Political Popcorn: कटा यूपीआई का पैसा, अमेरिका बना विलेन, कांग्रेस के 'ट्रंप कनेक्शन' पर सियासी तंज!

Political popcorn: UPI पेमेंट पर लगने वाले शुल्क को लेकर कांग्रेस ने सरकार की नीति को अमेरिकी वित्तीय हितों और डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से जोड़कर सवाल उठाए हैं. पार्टी के इस नैरेटिव ने डिजिटल पेमेंट की बहस को सियासी रंग दे दिया है.

upi-charges-america-congress-trump-connection-political-tussle
Political Popcorn

1.पंजाब कांग्रेस: पायलट का अनुशासन या विदाई का फरमान !

उड़नखटोला तैयार है, सुधर जाओ वरना उतर जाओ!..सचिन पायलट को हाईकमान से मिला 'फ्री हैंड' !

पंजाब कांग्रेस के सिर फुटौव्वल से आजिज आ चुके हाईकमान ने अब कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है. नए प्रभारी सचिन पायलट को राहुल गांधी की तरफ से खुली छूट थमा दी गई है कि वे सूबे में सिर्फ सुलह की बात करेंगे, सिफारिश की नहीं. चन्नी, राजा वडिंग, बाजवा और रंधावा जैसे दिग्गज क्षत्रपों को दो टूक पैगाम भेज दिया गया है कि पार्टी लाइन से भटके तो दरवाजा खुला है. अलबत्ता पायलट खुद बगावत और अनुशासन के कई दौर देख चुके हैं, लिहाजा वे नब्ज पहचानते हैं. अब एक नोटिस मिलेगा और फिर सीधे बाहर का रास्ता. राजनीतिक प्रेक्षक इसे 2027 के दंगल से पहले कैडर की ओवरहॉलिंग मान रहे हैं. सचमुच जब अपनी ही फौज आपस में लड़े तो सेनापति को हंटर चलाना ही पड़ता है. अब प्रश्न यही है कि क्या पंजाब के ये कद्दावर नेता पायलट के कड़े अनुशासन के सांचे में ढल पाएंगे?

2.संगठन में अधिकारों की जंग..सचिवों के इंटरव्यू पर बवाल !

काम किसी का, इंटरव्यू किसी का... खरगे जी कहां हैं?

पार्टी संगठन को चाक-चौबंद करने के नाम पर कांग्रेस में नया महाभारत छिड़ गया है. करीब सवा सौ सचिव पद के दावेदारों के इंटरव्यू खुद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ले रहे हैं, जिससे पुराने दरबारी असहज हो उठे हैं. वरिष्ठ नेताओं का दबी जुबान में कहना है कि जब ये सचिव केसी वेणुगोपाल के मातहत काम करेंगे तो उनकी काबिलियत परखने का जिम्मा परिवार ने खुद क्यों संभाला? अलबत्ता, इस पूरी चयन प्रक्रिया से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का दूर रहना भी कानाफूसी का सबब बन गया है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे गांधी परिवार द्वारा संगठन पर अपनी पकड़ को सीधे बनाए रखने की कवायद बता रहे हैं. सचमुच जब पद-मर्यादा की लक्ष्मण रेखाएं धुंधली पड़ जाएं तो असंतोष लाजिमी है. अब प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या गांधी परिवार का यह सीधा दखल वेणुगोपाल की कार्यशैली पर अविश्वास का संकेत है?

3.यूपी में निषाद की नैया अखिलेश के पाले में जाने की आहट ?

मछली की आंख पर निशाना, जाल एनडीए में या सपा में?

