China-US Tensions: वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद वैश्विक राजनीति में एक बार फिर तनाव गहरा गया है. अमेरिकी सैनिकों द्वारा राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस को हिरासत में लिए जाने की घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी है. इस घटनाक्रम का असर केवल लैटिन अमेरिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव अमेरिका और चीन के रिश्तों पर भी दिखाई देने लगा है.
अमेरिकी रणनीतिक हलकों में अब सबसे बड़ी चिंता यह है कि चीन इस मौके का फायदा उठाकर ताइवान को लेकर कोई बड़ा सैन्य कदम उठा सकता है. अगर ऐसा होता है, तो इसके नतीजे केवल एशिया ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकते हैं.
ताइवान के पास योनागुनी बना नई फ्रंटलाइन
ताइवान के बेहद करीब स्थित जापान का छोटा सा द्वीप योनागुनी अब रणनीतिक रूप से बेहद अहम बन चुका है. यह द्वीप ताइवान से लगभग 70 मील की दूरी पर है और भौगोलिक रूप से जापान की राजधानी टोक्यो की तुलना में ताइपे के ज्यादा नजदीक पड़ता है.
एक समय तक गोताखोरी और पर्यटन के लिए मशहूर यह द्वीप अब पूरी तरह से सैन्य चौकी में तब्दील हो चुका है. यहां उन्नत रडार सिस्टम लगाए गए हैं और PAC-3 मिसाइल डिफेंस सिस्टम की तैनाती की गई है. स्थानीय निवासियों का कहना है कि भारी सैन्य उपकरणों की वजह से मोबाइल नेटवर्क और रोजमर्रा की सुविधाओं पर असर पड़ रहा है.
अमेरिका के लिए योनागुनी क्यों है अहम
योनागुनी जापान के ओकिनावा प्रांत का हिस्सा है, जो लंबे समय से अमेरिका की सैन्य रणनीति का अहम केंद्र रहा है. अमेरिका और जापान के बीच सुरक्षा समझौता है, जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं. इसी समझौते के तहत अमेरिका ने जापान में करीब 55 हजार सैनिक तैनात किए हैं.
इनमें से 30 हजार से ज्यादा सैनिक ओकिनावा में मौजूद हैं, जो ताइवान से लगभग 360 मील की दूरी पर है. सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ताइवान संकट की स्थिति में यही सैनिक अमेरिका की पहली और सबसे महत्वपूर्ण सैन्य ताकत साबित होंगे.
चीन की बढ़ती सैन्य ताकत से बढ़ी चिंता
बीते कुछ वर्षों में चीन ने अपनी सैन्य क्षमता में जबरदस्त इजाफा किया है. आज उसके पास सैनिकों की संख्या, युद्धपोतों और लड़ाकू विमानों के मामले में अमेरिका से अधिक संसाधन हैं. इसके साथ ही चीन के परमाणु हथियारों का जखीरा भी तेजी से बढ़ रहा है.
चीन लगातार यह दोहराता रहा है कि ताइवान उसका अभिन्न हिस्सा है और जरूरत पड़ने पर वह बल प्रयोग से उसे अपने नियंत्रण में ले सकता है. यही वजह है कि अमेरिका किसी भी अप्रत्याशित कदम को लेकर सतर्क है.
अमेरिका और जापान ने तेज की सैन्य तैयारियां
इस संभावित खतरे को देखते हुए अमेरिका और जापान ने अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर दी हैं. दोनों देशों ने हाल ही में अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त सैन्य अभ्यास “Resolute Dragon” आयोजित किया, जिसमें करीब 20 हजार सैनिकों ने हिस्सा लिया.
इस अभ्यास में अमेरिका के अत्याधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया. Typhon मिसाइल सिस्टम के जरिए टॉमहॉक मिसाइलें दागी जा सकती हैं, जिनकी मारक क्षमता लगभग 1,000 मील तक है. वहीं नेमेसिस एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम दुश्मन के समुद्री जहाजों को निशाना बनाने में सक्षम है.
ताइवान संकट के लिए क्षेत्रीय ठिकाने तैयार
अमेरिका ने योनागुनी जैसे द्वीपों पर ईंधन भरने के अस्थायी ठिकाने बनाए हैं और सैनिकों की तेज तैनाती का अभ्यास शुरू कर दिया है. इसके अलावा फिलीपींस, दक्षिण कोरिया और गुआम में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी ताइवान संकट की स्थिति के लिए तैयार किया जा रहा है. इन तैयारियों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी आपात स्थिति में अमेरिका तेजी से जवाबी कार्रवाई कर सके.
ताइवान ने भी बढ़ाया रक्षा बजट
ताइवान भी संभावित खतरे को लेकर अपनी रक्षा तैयारियों में इजाफा कर रहा है. उसने अपना रक्षा बजट बढ़ाकर GDP का 3.3 प्रतिशत कर दिया है और इसे 2030 तक 5 प्रतिशत तक ले जाने की योजना बनाई है. अमेरिका ने ताइवान को HIMARS रॉकेट सिस्टम, जैवलिन मिसाइलें और अन्य आधुनिक हथियार देने का ऐलान किया है, हालांकि इनकी पूरी आपूर्ति में समय लग सकता है.
वेनेजुएला से शुरू हुआ तनाव बना वैश्विक संकट
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका का समर्थन नहीं मिला, तो ताइवान के लिए चीन जैसी बड़ी सैन्य शक्ति के सामने टिक पाना बेहद मुश्किल होगा. यही कारण है कि वेनेजुएला में हुई अमेरिकी कार्रवाई अब चीन-अमेरिका टकराव के एक बड़े भू-राजनीतिक संकट में बदलती नजर आ रही है.
वेनेजुएला से शुरू हुआ यह तनाव अब ताइवान को लेकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अस्थिरता की बड़ी वजह बन सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
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