतः तीन आधारों पर टिका है:
तिब्बत का इतिहास:
चीन तिब्बत को अपना ऐतिहासिक क्षेत्र बताकर कहता है कि तिब्बत से जुड़े दक्षिणी इलाके, यानी अरुणाचल, चीन के अधीन आते थे.
तवांग क्षेत्र की धार्मिक महत्ता:
अरुणाचल का तवांग ज़िला अत्यंत महत्वपूर्ण बौद्ध केंद्र है. यहां का तवांग मठ तिब्बती परंपरा से गहराई से जुड़ा है. चीन का दावा है कि यह क्षेत्र तिब्बती शासन का हिस्सा हुआ करता था.
1914 की शिमला संधि को अस्वीकार करना:
भारत–तिब्बत–ब्रिटेन द्वारा की गई सीमा समझौता (मैकमोहन लाइन) को चीन आज भी नहीं मानता.
भारत–चीन सीमा: 3,488 किमी लंबा अनिर्धारित सीमाक्षेत्र
भारत और चीन के बीच फैली लगभग 3,500 किमी लंबी सीमा, जिसे लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) कहा जाता है, कई हिस्सों में स्पष्ट रूप से तय नहीं है.
इसी अस्पष्टता के कारण समय–समय पर तनाव, झड़पें और सैनिक आमना–सामना होता रहता है. तिब्बत, अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश इस विवाद के प्रमुख केंद्र हैं.
अक्साई चिन:
भारत इसे लद्दाख का हिस्सा मानता है, लेकिन चीन इस पर 1950 के दशक से कब्जा किए हुए है. यहाँ से चीन ने शिनजियांग को तिब्बत से जोड़ने के लिए हाईवे 219 बनाया है.
अरुणाचल प्रदेश:
भारत इसका हर इंच अपना क्षेत्र बताता है, लेकिन चीन लगभग 90,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर दावा करता है.
विवाद की जड़: अरुणाचल प्रदेश का इतिहास
1. बौद्ध संस्कृति और तिब्बत से जुड़ाव
अरुणाचल प्रदेश में सदियों से बौद्ध परंपरा और तिब्बती संस्कृति का प्रभाव रहा है. हालांकि सांस्कृतिक जुड़ाव और राजनीतिक सीमा दो अलग बातें हैं.
2. प्राचीन काल में स्पष्ट सीमा नहीं थी
भारत और तिब्बत के बीच पुराने समय में कोई औपचारिक सीमा निर्धारित नहीं थी. सीमाएँ अक्सर पर्वत, नदियों और स्थानीय प्रशासनिक प्रथा से तय होती थीं.
3. 1914 की शिमला वार्ता और मैकमोहन लाइन
1914 में ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधि शिमला में मिले. तिब्बत उस समय कमजोर लेकिन स्वतंत्र इकाई था.
वार्ता में:
4. 1950 के बाद परिस्थितियों में बड़ा बदलाव
जब चीन ने 1950 में तिब्बत पर नियंत्रण स्थापित किया, उसके लिए तिब्बत से लगे क्षेत्रों का महत्व और बढ़ गया. इसके बाद चीन की नज़र तवांग और आसपास के क्षेत्रों पर भी रही.
1962 का युद्ध: विवाद का सबसे बड़ा मोड़
1962 में भारत–चीन युद्ध हुआ, जिसमें चीन पूर्वी सेक्टर में (अरुणाचल की ओर) आगे बढ़ गया था, लेकिन उसने युद्ध के बाद अचानक पीछे हटकर मैकमोहन लाइन के उत्तर की ओर वापसी कर ली.
भारत ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखा और आज भी प्रशासन, सेना और अधोसंरचना पूरी तरह भारत के हाथ में है. फिर भी चीन आज तक दावा करता है कि यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से तिब्बत और इसलिए चीन के अधीन रहा है.
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