उत्तर प्रदेश की सियासत में सहयोगी दलों के तेवर हमेशा से सत्ता का पारा चढ़ाते रहे हैं. निषाद पार्टी के मुखिया डॉ. संजय निषाद की अखिलेश यादव से बढ़ती नजदीकियों ने भाजपा रणनीतिकारों के माथे पर सिलवटें ला दी हैं. निषाद ने एनडीए को साफ अल्टीमेटम थमा दिया है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे नया ठिकाना तलाशने में देर नहीं करेंगे. उधर समाजवादी पार्टी भी निषाद वोट बैंक को अपने 'पीडीए' फॉर्मूले में फिट करने के लिए बाहें फैलाए तैयार बैठी है. अलबत्ता सत्ता की मलाई छोड़ विपक्ष की नाव में सवार होना आसान फैसला नहीं होता. राजनीतिक प्रेक्षक इसे पूर्वांचल की सीटों पर अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने का पुराना नुस्खा मान रहे हैं. सचमुच यूपी की राजनीति में जातीय क्षत्रपों की मांगें कभी खत्म नहीं होतीं. प्रश्न यह है कि क्या निषाद सच में पाला बदलेंगे या यह सिर्फ दबाव की सियासत है?

4.डिजिटल पेमेंट और विदेशी गणित !

कटा यूपीआई का पैसा, और विलेन बन गया अमेरिका!

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने डिजिटल लेनदेन पर छिड़ी बहस को नया अंतरराष्ट्रीय मोड़ दे दिया है. पार्टी मुख्यालय से प्रवक्ताओं को हिदायत दी गई है कि ₹2000 से अधिक के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर लगने वाले शुल्कों का सीधा संबंध अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से जोड़कर जनता के सामने परोसा जाए. कांग्रेस का आरोप है कि डिजिटल इंडिया के जरिए कटने वाला मुनाफा अमेरिकी वित्तीय हितों की झोली में जा रहा है. अलबत्ता 55 करोड़ से अधिक यूपीआई यूजर्स को यह जटिल आर्थिक समीकरण समझाना प्रवक्ताओं के लिए आसान नहीं होगा. राजनीतिक प्रेक्षक इसे स्थानीय आर्थिक नाराजगी को वैश्विक पूंजीवाद और ट्रंप के विरोध से जोड़ने का अनूठा प्रयोग मान रहे हैं. सचमुच तकनीकी फीस का ठीकरा वाशिंगटन पर फोड़ना कल्पनाशीलता की पराकाष्ठा है. अब प्रश्न यह है कि क्या आम उपभोक्ता इस भारी-भरकम नैरेटिव को पचा पाएगा?

5.यूपी में मुंगेरीलाल के हसीन सपने !

सूत न कपास, जुलाहे से लट्ठम-लठ्ठा!..सीट शेयरिंग से पहले ही पावर शेयरिंग पर अड़ी कांग्रेस !

उत्तर प्रदेश में अभी चुनाव दूर हैं और सीटों का कोई अता-पता नहीं, लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों ने भावी सरकार के मंत्रालयों की सूची बनानी शुरू कर दी है. पार्टी के भीतर यह सुर जोर पकड़ रहा है कि तमिलनाडु में डीएमके और कश्मीर में एनसी को बाहर से समर्थन देकर संगठन को सिर्फ नुकसान हुआ है, इसलिए अखिलेश यादव से पहले ही कैबिनेट में हिस्सेदारी का पक्का वादा लिया जाए. कांग्रेस अब महज झंडा उठाने वाली भूमिका में नहीं रहना चाहती. अलबत्ता समाजवादी पार्टी का कैडर इसे 'जमीन कम और ख्वाब ज्यादा' करार दे रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि बिना जनाधार मजबूत किए सत्ता की मलाई मांगना गठबंधन में दरार का सबब बन सकता है. सचमुच जब नीव की ईंट रखी न गई हो और कंगूरे पर झगड़ा शुरू हो जाए, तो इसे क्या कहेंगे? अब प्रश्न यह है कि क्या अखिलेश कांग्रेस की इस जल्दबाजी वाली शर्त को कभी स्वीकार करेंगे?

ये भी पढ़ें- Political popcorn: उमा भारती के ‘डोकरा’ बयान से गरमाई सियासत, राहुल गांधी पर तंज से छिड़ी नई जुबानी जंग