The JC Show: कहते हैं कि संकट की घड़ी में नेतृत्व की असली परीक्षा होती है और जब सवाल करोड़ों युवाओं के भविष्य का हो तब सिर्फ फैसले नहीं बल्कि भरोसा भी देना पड़ता है. नीट परीक्षा को लेकर देश भर में चिंता थी. छात्र सड़कों पर थे, अभिभावक परेशान थे और पूरे देश की नजर सरकार पर थी. ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ प्रशासनिक स्तर पर नहीं बल्कि सीधे युवाओं से संवाद का रास्ता चुना. सोशल मीडिया के जरिए लगातार संदेश दिया कि सरकार छात्रों के साथ खड़ी है और उनके भविष्य के साथ कोई समझौता नहीं होगा और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.
इसके बाद सरकार ने सिर्फ आश्वासन नहीं दिया बल्कि संसद में परीक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने वाला संशोधित विधेयक भी लाया जिस पर चर्चा भी हुई और वह पारित भी हुआ. सरकार का दावा है कि अब पेपर लीक जैसे अपराधों पर पहले से ज्यादा कहीं अधिक सख्त कारवाई होगी और ईमानदार छात्रों के सपनों की बेहतर सुरक्षा भी होगी. तो क्या यह सिर्फ एक कानून नहीं बल्कि युवाओं का विश्वास वापस जीतने की कोशिश है? क्या सरकार ने संकट के साथ-साथ संदेश भी दिया और समाधान भी दिया? आज इसी पर करेंगे चर्चा द जेसी शो में और हमारे साथ मौजूद है भारत 24 के सीईओ और एडिटर इन चीफ और फर्स्ट इंडिया के सीएमडी और एडिटर इन चीफ डॉ. जगदीश चंद्र.
सवाल: आज की जेसी शो की हमने हेडलाइन रखी है क्राइसिस टू क्योर मोदी डिलीवरर्स. आखिर इसके मायने क्या हैं?
जवाब: इस हेडलाइन का एक ही मैसेज है कि नरेंद्र मोदी के पास इस देश की हर समस्या का हर प्रॉब्लम का क्योर है, समाधान है, स्यूशन है. बिकॉज़ इट डिलीवरर्स नरेंद्र मोदी लिसंस, नरेंद्र मोदी रेस्पोंड्स, नरेंद्र मोदी रिफॉर्म्स, नरेंद्र मोदी टालते नहीं है. पूरे सिस्टम को रिसेट करते हैं. नरेंद्र मोदी संकट से घबराते नहीं है. नरेंद्र मोदी संकट को आगे पोस्टपोन नहीं करते हैं. एक्सटेंड नहीं करते हैं. और उसी समय उसका समाधान ढूंढने की कोशिश करते हैं. यही नरेंद्र मोदी की एक खास विशेषता है और यही कारण है कि केवल एक सप्ताह के दौरान उन्होंने सारे क्राइसिस को डिोल्व कर दिया और अपने कंट्रोल में किया और सारी सिचुएशन अब कहा जा सकता है द सिचुएशन अंडर द लीडरशिप ऑफ प्राइम मिनिस्टर हैज़ कम कंप्लीटली अंडर कंट्रोल.
उदाहरण के तौर पे सबसे पहला कदम नरेंद्र मोदी ने उठाया कि आंदोलनकारी छात्रों से उन्होंने डायरेक्ट कांटेक्ट को एस्टैब्लिश किया. एक सप्ताह में चार वीडियो सेल्फीज़ आप देखिए आज किसी ने कहा कि 90 करोड़ व्यूज उन सेल्फीज़ के थे. तो सबसे बड़ी सफलता यह है कि उनसे डायरेक्ट कांटेक्ट नरेंद्र मोदी का हुआ वर्सरीज वार्ताकारों के थ्रू जो है और फिर दूसरी सबसे बड़ी बात उसमें यह है संपर्क होने के बाद में कि जो चार बड़े कदम उन्होंने उठाए सबसे पहला कदम था धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा. दूसरा कदम था यह जो बिल पास हुआ है इसमें 10 वर्ष की सजा 10 करोड़ का जुर्माना हिस्टोरिक बिल जिसे कहना चाहिए देश के इतिहास में नकल को रोकने के लिए और इस चीटिंग को रोकने के लिए पेपर लीक को रोकने के लिए.
फिर देखिए उन्होंने हाई पावर कमेट का गठन किया है नीलकर्णी की अध्यक्षता में जो है फिर फास्ट ट्रैग जो कोर्ट्स है वो उन्होंने बनाए और उनकी समय सीमा तय की उसके अंदर कि दो महीने के अंदर इन्वेस्टिगेशन पूरा करेंगे एजेंसी और तीन महीने के अंदर फिर आपको ये ट्रायल को कंप्लीट करना होगा. फिर एजुकेशन सेक्रेटरी को हटाया. 47 लोगों को हटाया. वो सब सामान्य किस्म की बात है. इन दिस एंटायर प्रोसेस ऑफ़ डैमेज कंट्रोल एंड टू डिफ्यूज द क्राइसिस नरेंद्र मोदी पीएमओ लेड बाय पीके मिश्रा आल्सो प्लेड अ वेरी वाइटल एंड की रोल इन दिस एंटायर एक्सरसाइज. पीके मिश्रा का वो भी एक अद्भुत फंक्शनरी है. तो कहने का तात्पर्य है कि तीन चार बड़े कदम उठा के उन्होंने सारी सिचुएशन को क्राइसिस को डिफ्यूज कर दिया. इसलिए हेडलाइन यह है क्राइसिस टू प्योर मोदी डिलीवरर्स.
सवाल: जिस विनम्रता, शालीनता, करज, कन्वेक्शन के साथ इस पूरे मसले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डील किया है, उसे आप कैसे देखते हैं?
जवाब: ऑफ़ कोर्स मोदी इज़ अ मैन ऑफ़ करज एंड कन्विक्शन जिसे कहते हैं. और हमेशा संकट को सामने से खड़ा करता है ना. कैश द बुल बाय ह्ट जो कहावत है उसी तरह से मोदी चलते हैं. मोदी खुद यह जानते हैं और आपने खुद ने कहा कि सिंगल हैंडेडली उन्होंने डिलीवर किया है. सिंगल हैंडेडली इस स्ट्रेटजी बनाई और इसको सारे क्राइसिस को उन्होंने सॉर्ट आउट किया है. क्योंकि मोदी जानते हैं कि काम किसी का हो इस देश की जनता हर उपलब्धि के लिए हर फेलर के लिए मोदी की तरफ देखती है.
सफलता का शय भी उन्हीं को और विफलता है. तो लोग मोदी से उम्मीद करते हैं कि नरेंद्र मोदी अब क्या करते हैं? क्या कदम उठाते हैं? इसी धरना के तहत जो नरेंद्र मोदी के लिए एक क्राइसिस था. सरकार के लिए क्राइसिस था इन ए वे फॉर सम टाइम. उस क्राइसिस को उन्हें अपॉर्चुनिटी में कन्वर्ट कर दिया. नरेंद्र मोदी ने बड़े-बड़े ऐतिहासिक फैसले करवाए. नकल को रोकने के लिए, चीटिंग को रोकने के लिए, कॉपिंग को रोकने के लिए, पेपर लीक को रोकने के लिए जो है इस अपॉर्चुनिटी को इस क्राइसिस को उन्होंने अवेल किया और उसे अपॉर्चुनिटी में कन्वर्ट कर दिया. इसे कहते हैं. सो दिस इज़ ऑल अबाउट नरेंद्र मोदी.
सवाल: क्या प्रधानमंत्री मोदी द्वारा उठाए गए छह बड़े कदमों के बाद में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच में जो भरोसा कम हुआ था क्या वो फिर से रिस्टोर हो गया है?
जवाब: टू अ लार्ज एक्सटेंट दो बातें महत्वपूर्ण है टाइम इज अ हीलर एंड द डायलॉग इज अ की इट जस्ट अ बिगनिंग एक डायलॉग की शुरुआत हुई है. मैंने पहले भी कहा कि वी मे एग्री डिसए्री बट डायलॉग शुड कंटिन्यू. तो पहला प्रयास जो है और नरेंद्र मोदी का इनसे संपर्क करने का है वह कायम हो गया है. और यह जो भरोसे की बात है यह समय के साथ-साथ होगा. एंड आई एम श्योर इन अनदर फ्यू वीक्स मोदी विल अगेन एम एस अ हीरो ऑफ़ यूथ इन दिस कंट्री इन इंडिया. ऐसा मुझे लगता है.
सवाल: इस पूरे घटनाक्रम के दौरान एक दिन आधी रात को सेल्फी वीडियो जारी करके और उस पर 40 करोड़ से ज्यादा व्यूज आकर्षित करने वाले प्रधानमंत्री मोदी के इस पहल को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: पहले जबरदस्त है. ये एक्चुअल में उनकी लोकप्रियता है. जिसे कहना चाहिए इस सारे क्राइसिस के बावजूद नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार है. नरेंद्र मोदी की दर्शक संख्या बरकरार है. आप देखिए वो जो आप 40 करोड़ कह रहे हैं आज में किसी ने कहा कि 90 करोड़ हो गए हैं वो और 10 करोड़ फॉलोवर्स हैं. उस पार्टी के जो फॉलोवर्स हैं वो 2 करोड़ 68 लाख समथिंग है. नरेंद्र मोदी के हैं जो 10 करोड़ फॉलोवर्स दैट वे हो गए हैं. तो आज हम ये कह सकते हैं कि मोदी वर्ल्ड नंबर वन Instagram फेस सबसे ज्यादा लोकप्रियता सबसे ज्यादा उनके फॉलोअर्स व्यूअर्स जो हैं वो नरेंद्र मोदी के हैं इस संसार के अंदर तो यह फैक्ट है कि उनका जो पहला वीडियो था वो सुपरहिट हुआ वो उन आंदोलनकारी छात्रों तक भी पहुंचा देश के आम नागरिक तक पहुंचा और इसीलिए उसका इतना जबरदस्त रिस्पांस मिला.
सवाल: भारत में सोशल मीडिया और स्मार्टफोनस की बढ़ती हुई ताकत को आखिर आप कैसे देखते हैं?
