TTP ने पाकिस्तान के उस कमजोर नस पर किया हमला, चीन तक महसुस हुआ दर्द, सेना बुलाने को मजबूर हुए मुनिर

पाकिस्तान इस समय एक गहरे सुरक्षा संकट से गुजर रहा है. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने हाल के महीनों में अपने हमलों की दिशा और रणनीति में बड़ा बदलाव किया है.

TTP attacked that weak nerve of Pakistan even China felt the pain
प्रतिकात्मक तस्वीर/ Sociel Media

इस्लामाबाद: पाकिस्तान इस समय एक गहरे सुरक्षा संकट से गुजर रहा है. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने हाल के महीनों में अपने हमलों की दिशा और रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. अब इस आतंकवादी संगठन का फोकस सिर्फ पारंपरिक सैन्य ठिकानों पर हमले करने तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि उसने सीधे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को निशाने पर ले लिया है. इस बदलाव ने पाकिस्तान की सरकार और सेना दोनों को असहज कर दिया है, वहीं चीन के भीतर भी इसको लेकर चिंता की लहर दौड़ गई है.

CPEC, जो पाकिस्तान की आर्थिक रीढ़ मानी जाती है और चीन के साथ उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा है, अब टीटीपी के लिए एक नया युद्धक्षेत्र बन चुका है. रिपोर्टों के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे अशांत क्षेत्रों में टीटीपी ने कई CPEC परियोजनाओं और मार्गों को प्रभावित किया है. विशेष रूप से इस्लामाबाद-डीआई खान (M-14) मार्ग पर सेना और टीटीपी के बीच मुठभेड़ें बढ़ रही हैं.

इन हमलों के कारण पाकिस्तानी सेना को अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव करना पड़ रहा है. देश की सीमाओं की सुरक्षा में लगे सैनिकों को अब आंतरिक इलाकों में तैनात किया जा रहा है ताकि CPEC परियोजनाओं की रक्षा की जा सके. इससे न केवल सीमावर्ती इलाकों में सैन्य मौजूदगी कमजोर हुई है, बल्कि आतंरिक अस्थिरता भी तेजी से बढ़ रही है.

कबायली इलाकों में बढ़ता TTP का प्रभाव

खुफिया रिपोर्टों और मीडिया स्रोतों के अनुसार, टीटीपी ने कई कबायली इलाकों में अपने प्रभाव को बढ़ाया है और CPEC कॉरिडोर के कुछ हिस्सों पर कब्जा भी कर लिया है. इससे यह साफ हो गया है कि संगठन अब सिर्फ छिपकर हमले करने वाली ताकत नहीं रहा, बल्कि वह इन क्षेत्रों में वास्तविक नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.

पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा के पास टीटीपी की बढ़ती गतिविधियां न केवल आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हैं, बल्कि यह पाकिस्तान की विदेश नीति और क्षेत्रीय रणनीति को भी अस्थिर कर रही हैं. अफगान तालिबान के साथ संबंधों में तनाव के चलते पाकिस्तान के पास निर्णायक कार्रवाई करने के विकल्प भी सीमित हो गए हैं.

आर्थिक मोर्चे पर भी हमला

टीटीपी अब केवल सैन्य हमलों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने पाकिस्तान पर आर्थिक युद्ध भी छेड़ दिया है. संगठन CPEC परियोजनाओं पर काम कर रहे ठेकेदारों और कंपनियों से 'हफ्ता' वसूलने की कोशिश कर रहा है. पैसे न देने पर निर्माण स्थलों पर धमकियां दी जा रही हैं, मजदूरों को डराया जा रहा है और इंजीनियरों को निशाना बनाया जा रहा है. इसका सीधा असर इन परियोजनाओं की प्रगति पर पड़ रहा है. सुरक्षा खतरों के साथ-साथ आर्थिक अनिश्चितता ने परियोजनाओं की लागत और समयसीमा दोनों को प्रभावित किया है.

चीन भी हो रहा चिंतित

CPEC में सबसे बड़ा निवेशक चीन है और यह परियोजना चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का अहम हिस्सा है. ऐसे में CPEC पर हमले चीन के लिए एक बड़ी चिंता बन चुके हैं.

चीन को अब लगने लगा है कि पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था उसकी परियोजनाओं की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है. इस वजह से बीजिंग अब CPEC में निजी चीनी सुरक्षा एजेंसियों को तैनात करने पर विचार कर रहा है. यह पाकिस्तान की संप्रभुता के लिहाज से भी एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है, क्योंकि किसी बाहरी देश की सुरक्षा व्यवस्था का संचालन पाकिस्तान की जमीन पर होना एक संवेदनशील मुद्दा बन सकता है.

सेना प्रमुख असीम मुनीर के सामने नई चुनौती

पाकिस्तानी सेना के चीफ जनरल असीम मुनीर इस वक्त दोतरफा दबाव में हैं. एक तरफ सीमाओं की सुरक्षा बनाए रखना जरूरी है, दूसरी ओर देश के भीतर रणनीतिक परियोजनाओं की रक्षा करना भी अनिवार्य हो गया है.

टीटीपी की बदली रणनीति और आंतरिक सुरक्षा के लिए बढ़ता खतरा सेना को अपने पारंपरिक दृष्टिकोण से बाहर आने के लिए मजबूर कर रहा है. सीमावर्ती क्षेत्रों से सैनिकों को हटाकर आंतरिक मोर्चों पर तैनात करना न केवल एक सामरिक बदलाव है, बल्कि इससे पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और रणनीतिक प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं.

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