1. कलाई पर रक्षा का धागा... और देश की सुरक्षा का पक्का इरादा!
प्रधानमंत्री ने स्कूली बच्चों और बहनों संग मनाया रक्षाबंधन का पावन पर्व
7, लोक कल्याण मार्ग पर रक्षाबंधन का उल्लास अपने पूरे रंग में नजर आया, जहां नन्हीं बच्चियों और बहनों ने प्रधानमंत्री को राखी बांधी. स्नेह, आशीर्वाद और मुस्कुराहटों के बीच सजी थालियों ने सियासी व्यस्तताओं के बीच एक आत्मीय माहौल बना दिया. अलबत्ता विरोधियों की नजरें इस बात पर भी टिकी रहीं कि इस सौहार्द के पीछे कौन सा नया जन-संदेश छिपा है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि त्योहारों के ऐसे सहज पल सीधे जनता के दिलों से जुड़ने का सबसे मजबूत माध्यम बनते हैं. यह सचमुच देखने लायक था कि कैसे देश की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठा राजनेता भी पारिवारिक और पारंपरिक धागों में उतनी ही सहजता से बंध जाता है. महिला सशक्तिकरण की योजनाओं को इस स्नेह की डोर से और कितनी मजबूती मिलेगी, यही आज का प्रश्न है.
2. मीठी-मीठी बातें और कलाई पर राखी...!
सत्ता और विपक्ष के दिग्गजों ने मतभेद भुलाकर मनाया रक्षाबंधन
रक्षाबंधन के पावन पर्व पर देश के सियासी फलक पर एक दुर्लभ सौहार्द देखने को मिला, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के तमाम शीर्ष नेताओं ने दलगत दीवारों को किनारे रखकर त्योहार मनाया. सोशल मीडिया से लेकर नेताओं के आवासों तक बधाइयों और बहनों द्वारा बांधी गई राखियों की तस्वीरें तैरती रहीं. अलबत्ता यह खामोशी और मिठास कितने दिन टिकेगी, इसे लेकर अंदरखाने सब अपने-अपने कयास लगा रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि त्योहारों पर जो चेहरे एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे हैं, वे कल फिर तीखे बयानों के तीर छोड़ते नजर आएंगे. सचमुच भारतीय लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि मतभेद कितने भी गहरे हों, रिश्तों की मर्यादा बनी रहती है. अब देखना यह है कि यह मीठा माहौल सियासी बयानों की कड़वाहट को कब तक थामे रख पाता है.
3. पहाड़ों से उतरा पानी... रिश्तों की परीक्षा या सियासत की कहानी?
नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन से हाहाकार, सीमावर्ती इलाकों में अलर्ट के बीच कूटनीतिक सक्रियता !
पहाड़ों पर लगातार हो रही मूसलाधार बारिश से नेपाल की नदियों ने रौद्र रूप धारण कर लिया है, जिससे सीमा पार भारी तबाही और सैलाब का मंजर है. नेपाल के पानी छोड़ते ही भारतीय सीमावर्ती इलाकों में भी अलर्ट सायरन बजने लगे हैं और राहत-बचाव तंत्र को पूरी तरह मुस्तैद कर दिया गया है. अलबत्ता संकट की इस घड़ी में भारत की ओर से तुरंत मदद का हाथ बढ़ाना कूटनीतिक रूप से भी बेहद अहम माना जा रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि काठमांडू की बदलती सियासत के बीच यह 'आपदा कूटनीति' दोनों देशों के रिश्तों को कितनी नई गर्माहट देती है. यह सचमुच कठिन इम्तिहान है कि हर साल आने वाले इस साझा जल-संकट का कोई स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पाता. क्या दोनों देश मिलकर इस कुदरती आफत की स्थायी रोकथाम कर पाएंगे ?
4. प्रेस रिलीज छोड़ अब रील्स पर थिरक रही सियासत...!
पीएम मोदी के डिजिटल मंत्र से बदला मंत्रियों का अंदाज, Gen-Z से सीधे जुड़ने को तैयार हुआ नया ‘डिजिटल अवतार’!
राजधानी के सत्ता प्रतिष्ठान में इन दिनों मंत्रियों के सोशल मीडिया हैंडल्स का तापमान अचानक बढ़ गया है. कैबिनेट की बैठक में जब खुद प्रधानमंत्री ने मंत्रियों से उनके डिजिटल एंगेजमेंट का हाल-चाल पूछ लिया, तो कई माननीयों के पसीने छूट गए. अलबत्ता अब पुराने ढर्रे वाली सूखी प्रेस विज्ञप्तियों और पारंपरिक तस्वीरों का दौर बीत चुका है. मंत्रियों को साफ ताकीद की गई है कि युवाओं और Gen-Z से जुड़ना है तो उनकी भाषा में बात करनी होगी. नतीजा यह कि अब बनावटी क्लिप्स की जगह सीधे, बेबाक और बिना भारी-भरकम एडिटिंग वाले वीडियोज की बाढ़ आ गई है.राजनीतिक प्रेक्षक इस बदलाव को बहुत गौर से देख रहे हैं, क्योंकि फेसबुक, एक्स और इंस्टाग्राम पर मंत्रियों के लाइक्स, शेयर्स और रीच का बाकायदा 'डिजिटल असेसमेंट' भी हो रहा है. सचमुच 21वीं सदी की राजनीति अब चौपालों से सिमटकर फोन की 6 इंच की स्क्रीन पर आ टिकी है, जहां ट्रेंडिंग रील्स ही जनता का मूड भांपने का नया पैमाना बन चुकी हैं !
5. किताब के पन्नों में उलझी सियासत और पब्लिशर की ना-नुकुर !
एडिट करने से मैडम का इनकार... पेंगुइन ने हाथ खींचे, हार्पर कॉलिन्स तैयार!
लुटियंस दिल्ली से लेकर अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक गलियारों तक सोनिया गांधी की आगामी किताब ‘Belonging: A Journey of Love’ को लेकर जबर्दस्त सुगबुगाहट है. इस किताब में उनके निजी जीवन के अनछुए पहलुओं से लेकर सियासी सफर के कई बड़े उतार-चढ़ाव दर्ज हैं. चर्चा है कि दिग्गज प्रकाशक पेंगुइन ने पांडुलिपि में कुछ खास बदलाव और संशोधन सुझाए थे, अलबत्ता सोनिया गांधी अपनी मूल बात पर अडिग रहीं और कोई फेरबदल करने से साफ मना कर दिया. नतीजा यह हुआ कि पेंगुइन ने इसे छापने से अपने हाथ पीछे खींच लिए, जिसके बाद अब हार्पर कॉलिन्स से इसके प्रकाशन की संभावनाएं तेज हो गई हैं. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि किताब के जिन पन्नों पर प्रकाशक को हिचक थी, असली सियासी मसाला शायद उन्हीं पंक्तियों में छिपा है. किताब की अंतरराष्ट्रीय रिलीज के लिए 10 नवंबर 2026 की तारीख तय बताई जा रही है.अब साहित्य और राजनीति के शौकीनों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि बिना किसी काट-छांट के छपने जा रही यह किताब जब बाजार में आएगी, तो सियासी गलियारों में कौन-कौन से नए भूचाल लेकर आएगी ?