जवाब: यह एक रिवोल्यूशन है. मेजर रिवोल्यूशन है. इसका प्रभाव आपने अभी देखा रिसेंटली इस आंदोलन में और स्मार्टफोन की आज स्थिति यह है कि 2012 में मैंने देखा 2 करोड़ समथिंग थे स्मार्टफोन जो है और 2025 में जाकर के अगर हम स्मार्टफोन संख्या देखें तो 75 करोड़ स्मार्ट फोन है. 50 करोड़ लोग जो है उसे सोशल मीडिया पे देख रहे हैं. और जो डेली खपत होती है जिसको अपन कहते हैं तो 2014 में जो 62 एमबी थी और 2025 में 24 GB की खपत प्रति व्यक्ति डाटा की हो गई है.
इट्स अ रिवोल्यूशन इन द एंटायर कंट्री जिसे कहना चाहिए वर्ल्ड में तो था ही कंट्री में रिवोल्यूशन है. तो सोशल मीडिया हैज़ अमर एज अ मेजर कनेक्टिंग फोर्स इन द कंट्री और पहले ये टोटली बीजेपी के कंट्रोल कमांड में था. इस बार थोड़ा सा ही हुआ कि एक चुनौती मिली है उस सिस्टम को. आपने देखा कि यह जो आंदोलन चला है इनका भी काफी कंट्रोल सोशल मीडिया पे रहा है और सोशल मीडिया का उन्होंने पूरा उपयोग किया है.
सवाल: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि सरकार का सोशल मीडिया मैकेनिज्म उतना ज्यादा प्रभावी नहीं था जितना कि सीजेपी का था?
जवाब: हां आम धारणा यही है आज मीडिया में राजनीतिक क्षेत्रों में भाजपा में कि उतना प्रभावी नहीं था जितना पहले था. एक कारण कुछ यह बताया जा रहा है कि अगड़ी जाति के कई लोग हैं. वो नाराज हैं सरकार से. यूजीसी का जो फ़ूला यूजीसी के डायरेक्शन थे उसको लेकर के जो है तो कुछ लोग जो है जो पहले जिसे कह योद्धा थे भाजपा के साइबर योद्धा थे या काम करते थे उनका उत्साह उतना नहीं है जितना पहले था या फिर उनका नैतिक समर्थन जो है वो आंदोलनकारियों के साथ हो गया है.
कुल मिलाकर हम सम अप करें तो इस सच्चाई को स्वीकार करने में कोई बुराई नहीं है कि भाजपा का जो सिस्टम था इस समय जो है कि जो नैरेटिव था उन आंदोलनकारियों का उस नैरेटिव को डिमोलिश करने का सिस्टम था उसको फेस करने का चैलेंज करने का सिस्टम था वो उतना प्रभावी नहीं था लेकिन ये सच है और भाजपा ने खुद इसको अंदर स्वीकार किया होगा और अब ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं कि इस सिस्टम को और मजबूत कैसे किया जाए और स्ट्रांग इसको कैसे किया जाए जिससे कि भविष्य में कोई ऐसी घटना हो तो भाजपा का सोशल मीडिया है जो नैरेटिव वो लोग बनाते हैं वो नैरेटिव को हम काउंटर कर सकें सरकार काउंटर कर सके उस उस नैरेटिव को है इस पे सरकार काम कर रही है अश्विन वैष्णो का मंत्रालय इस पे काम कर रहा है लेट्स सी.
सवाल: महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पब्लिक के बीच में आमतौर पर जो डायरेक्ट कनेक्ट रहता है क्या इस बार भी वो दिखाई दिया?
जवाब: हां अबब्सोलुटली डायरेक्ट था लोगों का देखिए जब उनको पता लगा कि जनता नाराज हो रही है तो उन्होंने कमान सीधे हाथ में संभाली और फिर जितने फैसले मैंने बताए जितने फैसले उन्होंने किए उससे पब्लिक भी या आंदोलनकारी छात्र भी एक सीमा तक सेटिस्फाई हुए जाकर के तो वो कनेक्ट आज भी बना हुआ है और वो कनेक्ट कैसे है कि नरेंद्र मोदी का अपना एक मैकेनिज्म है फीडबैक का अपना सिस्टम है वो केवल आईबी पे डिपेंड नहीं करते तो उनका फीडबैक उनको करेक्ट होता है तो फीडबैक के हिसाब से फैसले लेते हैं उन फैसलों को बदलते हैं तो फीडबैक के आधार पे उन्होंने फैसले लिए.
सवाल: आमतौर पर जो पूर्व प्रधानमंत्री हैं वो ऐसे कंट्रोवर्शियल मामलों से दूर रहते हुए अकाउंटेबिलिटी लेने से बचते रहे. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ना सिर्फ आगे बढ़कर इस मामले में डैमेज कंट्रोल एक्सरसाइज की कमान को अपने हाथ में लेते हैं बल्कि वो पूरी जिम्मेदारी को खुद संभालते भी हैं. ये जो इनिशिएटिव था पीएम मोदी का आप इसे कैसे देखते हैं?
जवाब: वो फ्रंट फुट पे खेलते हैं. उनकी आदत है. आक्रामक रहते हैं. प्रथम पंक्ति में रहते हैं. नैरेटिव सेट करते हैं. चैलेंज आता है उसका मुकाबला करते हैं. और यही सब इस बार हुआ. तो उनका जो ये था कि फ्रंट फुट पे खेलेंगे. चैलेंज को स्वीकार करेंगे. चैनल का समाधान निकालेंगे. ये सब उन्होंने किया. मतलब हर आदमी की एक मिजाज होती है, एक तासीर होती है. तो नरेंद्र मोदी की तासीर है संकट को फ्रंट से लेना, फ्रंट फुट पे खेलना, उस चुनौती को स्वीकार करना और फिर उसका समाधान करना. तो ये जो सारा क्राइसिस हुआ है और अब जो माहौल है उन सारे नरेंद्र मोदी का जो चरित्र है यही चरित्र नरेंद्र मोदी का एक बार फिर से राष्ट्र के सामने आया है.
सवाल: नरेंद्र मोदी जी के लिए ऐसा कहा जाता है कि वह संकट की घड़ी में अपने लोगों का साथ नहीं छोड़ते. क्या धर्मेंद्र प्रधान प्रकरण में भी ऐसा ही कुछ?
जवाब: अब्सोलुटली बहुत से लोग हैरान थे इस्तीफा देने के बाद भी कैसे प्रधानमंत्री ने उन्होंने गले लगाया एक तरह से इनडायरेक्ट आशीर्वाद दिया उनके परफॉर्मेंस को एप्रिशिएट किया सारी सरकार ने उनकी तारीफ की मंत्रियों ने तारीफ की शिक्षा में उनके योगदान को सराहा और निश्चित तौर पे नरेंद्र मोदी के आशीर्वाद के बिना संकेत के बिना ऐसा नहीं हो सकता था तो स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी संकट में अपुन लोगों के साथ खड़े रहते हैं और हमेशा उनका साथ देते हैं यह बात एक बार फिर से इस क्राइसिस में सिद्ध हुई. धर्मेंद्र प्रधान के केस में सिद्ध हुई.
सवाल: आखिर धर्मेंद्र प्रधान का भविष्य क्या देखते हैं आप? क्या उनका भी राजनीतिक भविष्य प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल जैसा होगा?
जवाब: नहीं मैं ऐसा नहीं मानता ही इज़ डिफरेंट. अच्छा एक बात नोट करके रखिए. धर्मेंद्र प्रधान का पुनर्वास होगा. जिस ढंग से शीर्ष नेतृत्व ने उनके काम को सराहा है विदाई के बाद और जिस ढंग से जब वह इस्तीफे के बाद मंगलवार को पार्लियामेंट पहुंचे थे और जिस ढंग से सारे एमपीज ने मिनिस्टर्स ने उसका स्वागत एक तरह से किया और नारे लगे धर्मेंद्र प्रधान जिंदाबाद ये मैंने पहली बार देखा है 12 वर्ष में कि नरेंद्र मोदी के अलावा किसी और के लिए ऐसे नारे लगे हो कि जिंदाबाद के नारे वहां पे लगे. फिर मैथिली मुकुट उनको पहनाया. एक राजा के मुद्रा मन को वहां से लाए जैसे उड़ीसा सम्राट हो इन अ वे जो है धर्मेंद्र प्रधान का भविष्य है वो सुरक्षित है.
अब बात है कि संभावनाएं क्या और कब पहली संभावना यह है कि जो रिशफल होगा शायद उन्हें कोई दूसरा मंत्रालय देके फिर से पुन स्थापित किया जाए. फिर दूसरा ये हो सकता है संगठन में लिया जाए. यूपी के चुनाव आ रहे हैं. वो अद्भुत संक्शन करता है. वहां का प्रभारी बना दिया जाए. कुछ और जिम्मे मतलब संगठन में उनकी सेवाएं ली जाए. तीसरा उड़ीसा में कोई उनके लिए अवसर देखे जाए. दैट्स इट. अभी तो सरकार कुछ टाइम ज्यादा नहीं हुआ. ढाई साल के आसपास कुछ ऐसा हुआ है दैट वे लेकिन वो काफी पॉपुलर है वहां पिछले दिनों उनके पिताजी का स्वर्गवास हुआ था मैं भुवनेश्वर गया था अद्भुत लोकप्रियता है प्रधान की उनके पिता श्री के बैकग्राउंड में और खुद के काम से भी जिसे कहना चाहिए और संगठन पे उनकी पकड़ है वहां गांव-गांव में हर जगह पकड़ है तो उनका भविष्य जो है ना वो निश्चित है एक बात निश्चित है कि जैसे पहले कहा आदित्य नरेंद्र मोदी उन्हें अकेला नहीं छोड़ेंगे उन्हें कोई ना कोई जिम्मेदारी देंगे उन्हें सम्मान पूर्वक उनकी एक तरह से कहना चाहिए वापसी होगी.
सवाल: प्रधान ने कहा ही इज़ अ स्ट्रीट फाइटर. आखिर वो क्या कहना चाहते थे?
जवाब: ये उनका मन का भाव है. एक बार पार्लियामेंट में जो है जयराम रमेश मिल गए तो किया होगा इट्स हैपेंड. तो उन्होंने कहा कि नथिंग हैपेंड. और फिर ये भी कहा कि आई एम अ स्ट्रीट फाइटर. मैं एसी कमरे में बैठ के एक्टिस्म नहीं करता हूं. मैं फील्ड में काम करता हूं. तो उनका साहस है, उनका मनोबल है. और साहस मनोबल कहां से आता है? नरेंद्र मोदी के आशीर्वाद से आता है. उनके सहारे से आता है. उनके संरक्षण से आता है. उनके एक सुरक्षा कवच जो है मिला हुआ उससे आता है. उसके उन्होंने किया तो कांग्रेस मतलब एक सूटेबल रिप्लाई जो है बी फिटिंग रिप्लाई धर्मेंद्र प्रधान ने दिया.
