US Iran Peace Talks In Islamabad: अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में करीब 21 घंटे तक चली उच्चस्तरीय बातचीत, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव को कम करना और सहमति बनाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाना था, अंततः बिना किसी महत्वपूर्ण समझौते के खत्म हो गई. हालांकि, दोनों देशों ने भविष्य में संवाद जारी रखने के संकेत दिए हैं, लेकिन परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्रीय नियंत्रण और अन्य जटिल मुद्दों पर असहमति बनी रही. आइए, विस्तार से समझते हैं कि बातचीत के दौरान कौन-कौन से बड़े मुद्दे सामने आए और क्यों यह वार्ता कोई ठोस परिणाम नहीं दे पाई.
ईरान का परमाणु कार्यक्रम
बातचीत का मुख्य मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम था, जिस पर दोनों देशों के दृष्टिकोण में गहरी असहमति रही. अमेरिका ने जोर दिया कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने की क्षमता पूरी तरह समाप्त करनी चाहिए और यूरेनियम संवर्धन पर कड़ी पाबंदी लगानी चाहिए. हालांकि, ईरान ने इस पर कड़ा विरोध करते हुए इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताया और किसी भी प्रकार के कठोर प्रतिबंध को मानने से इनकार कर दिया. यह मुद्दा बातचीत में सबसे अधिक तनाव उत्पन्न करने वाला था और इसके समाधान के बिना बातचीत आगे नहीं बढ़ पाई.
प्रतिबंधों का मुद्दा और फ्रीज संपत्तियों पर विवाद
अर्थव्यवस्था से जुड़ा दूसरा बड़ा विवाद था ईरान की विदेशों में फ्रीज की गई संपत्तियों की वापसी. ईरान ने कतर और अन्य देशों में रखी गई अपनी फंड्स को वापस करने की मांग की, लेकिन अमेरिका ने इस मांग से पूरी तरह इनकार कर दिया. दोनों पक्षों के बीच आर्थिक राहत को लेकर कोई समझौता नहीं हो सका, जिससे यह साबित हो गया कि आर्थिक प्रतिबंधों का मसला दोनों देशों के लिए एक जटिल समस्या बना हुआ है.
होर्मुज स्ट्रेट और समुद्री मार्ग पर नियंत्रण
बातचीत के दौरान एक और बड़ा विवाद होर्मुज स्ट्रेट का था, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक जलमार्गों में से एक है. ईरान ने इस जलमार्ग पर अधिक नियंत्रण और ट्रांजिट शुल्क लेने की मांग की, जबकि अमेरिका का कहना था कि इस मार्ग को वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए खुला और निर्बाध रखना अत्यंत आवश्यक है. यह मुद्दा भी बिना किसी समाधान के समाप्त हुआ, जिससे समुद्री सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के दृष्टिकोण में गहरी खाई बनी रही.
क्षेत्रीय सुरक्षा और युद्ध मुआवजे का मसला
वार्ता के दौरान ईरान ने अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर भी व्यापक मांगें उठाईं. उसने युद्ध मुआवजे की बात की, साथ ही लेबनान जैसे देशों में युद्धविराम की मांग भी रखी. वहीं, अमेरिका ने इन व्यापक मांगों को खारिज करते हुए केवल परमाणु कार्यक्रम और समुद्री सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया. इस प्रकार, दोनों देशों की प्राथमिकताएँ और दृष्टिकोण पूरी तरह से अलग थे, जिससे किसी समझौते तक पहुंचना संभव नहीं हो सका.
भरोसे की कमी और तनावपूर्ण माहौल
पूरी बातचीत के दौरान दोनों पक्षों के बीच गहरा अविश्वास और तनाव बना रहा. अधिकारियों के अनुसार, कई बार बातचीत के दौरान माहौल बहुत ही तनावपूर्ण हो गया था. ईरान का प्रतिनिधिमंडल अपनी नागरिकों की पीड़ा और संघर्षों के प्रतीक लेकर आया था, जबकि अमेरिका ने अपनी कड़ी नीतियों का बचाव किया. दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और कड़ा रुख बातचीत के माहौल को और भी तंग कर रहा था.
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