आज से खुलेगा भारत-चीन के बीच ऐतिहासिक 'सिल्क रूट', 6 साल बाद नाथू ला दर्रे से फिर शुरू होगा व्यापार

भारत और चीन के बीच सीमा पर स्थित नाथू ला दर्रा छह साल बाद एक बार फिर व्यापार के लिए खोला जा रहा है. साल 2020 में गलवान घाटी में हुए सैन्य संघर्ष और कोरोना महामारी के बाद इस रास्ते से होने वाला व्यापार पूरी तरह बंद हो गया था.

The Silk Route between India and China reopens today trade via the Nathu La Pass
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Nathu La Pass: भारत और चीन के बीच सीमा पर स्थित नाथू ला दर्रा छह साल बाद एक बार फिर व्यापार के लिए खोला जा रहा है. साल 2020 में गलवान घाटी में हुए सैन्य संघर्ष और कोरोना महामारी के बाद इस रास्ते से होने वाला व्यापार पूरी तरह बंद हो गया था. अब दोनों देशों के बीच सीमा व्यापार दोबारा शुरू होने जा रहा है. कारोबार भले ही बहुत बड़ा नहीं हो, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से इसे एक अहम कदम माना जा रहा है.

कभी सिल्क रूट का अहम हिस्सा था नाथू ला

नाथू ला दर्रा प्राचीन सिल्क रूट का हिस्सा रहा है. यह रास्ता तिब्बत की चुम्बी घाटी को सिक्किम और कोलकाता के बंदरगाह से जोड़ता था. एक समय ऐसा भी था जब भारत और चीन के बीच होने वाले ज्यादातर जमीनी व्यापार का रास्ता यही था. इस वजह से नाथू ला का ऐतिहासिक और व्यापारिक महत्व हमेशा खास रहा है.

1962 के युद्ध के बाद बंद हो गया था रास्ता

भारत-चीन युद्ध के बाद साल 1962 में नाथू ला दर्रे को पूरी तरह बंद कर दिया गया था. इसके बाद करीब 44 साल तक इस रास्ते से व्यापार नहीं हो सका. हालांकि इस दौरान सीमा पर एक परंपरा जारी रही, जिसमें दोनों देशों के डाक कर्मचारी तय जगह पर एक-दूसरे को डाक के थैले सौंपते थे. इसे दोनों देशों के बीच संपर्क का प्रतीक माना जाता था.

2006 में फिर शुरू हुआ था सीमा व्यापार

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच सहमति बनी और 6 जुलाई 2006 को नाथू ला दर्रे से व्यापार दोबारा शुरू किया गया. हालांकि उस समय व्यापार के लिए जिन सामानों की अनुमति दी गई थी, उनकी सूची काफी सीमित थी. इसी कारण यह रास्ता कभी बड़े कारोबारी केंद्र के रूप में विकसित नहीं हो पाया.

कारोबार छोटा, लेकिन महत्व बड़ा

बीते वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि नाथू ला से होने वाला व्यापार बहुत बड़ा नहीं रहा है. साल 2016 में यहां से लगभग 82.68 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ, जो अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन माना जाता है.

इसके बाद 2017 में डोकलाम विवाद के कारण व्यापार काफी घट गया और कारोबार 8.86 करोड़ रुपये तक सिमट गया. महामारी से पहले 2019 में यहां लगभग 43.51 करोड़ रुपये का व्यापार दर्ज किया गया था.

सीमा बंद होने के कारण सिक्किम के करीब 600 स्थानीय व्यापारी और ट्रांसपोर्टर भी प्रभावित हुए थे. अब व्यापार शुरू होने से उन्हें फिर से काम मिलने की उम्मीद है.

दोनों देशों के रिश्तों का संकेत माना जाता है

विशेषज्ञों का मानना है कि नाथू ला दर्रे से होने वाला व्यापार केवल सामान की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है. इस दर्रे का खुलना और बंद होना अक्सर भारत और चीन के रिश्तों की स्थिति को भी दिखाता है. जब दोनों देशों के संबंध बेहतर होते हैं तो व्यापार चलता है, जबकि तनाव बढ़ने पर सबसे पहले यही रास्ता बंद किया जाता है.

साल 2025 में भारत और चीन के बीच सिक्किम के नाथू ला, हिमाचल प्रदेश के शिपकी ला और उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से व्यापार दोबारा शुरू करने पर सहमति बनी थी. इसके बाद अब नाथू ला से व्यापार बहाल हो रहा है.

रिश्तों में सुधार की ओर एक कदम

गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्तों में काफी तनाव आ गया था. अब सीमा व्यापार शुरू होने के साथ-साथ सीधी उड़ानों, वीजा सेवाओं और कैलाश मानसरोवर यात्रा जैसी सुविधाओं को भी धीरे-धीरे बहाल किया जा रहा है. इसे दोनों देशों के बीच बातचीत बढ़ाने और तनाव कम करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है.

हालांकि इससे सीमा विवाद तुरंत खत्म नहीं होगा, लेकिन यह संकेत जरूर मिलता है कि दोनों देश बातचीत और सहयोग का रास्ता खुला रखना चाहते हैं.

अरुणाचल प्रदेश पर भारत का स्पष्ट रुख

जहां एक ओर सीमा व्यापार दोबारा शुरू हो रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत अरुणाचल प्रदेश को लेकर अपना रुख पहले की तरह साफ रखता है. चीन लंबे समय से अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता रहा है, लेकिन भारत लगातार इसे अपना अभिन्न हिस्सा बताता आया है.

अरुणाचल प्रदेश अपनी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोकतांत्रिक व्यवस्था और विविधता के लिए जाना जाता है. यहां रहने वाले लोग स्वतंत्र रूप से अपने प्रतिनिधि चुनते हैं और भारतीय संविधान के तहत सभी अधिकारों का लाभ उठाते हैं. भारत का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश हमेशा से देश का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा रहा है.

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