सवाल: क्या ये सच है कि इस्तीफे के एक दिन पहले बीजेपी के वार्ताकारों ने कॉकरोच जनता पार्टी को दिया था. धर्मेंद्र प्रधान के मंत्रालय को बदल देने का सुझाव?
जवाब: मैंने अखबार में पढ़ा है ये. मे बी करेक्ट. डायलॉग इज अ प्रोसेस. डायलॉग भी कई प्रस्ताव आते हैं. कई प्रस्ताव जाते हैं. निश्चित तौर पे दिया गया होगा. सरकार कोशिश करती है कि कम से कम डैमेज हो. कम से कम फिर डैमेज कंट्रोल करना पड़े. दैट वे उन्होंने माना नहीं होगा. तो सरकार ने बुद्धिमत्ता दिखाई. सरकार में इसमें खास बात क्या है कि सरकार स्थिति के हिसाब से रिएक्ट करती है. एक्शन लेती है. नरेंद्र मोदी किसी मामले को जैसे कहना चाहे अपना प्रतिष्ठा प्रश्न नहीं बनाते. हालात और समय के हिसाब से फैसले करते हैं. तो हो सकता है प्रस्ताव दिया हो सरकार ने.
सवाल: आपको ऐसा लगता है क्योंकि कुछ लोगों का यह मानना है कि इस धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के प्रकरण से सरकार बैकफुट पे आई है. आपको क्या लगता है?
जवाब: नो इट्स नॉट बैकफुट इट्स अ स्ट्रेटेजिक एंड टेंपरेरी विथड्रॉल सिंबॉलिक विथड्रॉल फ्रॉम द सिनेरियो इन द लार्जर इंटरेस्ट ऑफ द सिचुएशन. जिसे कहना चाहिए हालात के हिसाब से. कई दफा आपने देखा है कि टू विन ए वॉर यू हैव टू लूज अ फ्यू बैटल्स. यह किस्सा उसी तरह का है. सरकार दो कदम पीछे हटी और फिर किया. और सबसे बड़ी बात मैंने आपसे कही ना कि नरेंद्र मोदी का दर्शन है वो राष्ट्र हित पे आधारित है. व्यक्तिगत प्रतिष्ठा व्यक्तिगत भावना उससे प्रभावित नहीं है. वो ऐसा कभी नहीं सोचते कि मैंने कोई फैसला लिया है. मेरी सरकार ने फैसला लिया है तो उसको हम बदल नहीं सकते.
वहां क्या है कि जन भावना जो है जनता का हित जो है लोक भावना फीडबैक वो सर्वोपरि होता है उनके यहां. तो एक संवेदनशील और मैच्योर सरकार की पहचान है ये. तो ये जिसको आप आम धारणा ये है कि सरकार बैकफुट पे आई है. आप उदाहरण देखिए पहले के 2015 में भूमि अधिग्रहण कानून हुआ. सरकार ने वापस लिया. 2018 में एससी एसटी का था इशू. 21 में तीन कृषि कानून थे. वापस लिए क्योंकि सबसे बड़ी बात है कि सरकार को फीडबैक यह था. नरेंद्र मोदी को डायरेक्ट फीडबैक था कि अब जो आगे होगा उससे राष्ट्र का नुकसान है. इन द लार्जर इंटरेस्ट ऑफ़ द कंट्री. लार्जर इंटरेस्ट ऑफ़ द पीपल वो फैसले लेते हैं. उनका कोई व्यक्तिगत एजेंडा व्यक्तिगत ईगो नहीं होता. दैट व है. आप इसको इस ढंग से मत लीजिए कि भाई ये बैकफुट है. यह एक तरह से जनता की भावनाओं का एक सम्मान करना है. जनता की भावनाएं सर्वोपरि है. लोगों का फीडबैक जो वो सर्वोपरि है. उसी को देखते हुए फैसले लिए गए हैं.
सवाल: इन दिस होल सिनेरियो व्हाट इज द पॉलिटिकल फॉल आउट ऑफ सीजेपी मूवमेंट?
जवाब: फॉल आउट तो इतना है कि सेंटाइजेशन हुआ है सरकार के अंदर. सचवा सेंटशन यह है कि हमारे शिक्षा तंत्र में शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा व्यवस्था में वाकई कहीं ना कहीं कोई गड़बड़ है. कहीं ना कहीं कोई चूक है. तो नरेंद्र मोदी क्या पॉजिटिव व्यक्ति हैं. विपक्ष अगर पॉजिटिव बात कहता है उसको पॉजिटिव ढंग से लेते हैं. तो पहला फॉल आउट इन अ वे या प्रभाव कहिए आपको जो है वो यह है कि सरकार ने ये स्वीकार किया होगा मन में कि हां हमारे यहां व्यवस्था में कोई ना कोई चूक है.
और आप देखिए ना कि इतनी बड़ी लीक हो जाना. तो यह पॉइंट ऑफ़ कंसर्न है. तो सरकार के लिए क्या है कि एक वार्निंग बेल कहिए इस एजुकेशन सेक्टर के लिए और या कहिए कि एक सेंटाइजेशन कॉल था जिसे सरकार ने जो है वो पॉजिटिव माइंड से लिया. बाकी समस्या यह है अगर आप यूं कहा जाए कि जो कुछ हुआ इसको कैसे हैंडल किया जाए इसको सोचने में करने में थोड़ा टाइम लगा लेकिन नरेंद्र मोदी ने सात दिन में सारी सिचुएशन को डिफ्यूज कर दिया.
सवाल: ये कहा जा रहा है कि किसी मुद्दे पर पहली बार ऐसा नहीं हुआ कि जब किसी मंत्री का इस्तीफा हुआ हो. क्या आपकी जानकारी में इससे पहले कुछ और इस्तीफे?
जवाब: बहुत इस्तीफे हुए हैं. बड़े-बड़े लोगों के हुए हैं. मैं देख रहा था 10 केंद्रीय मंत्रियों के इस्तीफे पिछले कुछ वर्षों में हुए हैं. उदाहरण के तौर पर लाल बहादुर शास्त्री रेल मंत्री थे. 1956 में इस्तीफा हुआ. टीटी कृष्णाचारी वित्त मंत्री थे. 1958 में उनका इस्तीफा हुआ. वी के कृष्णा मेनन रक्षा मंत्री थे. 1962 में उनका इस्तीफा हुआ. विश्वनाथ प्रताप सिंह रक्षा मंत्री इस्तीफा हुआ. माधवराज सिंधिया, नीतीश कुमार, शिवराज पाटिल पूरी एक सीरीज है 10 लोगों की लेटेस्ट प्रधान. तो ऐसा नया कुछ नहीं है. हालात को देख के द लार्जर इंटरेस्ट गवर्नमेंट डिसाइड करती है. इस बार भी गवर्नमेंट ने लार्जर इंटरेस्ट को डिसाइड करते हुए जो है इस्तीफा धर्मेन्द्र प्रधान का लिया है. सो देयर इज़ नो एक्सेप्शन.
सवाल: इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वो कौन से कारण थे कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के 48 घंटे पहले तक इस्तीफा नहीं लेने का स्टैंड रखने वाली लीडरशिप ने अपना स्टैंड बदला और फिर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा करवा दिया.
जवाब: इज अ वेरी क्वेश्चन एवरीवन इज आस्किंग दिस क्वेश्चन बट नाउ पीपल हैव गॉट द आंसर कल जब बिल पास हो गए तो सबसे पहली आवश्यकता थी पार्लियामेंट को चालू करवाना पार्लियामेंट को चालू कैसे करवाएं राहुल गांधी एडममेंट था अपोजिशन एडमेंट था कि इसको टालो ताकि महिला बिल और परसिम बिल जो है वो पास नहीं हो पाए पुट अप ही नहीं हो पाए तो नरेंद्र मोदी की पहली प्राथमिकता थी पार्लियामेंट को चालू करवाना और इस आंदोलन को समाप्त किए बिना चालू नहीं हो सकती थी और एग्जैक्टली वही हुआ.
आप देखिए चालू हुई पार्लियामेंट और एक और कंसर्न था सरकार का कि एंटी जो कॉपिंग बिल है, चीटिंग बिल है, पेपर लीक बिल है इसको पास करना प्राथमिकता है. उन दो से पहले यह बड़ी प्राथमिकता है. यह पास नहीं हो सकती जब तक पार्लियामेंट नहीं हो तो पार्लियामेंट हुई. तो एक जो लीडिंग कारण रहा मेरे विचार से वो यही रहा कि बिल पास करवाने हैं सरकार को फॉललोड बाय फिर महिला आरक्षण बिल और परिसीमन बिल. पहली प्राथमिकता तो यह है. तो नरेंद्र मोदी ने खुद ने अनुभव किया और देखा हालात बिगड़ने से पहले उन्होंने फैसला करके विपक्ष के हाथ से उनकी पहल छीन ली और इस्तीफा करा के धर्म प्रधान का जो है सारी सिचुएशन को उन्होंने डिफ्यूज कर दिया.
सवाल: आपको बीजेपी के जो कई नेता हैं उनका जो डर था क्या वही हो रहा है? क्योंकि उनका यह मानना था कि अगर एक इस्तीफा दे दिया तो फिर और इस्तीफे की मांग होगी. ठीक वैसे ही जैसे धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा जब हो रहा था उसके बाद अब सीजेपी के जो संस्थापक हैं अभिजीत दीप के उन्होंने यह कहा कि अमित शाह का भी इस्तीफा दीजिए क्योंकि पुलिस बल का गलत तरीके से प्रयोग छात्रों के ऊपर हुआ है तो अब इस्तीफे की मांग बढ़ने लगी है तो क्या वही हुआ जिसका डर था?
