Political popcorn: उमा भारती के ‘डोकरा’ बयान से गरमाई सियासत, राहुल गांधी पर तंज से छिड़ी नई जुबानी जंग

Political popcorn: उमा भारती के ‘डोकरा’ बयान से राहुल गांधी की उम्र और युवा नेतृत्व पर बहस छिड़ गई है, अब सियासी वार-पलटवार तेज होता दिख रहा है.

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Political Popcorn

1.उम्र का तड़का या सियासत का नया अखाड़ा?

उमा भारती के 'डोकरा' वाले बोल पर गरमाई सियासत !

​सियासी फिजा में जब बयानबाजी की हांडी चढ़ती है तो शब्दों के बुलबुले फूटना लाजिमी है. मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की फायरब्रांड नेता उमा भारती ने राहुल गांधी पर सीधा शाब्दिक प्रहार करते हुए उन्हें 'बूढ़ा' और ठेठ देशी लहजे में 'डोकरा' तक कह डाला. उनका तर्क था कि इस पड़ाव पर तो लोग नाती-पोते खिलाने लगते हैं, फिर भला वे युवाओं के रहनुमा कैसे कहलाए जा सकते हैं. अलबत्ता उमा ने पड़ोसी मुल्क नेपाल का हवाला देते हुए यह भी रेखांकित किया कि बगावत चाहे नौजवान करें पर बागडोर तजुर्बेकार हाथों में ही सौंपी जाती है, लिहाजा देश का युवा आज भी नरेंद्र मोदी की ओर ही देखता है. सचमुच इस बयान के बाद कांग्रेस खेमे में तीखा आक्रोश फैलना तय था जहां प्रवक्ताओं ने इसे अमर्यादित करार देकर तुरंत मोर्चा संभाल लिया. राजनीतिक प्रेक्षक इसे नेता-प्रतिपक्ष के 'यूथ कनेक्ट' पर सुनियोजित मनोवैज्ञानिक सेंधमारी और चुनावी नब्ज को कुरेदने की कोशिश मान रहे हैं. अब सियासी चौपाल पर सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि क्या राजनीति में नेतृत्व की प्रासंगिकता जन्म प्रमाण-पत्र की तारीख से तय होगी या जनता के बीच खिंचने वाली लकीर से? 

2.तीर का निशाना या 'ब्रांड नीतीश' का नया फसाना?

JDU का नाम 'जेडी नीतीश' करने की सुगबुगाहट ..पार्टी में बगावती सुर ! 

​बिहार की सियासत में जब-तब ऐसे शोले भड़कते हैं जिनकी तपिश सीधे दिल्ली तक महसूस होती है. जनता दल (यूनाइटेड) का नाम बदलकर 'जेडी नीतीश' किए जाने के कथित प्रस्ताव ने पार्टी के भीतर ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है कि तंबुओं की रस्सियां ढीली होती दिख रही हैं. राज्यसभा सांसद संजय झा की इस कथित पहल पर कई सांसदों और वरिष्ठ नेताओं ने खुलेआम मोर्चा खोलते हुए साफ कह दिया कि संघर्षों से उपजी पार्टी किसी की निजी बपौती नहीं हो सकती. अलबत्ता संजय झा और ललन सिंह के खिलाफ अंदरखाने तेवर इतने तल्ख हो चुके हैं कि असंतुष्ट खेमा अब शीर्ष नेतृत्व की कथित मनमानी के खिलाफ लामबंद नजर आ रहा है. सचमुच चर्चाओं का बाजार तब और गर्म हो गया जब नाराज सांसदों के तार कांग्रेस आलाकमान से जुड़ने की फुसफुसाहट गलियारों में तैरने लगी. राजनीतिक प्रेक्षक इसे 'यूनाइटेड' कुनबे में वजूद की रस्साकशी और बड़े राजनीतिक फेरबदल की पूर्वपीठिका के रूप में देख रहे हैं. अब सियासी बिसात पर सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि क्या 'नीतीश' नाम का यह नया दांव पार्टी को एकजुट रख पाएगा या फिर तीर कमान से छूटकर बगावत की नई इबारत लिखेगा?

3. कुआलालंपुर की गर्मजोशी या कूटनीति की नई लकीर?

