Afghanistan Bagram Air Base: अफगानिस्तान से 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद बग्राम एयरबेस एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस रणनीतिक हवाई अड्डे पर दोबारा अमेरिकी नियंत्रण की इच्छा जताई है. हालांकि, उनके इस प्रस्ताव को तालिबान ने साफ तौर पर खारिज कर दिया, और चीन ने भी सख्त प्रतिक्रिया दी है.
ट्रंप की नई पहल और तालिबान की दो टूक
हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान सरकार के सामने एक प्रस्ताव रखा, जिसमें अमेरिका को बग्राम एयरबेस पर दोबारा नियंत्रण देने की मांग की गई थी. ट्रंप का दावा है कि यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अहम हो सकता है. हालांकि, तालिबान ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि अफगानिस्तान की संप्रभुता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जाएगा.
चीन ने जताई आपत्ति
ट्रंप की इस रणनीति पर चीन ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है. बीजिंग ने इसे क्षेत्रीय हस्तक्षेप की कोशिश बताया और चेतावनी दी कि ऐसी कोई भी कार्रवाई एशियाई स्थिरता को खतरे में डाल सकती है. चीन का शिनजियांग प्रांत इस एयरबेस से महज 500 मील की दूरी पर स्थित है, जो इस विवाद को और संवेदनशील बना देता है.
बग्राम एयरबेस: एक रणनीतिक धुरी
अफगानिस्तान के परवान प्रांत में स्थित बग्राम एयरबेस, काबुल से करीब 40-60 किलोमीटर उत्तर में है. यह न केवल अफगानिस्तान का सबसे बड़ा हवाई अड्डा रहा है, बल्कि इसका भू-राजनीतिक महत्व भी अत्यधिक है.
इस एयरबेस पर दो लंबे कंक्रीट रनवे हैं, जो भारी सैन्य विमानों जैसे C-5 गैलेक्सी और B-52 बॉम्बर्स की लैंडिंग में सक्षम हैं. यहां 100 से अधिक विमान शेल्टर, हथियार डिपो, आधुनिक अस्पताल, जेल और खुफिया ऑपरेशन सेंटर जैसी सुविधाएं मौजूद थीं.
सोवियत से लेकर अमेरिकी नियंत्रण तक
बग्राम एयरबेस का निर्माण 1950 के दशक में सोवियत संघ ने किया था. 1980 के दशक में यह सोवियत अफगान युद्ध का मुख्य संचालन केंद्र बना रहा. 2001 के 9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने इस एयरबेस को अपने सैन्य अभियानों के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया. अगले दो दशकों तक यह अमेरिका और नाटो बलों का मजबूत गढ़ बना रहा.
भौगोलिक स्थिति से बनता है यह एयरबेस खास
बग्राम एयरबेस की भौगोलिक स्थिति इसे बेहद रणनीतिक बनाती है. यह दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के जंक्शन पर स्थित है. इसकी पहुंच पाकिस्तान, ईरान, चीन और रूस जैसे देशों तक आसानी से हो सकती है. यही कारण है कि अमेरिका इसे एक बार फिर अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना चाहता है.
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