जवाब: भाई देखो इस्तीफे की मांग बढ़ी तो उतनी मांग फिर डिफ्यूज हो जाएगी उसका महत्व कम हो जाएगा अगर आप कहते हैं ना यू आर आस्किंग फॉर ए मून तो पॉसिबल नहीं है दैट जो है ऐसी संभावना बहुत कम थी कि एक बड़ा इस्तीफा होने के बाद में दूसरे इस्तीफे के लिए मांग आ जाएगी. इसका मतलब यह है कि आप राहुल गांधी के साथ खड़े हैं. तो इज़ सम सॉर्ट ऑफ़ ए इनडायरेक्ट अलायंस कहो या और इट मे बी कोइंसिडेंस कि राहुल गांधी ने इस्तीफे की मांग की गृह मंत्री से और आपने भी इस्तीफे की मांग कर दी. तो यह बड़ी धर्म संकट की स्थिति है उस पार्टी के लिए भी. क्योंकि ऐसा आम धारणा थी सरकार में कि ठीक है प्रधान का इस्तीफा हो गया. ठीक है सब लोग अपने काम पे लगो पढ़ो और हमने सारे रिफॉर्म हम कर रहे हैं लेकिन इस्तीफों की श्रंखला की मांग अगर शुरू होगी तो बहुत डिफिकल्ट होगा तो इस्तीफे की जो बात कही गई है वो एक बहुत चिंता का विषय है कि अब इस तरह से अगर इस्तीफे की बात आएगी उस पे जो है तो फिर आरपार की स्थिति होगी ना कुछ बातें ऐसी जो हो ही नहीं सकती अब इस सरकार में अमित शाह का इस्तीफा नहीं हो सकता .
सबसे बड़ी बात यह है डॉक्टर जितेंद्र सिंह ने कहा है कि वो तो पुलिस करती है ना मौके पे कौन सी गोली चलानी है कौन सी फायर करना है लाठी चलानी है गोली चलानी है. ये फैसला अमित शाह थोड़ी करते हैं. गृह मंत्री थोड़ी करता है दफ्तर में बैठा हुआ. ये मौके पे करता है. मजिस्ट्रेट होता है वो करता है. तो इनका तो कोई रोल नहीं है ना डायरेक्टली. दैट इज़ है. तो मेरे कहने का तात्पर्य है कि इस्तीफा उन्होंने मांगा है. आशंका सही है. लेकिन अब देखने की बात है उन्होंने इस्तीफा खाली सेरेमोनियल कहने के लिए मांग लिया या इस पे कोई वो स्टैंड लेते हैं या करते हैं. तो ये एक बात है. लेकिन मैंने आपसे कहा ना अगर व्यवहारिक बात करेंगे तो बात मान ली जाएगी. अगर आप इस तरह की कोई डिमांड रखेंगे जैसे गृह मंत्री का इस्तीफा और कांग्रेस भी वही बात कह रही है तो इट्स इंपॉसिबल है. तो लेट्स सी कि इस तरह की डिमांड नहीं हो और है तो वो सॉर्ट आउट हो जाए. समय के साथ-साथ डाइस नेचुरल डेथ जिसे कहते हैं.
सवाल: इस सारे प्रकरण में संघ परिवार के पितृ पुरुष और दार्शनिक विचारधारा रखने वाले मोहन भागवत के विचारों का आंदोलनकारी छात्रों पर कितना असर हुआ? और सर साथ में आपको लगता है कि मोहन भागवत ने भी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए कहा था नरेंद्र मोदी को?
जवाब: ऐसी चर्चा थी बात ये होगी जैसे था कि शरद कुमार उन्होंने सुझाव दिया होगा सॉर्ट आउट करो. हो सकता है मोहन भागवत ने कहा हो सॉर्ट आउट करो. लेकिन उन्होंने कहा ना कि युवा मन स्थिर नहीं है. युवा स्थिर नहीं है थोड़ा सा. इसका कोई खास रिस्पांस उन लोगों ने कोई ऐसा दिया नहीं. और टिप्पणी इसलिए नहीं की मोहन भागवत के बयान पे या रिएक्शन इसलिए नहीं दिया कि सीनियर आदमी पितृ पुरुष हैं गंभीर व्यक्ति हैं. ही टॉक सेंस तो इसलिए उन्होंने कोई रिएक्शन नहीं दिया. मोहन भागवत की राय को उन लोगों ने वैसे ही माना होगा जैसे घर में एक बुजुर्ग अपनी बात कहता है. वरिष्ठ आदमी कोई अपनी बात कहता है. सो दिस इज़ ऑल दिस वाज़ ऑल इन गुड टेस्ट.
सवाल: विपक्षी दल हर बार सरकार के इस तरह के फैसले या जो इस्तीफा हुआ है इसको जीत मानकर जश्न मनाते हैं. लेकिन जब परिणाम आते हैं चुनाव के तो कहानी कुछ और ही बयां करते हैं चुनावी परिणाम. अब आने वाले दिनों में पांच राज्यों में फिर चुनाव है तो क्या इतिहास की पुनरावृत्ति होगी?
जवाब: वहां पर भी यही लगता है मुझे चुनाव अलग चीज है वो अलग चीज है दैट वे जो है अब पहले आप देखिए ये 2021 में किसानों का हुआ था तो 2022 में यूपी और उत्तराखंड में चुनाव थे लोगों ने कहा बिल्कुल पार्टी साफ हो जाएगी कुछ नहीं हुआ थंपिंग कम्युनिटी सरकार बनाई अभी तक का जो स्टैटिस्टिकल इतिहास है वो यही है इस तरह का है कि ऐसे आंदोलन समय के साथ-साथ जो है लुप्त हो जाते हैं उस तरह से और होता है अब लेट्स सी कि यह आंदोलन किस तरह का है. यह उसका एक्सेप्शन है कि क्या है? यह आने वाला वक्त बताएगा. दिस इस टू अर्ली टू प्रेडिक्ट द फ्यूचर ऑफ दिस कांग्रेच पार्टी जो है.
सवाल: आखिर आप कैसे देखते हैं शिक्षा मंत्री के रोल में कर्नाटक के ब्राह्मण नेता प्रहलाद जोशी को?
जवाब: प्रहलाद जोशी बुद्धिमान व्यक्ति हैं. ब्राह्मण है. बहुत से लोग चाहते भी थे कि अगड़ी जाति का इस बार शिक्षा मंत्री बने. जितेंद्र सिंह की बात हुई. बात यहां तक आई है. आगे भी हो सकता है डॉ. जितेंद्र सिंह इनमें से कोई व्यक्ति बने या नरेंद्र मोदी किसी और व्यक्ति को जिम्मेदारी दें. पर प्रहल्हाद जोशी एक लॉ प्रोफाइल परफॉर्मर है और उनकी एफिशिएंसी की तारीफ होती है. बेसिकली वेरी नॉलेजेबल वेरी इंटेलेक्चुअल पर्सन और शिक्षा में भी रहते हैं अगर वो तो ही मे अप्रूव वन ऑफ़ द बेस्ट एजुकेशन मिनिस्टर्स इन द हिस्ट्री. दिस इज वन.
सवाल: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के दिन एक चर्चा चली थी कि देवेंद्र फडणवीस को शिक्षा मंत्री बनाया जाए और एकनाथ शिंदु को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया जाए. इसमें कितनी सच्चाई थी?
जवाब: वो तो कोइंसिडेंस था एक तरह से. उस दिन इस्तीफा हुआ उसी दिन दो घंटे के लिए आए अमित शाह से मिले, वापस चले गए. तो नेचुरल सीक्वेंस एक ऐसे बनता था कि शायद उनको और वो भी क्या आरएसएस के करीब है मोदी के करीब है और इस सारे माहौल में शिक्षा एक बहुत महत्वपूर्ण मंत्रालय हो गया है तो सोचा हो कि कंपेरेटिवली यंग आदमी को यहां मंत्री बनाते हैं तो धारणा चली थी लेकिन शाम होते होते फिर ये बात आई उन्होंने खुद ही कह दिया कि मैं तो महाराष्ट्र में हूं और उनके पति ने भी कहा कि हम चाहते हैं कि महाराष्ट्र में रहें इसका मतलब कोई ना कोई बात कहीं ना कहीं आई होगी और अभी भी कोई रूल्ड आउट नहीं है सिचुएशन यह बात कई बार चलती है गोविंद फडनवीस को जो है यहां पे लाया दिल्ली में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाए.
पहले पार्टी प्रेसिडेंट की बात चली थी वह तो चली गई. अब फिर कई बार लोग कहते हैं वित्त मंत्री बनेंगे. मतलब है कि फंड के लिए एक वैकेंसी यहां क्रिएट होती रहती है. समय-समय पे जो है तो हो सकता है किसी दिन वो वैकेंसी वास्तव में क्रिएट हो जाए और वो यहां पे आ जाए उसमें आश्चर्य नहीं है. तो सवाल ये है कि अगर आ गए तो वहां नेक्स्ट कौन है? तो नेक्स्ट अगर पार्टी उदारवादी नीति देखती है थोड़ा सा रिकंसिलेटरी जैसे महाराष्ट्र में टोटल कंट्रोल में है. नरेंद्र मोदी अमित शाह इनका जो है सिस्टम है पूरा वहां पे तो शिंद को दे सकते हैं. वो ग्रास रूल लीडर है. शिवसेना का लीडर है. काफी पॉपुलर है वहां पे. ही मे बी सक्सेस टू फंड. ऐसी सिचुएशन आती है तो लेकिन ये सारी बातें केवल एकेडमिक एनालिसिस की है. सो फार उस दिन जो कुछ हुआ था वो खाली मीडिया में था वैसे ही चला. कोई ठोस जानकारी उसके बारे में उपलब्ध नहीं है. लेकिन फ्यूचर में आगे चलके फंड के दिल्ली आने की संभावना से इंकार नहीं कर सकते. और लॉन्ग रन में शिंद की भी मुख्यमंत्री बनने की संभावना से इंकार नहीं कर सकते. क्योंकि इसमें शिंद ये सब लोग जो है सब पूरी पार्टी अमित शाह के शरण में है. उनके मार्गदर्शन में है. उनके कंट्रोल में है.
सवाल: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से उत्साहित कॉकरोच जनता पार्टी सीजेपी का अगला एजेंडा क्या है?
जवाब: अगला एजेंडा फेस वैल्यू तो उन्होंने यही कहा है पार्टी के जो संस्थापक हैं अभिजीत दीपके उन्होंने यही कहा है बेसिकली कि भाई वी विल अरे यूथ इश्यूज अक्रॉस द कंट्री. जैसे एजुकेशन सिस्टम हो गया, एग्जाम सिस्टम हो गया, अनइंप्लॉयमेंट हो गया, फ्यूचर हो गया. तो फेस वैल्यू उनका एजेंडा जो है ना यूथ वेलफेयर यूथ इशू से रिलेटेड है एक तरह से. अभी जयपुर में एक लड़का वहां यूनिवर्सिटी के बाहर बैठ गया था. छात्र संघ का चुनाव करा, हड़ताल पे बैठा हुआ था. अशोक गहलोत ने ट्वीट किया तो आशुतोष राका जो राजस्थान से हैं और मुख्य प्रवक्ता हैं, वार्ताकार हैं. तो आए वहां पे उनसे मिले.