राहुल-अनवर मुलाकात का इनसाइड ट्रैक..पुराने एहसान और नए समीकरण !

सियासी गलियारों में प्रोटोकॉल से इतर मुलाकातों के अपने ही मायने निकाले जाते हैं. मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम और राहुल गांधी के बीच हुई गुफ्तगू ने राजनयिक हलकों में नई सुगबुगाहट छेड़ दी है. मनमोहन सिंह के दौर में जब अनवर नजरबंदी के सख्त दौर से गुजर रहे थे, तब गांधी परिवार ने उनके बच्चों की तालीम के लिए हाथ आगे बढ़ाया था. अनवर ने मदद लिए बिना भी उस सियासी हमदर्दी को दिल में संजोए रखा. अलबत्ता सरकार से इतर विपक्ष के नेता से इस गर्मजोशी भरी मुलाकात पर सत्ता पक्ष के कान खड़े होना स्वाभाविक है. सचमुच निजी रिश्तों की यह गर्माहट अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी अलग चमक बिखेरती है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे राहुल गांधी के बढ़ते कूटनीतिक रसूख और विदेशी रिश्तों को साधने की कवायद मान रहे हैं. अब प्रश्न यही है कि मलेशियाई पीएम की अगली दिल्ली यात्रा पर इस निजी बॉन्डिंग का कूटनीतिक असर किस रूप में दिखेगा?

4.लखनऊ की गद्दी या दिल्ली दरबार का रुतबा?

यूपी कांग्रेस में वर्चस्व की जंग !

यूपी कांग्रेस में 'दो पाटन के बीच' वाली स्थिति बन गई है, जहां प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और नवनियुक्त प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के बीच तलवारें खिंच चुकी हैं. दूसरे दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल कराने की ऐसी होड़ मची है कि गौतम दिल्ली में पर्चियां कटवा रहे हैं तो अजय राय लखनऊ के दफ्तर में माला पहना रहे हैं. अलबत्ता अपनी कुर्सी पर मंडराते खतरे को भांपते हुए राय ने आक्रामक तेवर अख्तियार कर आलाकमान को अपनी जमीनी पकड़ दिखाने की ठान ली है. सचमुच दिल्ली बनाम लखनऊ के इस सत्ता संघर्ष ने निचले कार्यकर्ताओं को घनचक्कर बना दिया है कि आखिर हाजिरी कहां लगाएं. राजनीतिक प्रेक्षक इसे यूपी में कांग्रेस के संगठनात्मक भंवर का पुराना मर्ज बता रहे हैं. यक्ष प्रश्न यह है कि क्या दो पावर सेंटर्स की यह खींचतान पार्टी को रिवाइव करेगी या आपसी कलह में ही डुबो देगी?

5.आगरा की बिसात और 'दलित' वोट बैंक की घात!

कांग्रेस-बसपा के गढ़ में सपा की सेंध ?

उत्तर प्रदेश में 2027 की लड़ाई के लिए मोहरे अभी से बिछाए जाने लगे हैं. समाजवादी पार्टी 15 नवंबर को आगरा में विशाल दलित महासम्मेलन करने जा रही है, जिसकी कमान खुद अखिलेश यादव ने संभाल ली है. कांग्रेस द्वारा राजेंद्र पाल गौतम को दलित मामलों का प्रभारी बनाए जाने के बाद सपा खेमे में हलचल बढ़ना लाजमी था. अलबत्ता पीडीए के नारे को जमीन पर उतारने के लिए जाटव समेत तमाम उपजातियों को साधना अखिलेश के लिए बेहद जरूरी हो गया है. सचमुच ताजनगरी से पश्चिमी यूपी के दलित बाहुल्य इलाकों में संदेश देकर बसपा और कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक पर नजर गड़ा दी गई है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे सपा की आक्रामक सोशल इंजीनियरिंग का अहम हिस्सा बता रहे हैं. प्रश्न यह है कि क्या गैर-यादव और गैर-मुस्लिम वोटों को अपने पाले में खींचने का यह चक्रव्यूह जमीन पर टिक पाएगा ? इधर भाजपा भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी है डबल इंजन सरकार की 'लाभार्थी योजनाओं' का सधा हुआ कवच विरोधियों के चक्रव्यूह को भेदने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है !

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