1.खाकी की जंग में बजती रही सीएम की घंटी !
सिफारिशों का शोर..अब फाइल पर लगा ब्रेक!
एक हिंदी भाषी राज्य के सत्ता के तारों में उस वक्त जोरदार करंट दौड़ गया, जब एक राज्य के मुख्यमंत्री के निजी फोन पर देश के बड़े-बड़े सियासी सूरमाओं की घंटियां लगातार घनघनाने लगीं. मसला कोई राष्ट्रीय सुरक्षा या लोक-कल्याणकारी योजना का नहीं, बल्कि राज्य के पुलिस महानिदेशक की मखमली कुर्सी पर अपने चहेते आईपीएस को बैठाने की मची होड़ का था. दो वरिष्ठ आईपीएस अफसरों ने अपनी-अपनी ताजपोशी के लिए दिल्ली दरबार से लेकर सूबे के सिपहसालारों तक ऐसी तगड़ी लॉबिंग भिड़ाई कि सीएम साहब का फोन साइलेंट होने का नाम ही नहीं ले रहा था. अलबत्ता जब सुबह की चाय से लेकर देर रात की फाइलों तक सिर्फ 'हमारे वाले साहब का ख्याल रखिएगा' वाली सिफारिशों की झड़ी लग गई, तो मुख्यमंत्री का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया. सचमुच जब प्रशासनिक योग्यता से ज्यादा फोन कॉल्स का वजन भारी पड़ने लगे तो अच्छे-अच्छे राजनेता का धैर्य जवाब दे जाता है. राजनीतिक प्रेक्षक चटखारे लेकर बता रहे हैं कि सीएम इतने आजिज आ गए कि उन्होंने आव देखा न ताव, तुरंत गृह विभाग के आला अफसरों को तलब कर साफ फरमान सुना दिया..'डीजीपी पैनल के नामों की फाइल जहां है, वहीं रोक दी जाए, आगे भेजने की रत्ती भर जरूरत नहीं है!' सत्ता पक्ष के करीबी इसे मुख्यमंत्री की बेदाग प्रशासनिक सख्ती और बिना दबाव काम करने की शैली बता रहे हैं, तो वहीं विरोधी खेमा दबी जुबान में चुटकी ले रहा है कि जब अपनों के ही फोन सिरदर्द बन जाएं, तो फाइल दबाना ही सबसे महफूज सियासी ढाल बन जाता है.
2.केरल बिजली संकट पर सियासी संग्राम !
जब करंट जनता को लगे और बिल विपक्ष फाड़े!
केरल में गहराते बिजली संकट के बीच भाजपा ने पिनाराई विजयन की वामपंथी सरकार पर पुराना पावर परचेज एग्रीमेंट रद्द कर राज्य पर 2,130 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ लादने का तीखा आरोप लगाया है. अलबत्ता राज्य सरकार इसे वित्तीय प्रबंधन और कानूनी समीक्षा का हिस्सा बताकर अपना बचाव कर रही है. सचमुच दक्षिण के इस राज्य में बिजली की दरें और लोड शेडिंग अब सीधे सियासी अखाड़े का विषय बन चुके हैं. राजनीतिक प्रेक्षक देख रहे हैं कि वाम मोर्चा और विपक्षी खेमा इस मुद्दे पर एक-दूसरे की फाइलें खंगालने में जुटे हैं. सत्ता पक्ष केंद्र की नीतियों को कोयला और सप्लाई की किल्लत का जिम्मेदार ठहरा रहा है, तो विपक्ष इसे शुद्ध भ्रष्टाचार और मिलीभगत का मामला बता रहा है. अब प्रश्न यही है कि इस सियासी आरोप-प्रत्यारोप के बीच क्या आम उपभोक्ता को सस्ते में चौबीसों घंटे बिजली नसीब हो पाएगी ?
3.इधर नियम तय हुए, उधर 'छोले-भटूरे' तलाशे गए !
विदेश नीति में नुक्स न मिला तो खाने का पर्चा खंगाला!
नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समापन के साथ ही भारत मंडपम से निकली गूंज ने वैश्विक कूटनीति का रुख मोड़ दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक सहयोग, बहुध्रुवीय व्यवस्था और 'ग्लोबल साउथ' के अधिकारों पर ऐसा चक्रव्यूह रचा कि दुनिया के शीर्ष नेता भारत के प्रभाव और दूरदर्शी एजेंडे के कायल हो गए. अलबत्ता जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की विदेश नीति इतनी अभेद्य साबित हुई कि उसमें सुई की नोक बराबर भी खामी निकालने की गुंजाइश नहीं बची तो घरेलू राजनीति का एक तबका सीधे डिनर की थाली पर उतर आया. जहां पुतिन और अन्य राष्ट्राध्यक्षों के सामने मिलेट्स, पनीर लबाबदार और कश्मीरी गुच्छी का पारंपरिक भारतीय स्वाद परोसा जा रहा था, वहां विपक्ष के कुछ रणनीतिकार '80 फीसदी नॉन-वेज बनाम छोले-भटूरे' का सोशल मीडिया पर हिसाब जोड़ने लगे. सचमुच वैश्विक शिखर सम्मेलन में जब आलोचना का पैमाना नीतिगत दस्तावेजों से फिसलकर डिनर मेन्यू और भोजन की प्राथमिकताओं पर आकर सिमट जाए, तो समझ लेना चाहिए कि विरोध का तरकश खाली हो चुका है. राजनीतिक प्रेक्षक चटखारे लेते हुए कह रहे हैं कि जब सम्मेलन के साझा घोषणापत्र में एक भी कमजोर कड़ी नहीं मिली, तो थाली की कटोरी में चम्मच ढूंढने जैसी मजबूरी साफ झलकने लगी !
4.2029 से पहले भाजपा राज्यों में यूसीसी का रोडमैप..शाह का बड़ा ऐलान !
चुनावी कैलेंडर से पहले ही कानून की तारीख तय!
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ संकेत दे दिया है कि साल 2029 से पहले सभी भाजपा शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता UCC लागू करने की व्यापक योजना तैयार है. इस बयान के आते ही सियासत का पारा अचानक चढ़ गया. अलबत्ता सत्ता पक्ष इसे 'एक देश, एक विधान' के अपने पुराने वादे की संवैधानिक परिणति बता रहा है, जिसमें किसी भी पक्षपात की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है. सचमुच विपक्षी रणनीतिकारों के दफ्तरों में अब इस बात पर माथापच्ची शुरू हो गई है कि क्या यह ध्रुवीकरण का पासा है या फिर सुधारों का नया दौर. विरोधी खेमे में इस बात पर बहस छिड़ी है कि इसका विरोध खुलकर करें या कानूनी पेच में उलझाएं ! राज्यों के स्तर पर लागू होने वाला यह कानून क्या 2029 के आम चुनाव की पिच पहले से ही तैयार कर रहा है !
5.एमएलसी की आठ सीटों पर लालटेन का 'सोलो शो' !
गठबंधन की डगर पर दरार का नया पैच!
बिहार के महागठबंधन के भीतर का चूल्हा एक बार फिर विधान परिषद MLC की खाली सीटों के धुएं से भर गया है. राष्ट्रीय जनता दल ने बिना किसी साझा बैठक या औपचारिकता के एकतरफा अंदाज में 8 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी. अलबत्ता इस घोषणा के साथ ही पटना के सियासी पारे ने ऐसी छलांग लगाई कि कांग्रेस और लेफ्ट के दफ्तरों में सन्नाटे के बाद सुगबुगाहट का दौर शुरू हो गया. सचमुच जब गठबंधन के बड़े भाई ही प्लेट की सारी मलाई खुद समेट लें, तो छोटे भाईयों का भड़कना लाजिमी ही था.
वामदलों के कैडर में तो खुलकर आरजेडी को 'अकेले चलने दो' की आवाजें उठने लगी हैं, जबकि कांग्रेस के अंदरूनी खेमे में नेता दबी जुबान से पूछ रहे हैं कि बिहार में यह गठबंधन अब जिंदा भी है या सिर्फ कागजी फाइलों में सांस ले रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि आरजेडी की राजनीति का पुराना मुहावरा है-'जब अपना पलड़ा भारी, तो साझेदारी कैसी?' इधर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व चुप्पी साधे बैठा है, तो उधर लालटेन की रोशनी में वामपंथियों के चेहरे लाल हो चुके हैं !
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