बाद में पुलिस ने उनको उठाया. तो उनका यह है कि देश के जिस कोने से भी किसी पीड़ित युवक की आवाज आएगी तो यह लोग वहां पहुंचेंगे जाकर के. अभी तो जो इनका एजेंडा है मोटे तौर पे यहीं तक लिमिटेड है और एक्चुअल में तो एजेंडा पूरा हो चुका है. इसलिए जिस दिन इस्तीफा हुआ था तो उस दिन जो है दीपके ने यही कहा था कि बॉयज वेल डन इट्स डन नाउ गो बैक टू योर होम्स. तो उनका वैसे तो उनका काम खत्म हो चुका है चरण वन में. अब दूसरे चरण में जो है वो देश में जाके वो युवा वेलफेयर की अलग जगाएंगे. तो लेट्स सी कैसे क्या है. पर सर क्या वाकई में बाकायदा यह कन्वर्ट होगी एक नई पॉलिटिकल पार्टी में भी? आज तो कोई संभावना है नहीं ऐसी बट आई एम कीपिंग माय फिंगर्स क्रॉस्ड. अरविंद केजरीवाल भी यही कहते थे पहले.
जहां तक इनका सवाल है तो दीपके के फादर ने अभी कुछ दिन पहले कहा था कि नो चांस ही विल नेवर जॉइन पॉलिटिक्स. क्लियर तौर पे कहा था और खुद दीपके ने और दूसरे आशुतोष इन सबका एक ही व्यू है उसके अंदर है कि वी विल कंटिन्यू टू रिमेन ए हेडलेस मोमेंट हमें कोई नेतृत्व नहीं चाहिए हम ऐसे हेडलेस ही रहना चाहते हैं मतलब नो पॉलिटिकल पार्टी बट समय के साथ है केजरीवाल ने भी ऐसे ही कहा था इंडिया अगेंस्ट करप्शन अब वो क्या हुआ वो पॉलिटिकल पार्टी बना ली एक साल में उन्होंने 2011 में कहा था बन गई पार्टी वो 13 में चुनाव लड़ लिए 28 सीट आ गई तो आगे क्या कुछ कह नहीं सकते लेकिन आज की तारीख में तो ऐसा लगता है कि वो कोई पॉलिट िकल पार्टी नहीं बनाने जा रहे हैं. वो अपनी इंडिपेंडेंट हैसियत को रखेंगे. व्हिच लुक्स मोर अट्रैक्टिव एंड मोर चार्मिंग.
सवाल: क्या प्रधान के बाद अब एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर नितिन गडकरी या उनका मंत्रालय सीजीपी के निशाने पर है?
जवाब: ऐसी चर्चा चली थी लेकिन मुझे नहीं लगता कि दीपके की पार्टी और ई20 पार्टी वहां जो बनी है उनका कोई इस तरह का बहुत कोई एक्टिव आगे कंबाइन कोई होने वाला है. वो पार्टी बन गई. इथोल को लेके एक माहौल देश में बन गया और लोगों ने उसमें गडकरी को भी टारगेट किया और यह कहा कि ईथोल जो आप डाल रहे हैं उस पेट्रोल में जो है इससे गाड़ियां खराब हो रही है डेढ़ डेढ़ करोड़ की उसकी इंजन की कैपेसिटी कम हो रही है तो उसका परिणाम ये हुआ उस प्रचार से कि पेट्रोल की जो बिक्री है वो दुगनी हो गई दैट वे जो है और गडकरी भी ए्बरेस फील हुए कि उन पैरवी करते थे इसके लिए जो है और वो प्रत्यारोप हुए लेकिन एक सुखद संयोग है या क्या कहिए उसमें जो है कि अब सरकार का दो टू बयान आया है कि पेट्रोल में ई20 मिलाने से कोई खतरा नहीं है.
गाड़ियां सुरक्षित है आपकी जो है और इसमें ऐसा कोई इशू नहीं है. तो ये तो बहुत एक तरह से पॉलिटिकली बड़ा इंपॉर्टेंट इवेंट है कि नरेंद्र मोदी हैज़ कम टू द रेस्क्यू ऑफ़ नितिन गडकरी एक तरह से इसका मतलब इनडायरेक्ट मैसेज है इसका ये है. अच्छी बात है जो है सरकार सोरिटी के साथ काम करे. दैट वे दीप के और उनका ई20 का आपस में मिल करके कुछ आगे करें. संभावना कम है कि मुद्दा ज्यादा मोमेंटम गेन अभी नहीं कर रहा है. शुरू में ऐसा लगता था कि आम आदमी जुड़ गया इसलिए मुद्दा बनेगा ये. लेकिन अब ऐसा नहीं लग रहा है. ई20 पार्टी भी जो है इसमें कोई ज्यादा टेक ऑफ नहीं कर पाएगी. ऐसा मेरा मानना है.
सवाल: क्या आपको भी ऐसा लगता है कि सीजेपी का ये आंदोलन शिक्षा जगत से जुड़ी सभी समस्याओं के प्रति कलेक्टिव एंगर का एक्सप्रेशन था?
जवाब: अबब्सोलुटली एक प्रसिद्ध विश्लेषक हैं अविनाश कल्ला. उन्होंने कहा कि इट इज़ ए कलेक्टिव एक्सप्रेशन ऑफ एंगर, फ्रस्ट्रेशन, डिसपॉइंटमेंट, डिसइलजन और जिसे कहना चाहिए कि ये एक डिस्ट्रेस ऑफ ए जनरेशन तो उसका तो एक पैकेज था. आप अकेले की नहीं कह सकते. और इस पार्टी का ऐसे जन्म हुआ बस ऐसे हो गया. जन्मत्री की बात होती है. कमेंट आया कमेंट से एक पार्टी बन गई रातोंरात. इतनी लंबी चौड़ी बात हो गई. फिर यहां तक बात आ गई कि मंत्री का इस्तीफा हो गया. जो है मिरेकुलस दैट जो है मैंने जो आपसे पहले कहा कि कलेक्टिव एंगर का जो है वह पैकेज है अपने आप के अंदर.
सवाल: एक बड़े अखबार ने लिखा है कि दीप केव्स दलित आइडेंटिटी फ्रंट एंड सेंटर ऑफ प्रोटेस्ट. क्या सीजीपी का भी कोई दलित कार्ड है?
जवाब: नहीं इतना तो है कम से कम कि अभी जो आंदोलन चला सारा यहां पे तो उस आंदोलन के दौरान जो है बाबा साहब भीम अंबेडकर की जो है तस्वीर वहां पे रहती थी. तो ऐसा इंप्रेशन लोगों का बना कि दलित कार्ड है इसके अंदर जो है और फिर महाराष्ट्र से आते हैं. फिर चर्चा यह भी चलती है कि महाराष्ट्र चुनाव आएंगे तो शायद दलित कार्ड खेला जा सकता है. फिर दूसरे चंद्रशेखर हैं इसी से जुड़े हुए नेचुरल एलआई जो हैं वो भीम पार्टी से थे जो है वो वहां एमपी हैं उत्तर प्रदेश में.
अभी जंतर मंतर पे जितने लोग इकट्ठे हुए और सबसे ज्यादा भीड़ जो है वो चंद्रशेखर ही लेकर आए थे. तो ऐसी संभावना है कि महाराष्ट्र में दोनों मिलके कुछ काम करें आगे जाकर के. लेकिन मूल प्रश्न वही है कि क्या ये पॉलिटिकल पार्टी बनाएंगे दीपके? क्वेश्चन यह है अगर पॉलिटिकल पार्टी नहीं बनाएंगे, एक्टिव नहीं करेंगे फिर ये सब बातें निर्मूल है. उनका दलित कार्ड है. लेकिन अगर वो पॉलिटिकल पार्टी बनाएंगे और करेंगे तो दलित कार्ड को ऑफ कोर्स वो प्ले कर सकते हैं. बस दैट इज टू बी सीन के पॉलिटिकल पार्टी बनती है कि नहीं?
सवाल: क्या 15 अगस्त के बाद मंत्रिमंडल फेरबदल के कोई आसार आपको नजर आते हैं? और उसका कोई जो हाल ही में जो जेन सी प्रोटेस्ट हुआ उसका कोई इंपैक्ट आपको उस मंत्रिमंडल विस्तार में दिखेगा?
जवाब: मंत्रिमंडल विस्तार की संभावना तिथि का आकलन तो केवल नरेंद्र मोदी ही कर सकते हैं. अमित शाह कर सकते हैं. बाकी सब परिकल्पनाएं हैं. लेकिन हां चर्चा यही है. कई पद रिक्त हो गए हैं तो मंत्रिमंडल विस्तार होगा और मंत्रिम विस्तार जब भी होगा तो व्यक्ति अनुभव से सीखता है. नरेंद्र मोदी भी क्या अनुभव से सीखते हैं. उनका कोई व्यक्ति प्रतिष्ठा कोई प्रश्न नहीं होता. राष्ट्र हित में जो नया अनुभव आता है उसको ग्रहण करते हैं, फैसले लेते हैं.
तो इसका एक यह मैसेज क्लियर है कि नरेंद्र मोदी शुरू से कहते रहे हैं कि यंगर लीडरशिप को प्रमोट करो. यंग को प्रमोट करो कैबिनेट में, चुनाव में, टिकट में इस आंदोलन के बाद में जो नैरेटिव था नरेंद्र मोदी का और मजबूत हो गया है और सेंसिटाइज हो गया है कि यस वी हैव टू ब्रिंग यंग लीडरशिप. तो ऐसा मैंने सुना है कि 70% जो अभी मंत्रिमंडल है वो इसमें बदल जाएंगे इरिस्पेक्टिव यंग और नो यंग और कंपेरेटिवली यंग एलिमेंट जो है वो मंत्रिमंडल में नरेंद्र मोदी उसको प्रमोट करेंगे ऐसा लगता है.
सवाल: इस आंदोलन के दौरान छात्र-छात्राओं ने अपने आक्रोश या सिस्टम के प्रति अपने गुस्से की अभिव्यक्ति के लिए और खासतौर पर जो महिला आंदोलनकारी है जिस भद्दी या गालियां देने वाली भाषा का उपयोग किया है क्या आप उसे सही मानते हैं?
जवाब: इट्स इनएप्रोप्रियट इट्स अनफॉर्चूनेट जो कहना चाहिए इट्स नॉट एक्सेप्टेबल इट्स डिफेमेटरी. खुद मां-बाप बहुत स में हैं. जिन बच्चों के वीडियोस आए और देखे उन्होंने तो उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि हमारे बच्चे खासकर लड़कियां ऐसी भाषा का उपयोग करते होंगे अपने जीवन में. लड़के लड़कियों का इस तरह कहना हो सकता है. जब लड़के गालियां दे सकते हैं तो हम गालियां क्यों नहीं दे सकती? तो आप गालियां यारी दोस्ती में दीजिए ना. राष्ट्र के नेतृत्व को थोड़ी गाली दे सकते हैं आप इस तरह से. तो समय के साथ-साथ क्या हो रहा है इस तरह से कि ये गलत हो गया.
वो लोग खुद भी ऐसा महसूस करेंगे जो है तो मेरा कहना यह है कि मां-बाप खुद सत्य में है. उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी. अब उनके मन में भी एक सवाल आ गया कि भाषा को सहमित संतुलित कैसे किया जाए? अब ये क्या उसका हमारे कोर्स का एजेंडा हो, सिलेबस का एजेंडा हो, क्या हो? तो चिंता का माहौल है सबके मन में जो है और ये मेरा पक्का मानना है बिकॉज़ इट्स अ ओवर इंटरेस्ट. तो जिन बच्चों ने गालियां दी है लड़के लड़कियों ने वो खुद भी इसका कहीं ना कहीं प्रायश्चित आज कर रहे होंगे, सोच रहे होंगे. और सबसे बड़ी बात यह देखने की है कि जो पार्टी है सीजेपी उसका जो वरिष्ठ नेतृत्व है जिसमें दीपके हैं आपके सौरव दास हैं आशुतोष रांका हैं वो कितनी डिसेंट और डिग्निफाइड भाषा का प्रयोग करते हैं. अभी देखिए नड्डा के साथ बैठे जितेंद्र सिंह के साथ बैठे वो लोग जो है बड़ी सहमित भाषा थी.
कहीं कोई आक्रोश नहीं था. वेरी मैच्योर वेरी डिसेंट. तो इन लड़के लड़कियों ने जो कुछ किया उनको अपनी लीडरशिप से सीखना चाहिए कि वो लोग कितने डिसेंट है बातचीत में जो है आपका गुस्सा आक्रोश अपनी जगह है सब है लेकिन भाषा पे तो नियंत्रण करना पड़ेगा और भाषा तो अब देखो युवा पीढ़ी तो भारत में मानते हैं ना कि भगत सिंह का देश है और युवा पीढ़ी देश का नेतृत्व करती है अब ये सारे वीडियो देश विदेश में गए हैं तो भारत की प्रतिष्ठा भी थोड़ा सा उससे प्रभावित होती है तो मेरे ख्याल से बस एक अनफॉर्चूनेट बात थी जो हो गई कई बार कहते हैं ना कि एम हो वेरी अनफॉर्चूनेट एंड आई थिंक पार्टी विल इटसेल्फ टेक सम जिसे कहना चाहिए करेक्टिव मेजर्स कि भविष्य में ऐसी घटनाएं नहीं हुई.
सवाल: आखिर जसी छात्रों के साथ-साथ उनके पेरेंट्स के मन में आखिर क्यों इतना गुस्सा है मौजूदा शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को लेकर और सर पिछले एक साल की अगर हम कोटा की बात करें तो 19 छात्राओं द्वारा की गई आत्महत्याओं के लिए क्या उनकी पेरेंट्स कीत्वाकांक्षाएं भी जिम्मेदार हैं?
जवाब: सही कह रहे हैं. पेरेंट शिक्षा व्यवस्था से बहुत परेशान हैं. सबसे पहली परेशानी का कारण शिक्षा बहुत महंगी हो गई है. एजुकेशन है बिकम ए बिजनेस. एक आदमी आज स्कूल खोलता है, दो साल में दूसरा स्कूल खोलता है. फिर तीसरा स्कूल खोलता है. और स्कूलों में नए-नए तरीके से बच्चों से फीस लेने की परंपरा बन गई है. आज ये डे है, कल को महात्मा गांधी डे है, कल को कोई दूसरी जयंती है, तीसरी जयंती है. अलग-अलग मौसम के हिसाब से समर डे है, यह पूल पार्टी है. अलग-अलग तरह से जो है तो बच्चों से पैसा लिया जा रहा है. बस्ते के पैसे तो मां-बाप थक गए हैं फीस देते.
और कोई कोचिंग इंस्टिट्यूट में कहीं भी जाइए तो छात्र फंस गए हैं इसको चक्कर के अंदर. वजह से कहा जाए 15 साल से कोचिंग शुरू हो जाती है. एजुकेशन तो रही नहीं. एजुकेशन बिकम अ बिज़नेस जो मैंने आपसे कहा जो है आप जयपुर उदाहरण ले लीजिए. एक वहां से पब्लिक इंस्टीट्यूशन के वो कहां थे 10 साल पहले आज कहां है? माना अपनी मेहनत और उसके बल पे वो आज वहां पहुंचे हैं. मैं जो बात यहां कहना चाहता हूं एजुकेशन बिकम अ वेरी फ्लोरिशिंग बिजनेस. बेसिकली जो है ये तो शिक्षा को देखना पड़ेगा. शिक्षा को सस्ता करना पड़ेगा. कुछ और करना पड़ेगा.
फिर एक और दूसरा पहलू हो गया शिक्षा का आजकल. वो क्या हो गया कि मां-बाप की परीक्षा होती है. बच्चे आते हैं होम वर्क में लदे रहते हैं सारा दिन. मां-बाप भी होमवर्क करते रहते हैं बैठ के. ये क्या है ये बताओ? फिर तीसरा वो सवेरे कविता कहती है बच्चे को रोज सुबह ना स्कूल छोड़ने जाना पड़ता है. लाने पड़ता है. अरे क्या है ये? ऐसी एजुकेशन चलती है क्या? हम पढ़ते थे स्कूल में कोई छोड़ने जाता लेने आता था कोई. शिक्षा को आत्मनिर्भर बनाइए. शिक्षा को अपने हिसाब से चलाइए जिसे कहते हैं तो मां-बाप बहुत परेशान है तरह शिक्षा को इन टोटिटी में शिक्षा के व्यवसाईकरण से जो है ये तो बहुत परेशान है मां तो मां-बाप का गुस्सा इस बात को लेके है सो दिस इज ऑल के मां-बाप क्यों परेशान है
सवाल: विचित्र किंतु सत्य लेकिन क्या यह सच है कि इस बार पेरेंट्स ने खुद अपने बच्चों को इस आंदोलन में भाग लेने के लिए दिल्ली जाने के लिए प्रेरित किया आखिर ऐसा क्यों है?
जवाब: हां ये सही है. मैं खुद जयपुर का एक केस जानता हूं. तो चैनल में तीन लड़कियां आई वहां पर उस दिन बात हुई ऐसे ही तो फोन आया वहां से उनकी मम्मी का जो है कि कहां है तो कहा हम जयपुर में आए हैं किसी फंक्शन में जो है तो कहा तुम्हें दिल्ली जाना चाहिए आई वास शॉक्ड टू से दिस थिंग कि मां-बाप खुद कह रहे हैं कि तुम्हें दिल्ली जाना चाहिए आंदोलन में उस दिन मां-बाप ने कल्पना नहीं की थी कि दिल्ली की लड़कियां फिर ये भाषा बोलेंग वो तो कल्पना नहीं की थी ना उन्होंने जो है तो इससे आईडिया लगाइए ये फीडबैक नरेंद्र मोदी के पास पहुंचा तो यह वो सब कारण थे जिसके लिए हम ये कहते हैं ना कि तुरंत फैसला क्यों लेना पड़ा? 48 घंटे में क्यों करना पड़ा? नरेंद्र मोदी के पास फीडबैक ऐसा था कि नॉट ओनली स्टूडेंट पेरेंट कम्युनिटी खिलाफ हो रही है सरकार के सिस्टम के. इसलिए इसको डिफ्यूज करो. सो दिस इज करेक्ट. इस बार पेरेंट्स ने आगे बढ़कर के अपने बच्चों को दिल्ली भेजा. सरप्राइज लेकिन सच है.
सवाल: सुप्रीम कोर्ट ने क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले जो आंदोलनकारी है उनके खिलाफ एफआईआर और इसके साथ-साथ एक्सेसिव यूज़ ऑफ पुलिस फोर्स के आरोपों की जांच के लिए एक स्पेशल टास्क फोर्स के गठन का सुझाव दिया है. आप इसे कैसे देखते हैं?
जवाब: बिल्कुल ठीक है. अब्सोलुटली करेक्ट. वेरी बैलेंस जजमेंट जो है आप देखिए निर्दोष लोगों पे कोई कारवाई नहीं हो. ठीक है? और जो एफआईआर है जिनमें क्रिमिनल बैकग्राउंड है उन पे निश्चित तौर पे कारवाई होनी चाहिए. नो शील्ड द जजमेंट इज अब्सोलुटली इन ऑर्डर फॉर बोथ द पार्टीज वेरी इमार्शियल जजमेंट वेरी बैलेंस एक्ट वेरी बैलेंस जजमेंट ऑफ चीफ जस्टिस जिसे कहना चाहिए वी ऑल अप्रिशिएट दिस जजमेंट जी.
सवाल: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गैर आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रदर्शनकारी युवक युवतियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी लेकिन सर न जाने मुझे ऐसा क्यों लगता है कि कुछ युवक और युवतियों ने वहां पर अश्लील भाषा और डिफेमेटरी भाषा का प्रयोग किया है तो उनके खिलाफ एक्शन लिया जाएगा. क्या आपको भी सर ऐसा लगता है?
जवाब: भाई सुप्रीम कोर्ट ने कहा ना अगर एफआईआर है तो उसप एक्शन हो. अब इन पे आगे चलके छ आठ महीने बाद जब आंदोलन ठंडा हो जाएगा. एक संभावना बनती है ना जिस सरकार ने जो है तो उस समय सरकार ये देखे क्योंकि पुलिस ने तो क्या ना सारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सारे चेहरों की पहचान कर ली. पूरे एक-एक लड़का लड़की जो गए थे इंक्लूडिंग क्रिमिनल एलिमेंट्स जो है सब रिकॉर्ड उनके पास में है. अब पुलिस इसको ऑफेंस मानती है. वे डिपेंड करेगा बारगेन क्या है बिटवीन आपकी कांकरोच पार्टी और सरकार के बीच में उसमें बैलेंस ऑफ़ पावर कैसा है? अभी तो क्या है वो लोग कमांड में थे.
तो जो उन्होंने कहा सब लोगों को छोड़ो तो सब लोगों राज्यों में छोड़ा गया उनको. असम में छोड़ा, बिहार में छोड़ा, महाराष्ट्र में छोड़ा, दिल्ली में छोड़ दिया. ये कह करके कि क्रिमिनल को नहीं छोड़े. बैकग्राउंड वाइफ बाकी को छोड़ेंगे. अब कल को मान लो इन लोगों के खिलाफ भी कोई एफआईआर दर्ज हो गई फॉर ए मोमेंट फिर वो इशू आ जाएगा कि भ क्रिमिनल लोगों के खिलाफ कैसे छोड़े दैट विल वेयर तो उस पॉइंट पे आकर के ये पार्टी स्टैंड ले सकती है वहां पे के क्रिमिनल उस तरह से क्रिमिनल नहीं है लोग ये गलती हुई इनसे या जो भी हुआ ये तो इनको क्षमा करो या इनको छोड़ो वहां तो उस बारगेन पे डिपेंड करेगा इनके खिलाफ कोई एक्शन होता है कि नहीं बाकी सरकार के पास तो सब रिकॉर्ड है सरकार ने सब रिकॉर्ड निकाल लिया आधार कार्ड है आपका पासपोर्ट है एक्स व जेड जो भी है और सरकार अगर एक्शन पे आती है तो बात पासपोर्ट रद्द होने तक भी जा सकती है. दैट इज है.
तो डिपेंड करेगा सिचुएशन कैसी है. लेकिन बहरहाल अभी बहुत दूर की कौड़ी है यह. अभी इस किसी को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है. अनफॉर्चूनेट था इंसिडेंट हो गया जो है ये तो आई होप कि ये इशू भी सेटल हो जाएगा. जैसे और राज्यों से छोड़े लोग किया है. सेटल हो जाएगा. बाकी इट इज़ टू बी सीन कि होम मिनिस्ट्री और बाकी सरकार इनटोटिटी इस मामले में क्या व्यू लेती है आगे चलकर के दो चार महीने बाद में. अगर सरकार ये लेती है कि नहीं पनिश करना है तो लॉ ऑफ़ द लैंड विल टेक इट्स कोर्स और सरकार महसूस करती है कि चलो बच्चों से गलती हुई क्षमा करो. ठीक है ना? फॉर ए मोमेंट तो ठीक है फिर इट विल डाइट्स नेचुरल डेथ.
सवाल: सीजीआई सेस मेयरली बिकॉज़ देयर इज अ एजिटेशन. इट डज नॉट मीन देयर शुड बी अ लाठी चार्ज. व्हाट डू यू थिंक अबाउट इट?
जवाब: बिल्कुल सही कहा उन्होंने. उन्होंने कहा कि खाली प्रदर्शन पे ही लाठी चार्ज नहीं कर सकते. प्रदर्शन है. चलो लाठी चलाओ वहां जाकर के. ऐसा नहीं कर सकते. जब तक वो बहुत वायलेंट उस तरह से नहीं हो जाए, कुछ और से नहीं हो जाए. और यह बहुत इंपॉर्टेंट बात है. क्यों? बिकॉज़ देयर इज वेरी थिन लाइन थिन डिफरेंस बिटवीन प्रोटेस्ट एंड एनार्की. यह कौन तय करेगा कि प्रोटेस्ट हो रहा था, एनआरकी में कन्वर्ट हो गया. पुलिस डंडे चलाने पड़े. लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला लोकतांत्रिक फैसला है. पूरे देश में इसका स्वागत हुआ है इस फैसले का. और ये कहा केवल प्रदर्शन मात्र से और इसी फैसले के कारण से ही सारे राज्यों में जो लोग गिरफ्तार हुए थे नॉन क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले वो सारे रिलीज हो गए हैं. इक्कादुक्का बचे वो भी रिलीज हो जाएंगे. प्रोसेस में दैट तो इट्स अ पॉपुलर जजमेंट.
सवाल: भीड़ को तितर-बितर करने के लिए प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के प्रयोग के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिया है उसे आप कैसे देखते हैं?
जवाब: वो आदेश बिल्कुल आई ओपनर है. और आदेश बिल्कुल जो सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट है वो टाइमली आया है. क्योंकि राहुल गांधी और सब लोग डिमांड कर रहे हैं कि गृह मंत्री ने इसके आदेश दिए हैं. इसकी जांच कराई जाए. जिम्मेदारी तय की जाए लोगों की, पुलिस की, मजिस्ट्रेट की. दैट विल है सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पे कहा है पुलिस ऑथराइज टू यूज़ पैलेट गंस जो है अंडर द एकिस्टिंग लॉज़ जो है इन वेरी एक्सेप्शनल सरकमस्ट्ससेस अब ये कौन तय करेगा एक्सेप्शनल है कि नहीं पुलिस ऑफिसर ऑन द स्पॉट ही तय करेगा ना एक्सेप्शनल है कि नहीं इसका मतलब है जो लाठी चार्ज हुआ वहां पे और इससे जो पैलेट गन से जो हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इट इज़ जस्टिफाइड टिल यू डोंट चैलेंज द लॉ ये लॉ जिसके तहत पुलिस को अधिकार दिया गया इस लॉ को चैलेंज करिए उसके लिए कोर्ट में आप आइए अगर आपको आना है तो तो एट द मोमेंट तो क्या सुप्रीम कोर्ट से क्लीन शीट मिल गई पुलिस को.
तो पैलेट गंस का मुद्दा जो उठाया जा रहा है फॉर द टाइम बीइंग जो है वो ढक गया है. वो नेपथ्य में चला गया सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद में. अब किसी को इससे आपत्ति है ठीक है ना? तो आप चैलेंज करिए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है अगर कोई स्पेसिफिक केस है, एविडेंस है तो वी विल सी. तो ये द्वार ये विंडो ओपन रखी सुप्रीम कोर्ट ने. पैलेट गन का कोई अगर विक्टिम है, कोई इस तरह का है तो स्पेसिफिक केस लेके आओ तो देखेंगे. लेकिन ये ये फैसला एक तरह से होम मिनिस्ट्री एंडली होम मिनिस्टर उनके लिए क्लीन चिट है. इस सारे प्रोसेस जो एलगेशन उन पे लग रहे थे, इस्तीफा मांग रहे थे. ये सुप्रीम कोर्ट है. जजमेंट हैज़ कम वेरी टाइमली.
सवाल: इस आंदोलन के दौरान नरेंद्र मोदी के दो सुलझे हुए वार्ताकार जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह इनकी भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: भूमिका अच्छी थी. ही इज़ अ न्यू डिस्कवरी ऑफ़ प्राइम मिनिस्टर दिस टीम. यू कैन से नेगोशिएट. आप जेपी नड्डा सब जानते हैं ही टू प्राइम मिनिस्टर. आज पार्टी अध्यक्ष नहीं बट ही कंटिन्यूस टू एंजॉय द सेम ट्रस्ट एंड कॉन्फिडेंस ऑफ नरेंद्र मोदी. जिम्मेदारियां उनको मिलती हैं. उनके बारे में यह कहा जाता है कि इज़ अ लो प्रोफाइल पर्सन वेरी सॉफ्ट स्पोकन बट ही नोस वेयर टू ड्रॉ द लाइन. कहा लाइन ड्रॉ कर ली. उनको बात अच्छे से मालूम है. फर्नली इस बात को कहते हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने बहुत अच्छा लिखा. उन्होंने लिखा है कि लो नड्डा एम एस अ पॉइंट मैन ऑफ नरेंद्र मोदी इन ऑल दिस नेगोशिएशन जो है यह कहा और फिर पार्लियामेंट में जेपी नड्डा ने कहा उस दिन जो है उन्होंने छात्रों से कहा कि देखो अगर तुम्हें एक्टिविस्ट बनना है जैसे हम थे अपने टाइम में तो पुलिस को फेस करना होता है हमारे टाइम में पुलिस एक्सेस भी हो जाती थी.
कई इमरजेंसी में हमारे साथ में हुई तो इसको बी प्रैक्टिकल और अगर बनना है आपको तो फिर मेंटली पुलिस को फेस करने के लिए आप जो है तैयार रहिए रही बात डॉक्टर जितेंद्र सिंह की तो इज़ अ न्यू पॉलिटिकल डिस्कवरी ऑफ़ नरेंद्र मोदी पॉलिटिकल डिस्कवरी फॉर दिस पर्पस जो है मंत्री तो बहुत सालों से हैं वो लेकिन बहुत अच्छा सिलेक्शन आम धारणा यही है उनकी क्रेडिबिलिटी देखिए आप डॉक्टर जितेंद्र सिंह की के बजाय प्रहलाद जोशी को बिल वो पेश कर रहे हैं बिल पे बहस कर रहे बिल का जवाब दे रहे हैं और सब लोग शालीनता सुन रहे हैं तो रातोंरात डॉ जितेंद्र सिंह का ग्राफ तो कहना चाहिए कि भ 50 से 100 पे पहुंच गया एकदम से जो है और नरेंद्र मोदी ऑलवेज क्या है एप्रिशिएट परफॉर्मस एंड रिवार्ड्स परफॉर्मेंस जो है तो लेट्स सी इन द नेक्स्ट कैबिनेट शफल में गुड डॉक्टर जितेंद्र सिंह उनको क्या प्रोप रेसिबिलिटी मिलती है? बट ही डन वेल. ही हैज़ डन वंडर्स अंडर द गाइडेंस ऑफ़ जेपी नड्डा एंड द टॉप मैन नरेंद्र मोदी.
सवाल: आखिर सीजेपी को कितनी जरूरत है राहुल गांधी या अखिलेश यादव या फिर किसी दूसरे राजनीतिक दल की?
जवाब: उनको किसी की जरूरत नहीं है. वो सार्वभौम सत्ता है स्वयं में अपने आप के अंदर. रादर पॉलिटिकल पार्टीज उनके लिए लायबिलिटी हो सकती हैं. दैट विल है. ऑल पॉलिटिकल पार्टीज बिकम टोटली इरिलेवेंट फॉर दीपके एंड ह फ्रेंड्स. उनकी पार्टी के लिए जो है किसी को उनको आवश्यकता नहीं है. इसलिए उन्होंने डे वन को कहा था विल कंटिन्यू टू बी हेडलेस. मतलब हमारा जो मूवमेंट है हेडलेस ही रहना चाहिए. इस तरह से तो किसी की जरूरत नहीं है. अब यह तो क्या है कि उन पॉलिटिकल पार्टी ने इसको हाईजैक कर लिया. राहुल गांधी ने इसके मूवमेंट को एक तरह से हाईजैक कर लिया पिक्चर में आकर के दैट वे और उनको सपोर्ट मिल रहा था. तो उनको आपत्ति नहीं कि इसके ऊपर जाए. बाकी यह मूवमेंट तो पूरे तौर से इनके कंट्रोल में है. इसमें किसी राहुल गांधी, किसी अखिलेश यादव का कोई रोल नहीं.
सवाल: क्या यह सच है कि छात्र आंदोलन के दौरान राहुल और अखिलेश के मतभेद कुछ और आगे बढ़े हैं?
जवाब: हां, बढ़े हैं. कुछ प्रदर्शन करना धरना था पहले पहुंच गए. वो बाद में आए और होना है यूपी को लेकर के क्योंकि अब जो है वो हाई मोराल है राहुल गांधी का. फिर सीट की बात आएगी. कांग्रेस कहेगी कि मुझे तो जो है 200 सीट चाहिए. कुछ और चाहिए. तो डिफरेंसेस है ऑलरेडी. लेट्स सी कि यूपी में इनका गठबंधन बनता है कि नहीं बनता है. स
सवाल: पेपर लीक और छात्र आंदोलन के इस पूरे प्रकरण के दौरान राहुल गांधी की भूमिका को लेकर केवल जो पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स नहीं है बल्कि इंडी गठबंधन के जो उनके सहयोगी दल हैं वो भी इस पर सवाल उठा रहे हैं. आप इसको कैसे देखते हैं?
जवाब: इजीली अनफॉर्चूनेट राहुल गांधी हैज़ नॉट बीन एबल टू कम अप टू द एक्सपेक्टेशंस ऑफ द पोजीशन ऑफ द लीडर ऑफ़ अपोजिशन. ये कहना चाहिए इन जनरल एंड पर्टिकुलरली इन कांग्रेस. लोकतंत्र में होता है एक अवसर मिलता है किसी को फिर होता है अवसर का उपयोग आप कैसे करते हैं राहुल गांधी अवसर का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं उनका सारा जो दर्शन शास्त्र है वो बिखरा हुआ और ऐसा टूटा फूटा नजर आता है अब पार्लियामेंट में इतना अच्छा मौका मिला 50 मिनट 51 मिनट आप बोले टोटल जो है ना उसका दिशा भटक गया उनका भाषण लिया मूल बात कहां रही कहां व्यंग आ गया कहां एडिट की बात आ गई कहां भक्तों की बात आ गई कहीं कुछ और बात आ गई दिशा से भटक जाते हैं आप तो पूरा होमवर्क करके नहीं आते हैं फोकस नहीं होता है उत्साह है जिसे कहना चाहिए जोश गजब का है फिजिकली कामों में बहुत अच्छे दिखते हैं पुलिस उठा के ले जाए टालमटोल करके उससे बहुत खुश है मैसेज जाता है ये सब काम वो कर सकते हैं पॉलिटिकल लीडरशिप के दो पार्ट होते हैं एक तो होता है फिजिकल अपीयरेंस आपकी राहुल गांधी ठीक है एक होता है मेंटल परफॉर्मेंस आपकी जो है ऑन द ग्राउंड क्या परफॉर्मेंस है पार्लियामेंट में लीगल इंस्टीटशंस में उसमें राहुल गांधी बहुत पीछे हैं अभी इंप्रेस नहीं कर पाते किसी मुद्दे पे फिर क्या है कंसिस्टेंसी नहीं रहती वही मैं पहले भी कह चुका हूं.
दैट वे जो है उससे तो देखा जाए घर के अंदर ही प्रियंका इस फार बेटर एज अ स्पीकर सुलझा हुआ व्यक्ति एक सहमित भाषा और व्यंग भी करना प्रखर बुद्धि उसके साथ बात भी करना उससे बात है कि जो इशू है इशू को पकड़ के रखना राहुल गांधी इशू को छोड़ देते हैं बीच में दूसरी बातें बीच में आ जाती है फिर झगड़े हो जाते हैं विरोध हो जाता है वहां पे राजनाथ सिंह ने बड़ी उदारता दिखाई उस दिन ओम बिरला को इशारा करके स्पीकर को जो है और उनको और टाइम दिया बोले उस टाइम को उपयोग नहीं कर पाए वो जो मुद्दे आधारित भाषण होता है ना वो उनका नहीं हुआ होता. दिशा भटक जाते हैं. तो उनका भाषण जो था इट वाज़ नॉट वेरी इंप्रेसिव. आई थिंक ही लॉस्ट वन मेजर अपॉर्चुनिटी. वो प्रेस कॉन्फ्रेंस अच्छी करते हैं. ठीक है ना? उसमें कम भटकते हैं. लेकिन सदन में जब बोलते हैं तो भटक जाते हैं. शोर होता है.
हमें विरोध होता है. दिशा उनकी भटक जाती है उसके अंदर जो है. तो अभी बहुत कुछ उनको सीखने की जरूरत है. बहुत कुछ रिसर्च करने की जरूरत है. बहुत कुछ होमवर्क करने की जरूरत है. लेट्स होप. हम सर अभी आपने अपने जवाब में प्रियंका गांधी का जिक्र किया तो थोड़ा सा इबोरेट करते हुए इस पूरे प्रकरण में प्रियंका गांधी के रोल को आप कैसे देखते हैं? प्रियंका गांधी इमर्जिंग एज ए कांग्रेस लीडर और बहुत से लोग दबी जबान में कहने लग गए हैं कि राहुल से बेटर है ये. अब लेकिन वह बात भी है ना कि राहुल जितना आक्रोश से उसका वह विरोध करते हैं. अब सवाल यह है कि शांतिपूर्ण विरोध हो तो प्रियंका गांधी है उसके लिए बुद्धिमत्तापूर्ण विरोध हो इंटेलेक्चुअल विरोध हो तो प्रियंका गांधी है. अगर ऐसे फिजिकल विरोध हो राठौड़ी का विरोध हो कहते हैं कुछ भी कह देना कुछ भी कर देना तो उसके लिए राहुल गांधी हैं. तो बिटवीन द टू जो है पार्टी के लोग यह महसूस कर रहे हैं कि प्रियंका इज ए बेटर स्पीकर, मोर नॉलेजेबल, मोर बैलेंस एंड ए गुड लीडर वि इन कांग्रेस ऐसा माना जाता है.
सवाल: आपको ऐसा नहीं लगता कि छात्रों के आंदोलन में क्रिमिनल रिकॉर्ड रखने वाले लोगों के शामिल हो जाने से सीजेपी की प्रतिष्ठा को धक्का लगा है.
जवाब: ऑफकोर्स लगा है. मैंने तो पहले भी कहा था. उनको थोड़ी मालूम था कि हमारे आंदोलन में यह चकू लगाने वाले और ये दूसरे लोग वहां पे आ जाएंगे सारे जगह. मालूम होने से तो कोई नहीं करता. भीड़ तो हमेशा है ना नेता के हाथ से निकल जाती है. भीड़ होती है तो और जहां भी भीड़ होती है वहां पर क्या होता है कि क्रिमिनल रिकॉर्ड के लोग घुस ही जाते हैं. खाली घूमते रहते हैं. दिल्ली में प्रोडक्शन करना प्लेस में घूमते लोग मिल जाएंगे आपको. वो उसमें घुस गए जाकर के. तो निश्चित तौर पे ये बात आई गई हो गई होती. लेकिन अमित शाह तो आप जानते हैं वे टफ टास्क मास्टर जो है उन्होंने सब एक-एक आदमी का रिकॉर्ड निकलवाया.
एक-एक आदमी चेहरे की पहचान करवाई. थाने से रिकॉर्ड निकलवाया. था. सारा क्रिमिनल बैकग्राउंड देखा तो पता लगा कि 2873 लोग जो है क्रिमिनल बैकग्राउंड के वहां पे लोग थे और फिर बकायदा टीवी पे जारी हुए. उनके फोटो उनका रिकॉर्ड उनके गले में तख्ती टंगी हुई जो है दैट वे जो है और अपराध कितने सीरियस है उसमें 101 पे हत्या का आरोप है उस 2873 में से 284 पे डकैती है 239 पे आर्म्स है 92 पे महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध है इस तरह से मतलब दुनिया भर के अपराध जो होते हैं क्रिमिनल लॉ में जो वो सारे उन लोगों पे हैं तो अब सवाल यह है कि ये कांग्रेस पार्टी कैसे उनको प्रोटेक्ट करेगी और करेगी भी नहीं उन्होंने पहले कह भी दिया कि हमारा इनसे कोई लेना देना नहीं है लेकिन घुस जाते हैं लोग उसके अंदर जो आंदोलन में जो है तो यह बात फैक्ट है कि इससे कांग्रेस पार्टी की प्रतिष्ठा गिरी है.
भविष्य में वह लोग भी सावधान होंगे कि हमारे किसी आंदोलन में इस तरह के लोग नहीं घुसेंगे. उनका नुकसान ज्यादा है इससे जो है और अमित शाह छोड़ेंगे नहीं. एव्री पर्सन विल बी बोट टू जस्टिस. ये तो आप मान के चलिए क्रिमिनल रिकॉर्ड जो है तो मैं आपसे उसमें जो कह रहा था ना पहचान होगी लोगों की 2873 लोगों की और उसमें उन पे कारवाई होगी. दैट जो है तो हम सेक्रेटरी उसको करेंगे मॉनिटर. ऑफ कोर्स अमित शाह ने कहा तो करेंगे ही ड्यू फॉर एक्सटेंशन जो है वो बहुत कम लोग ब्यूरोक्रेसी में ऐसे हैं लाइक पीके मिश शाह जो कि पॉलिटिकल मैनेजमेंट को समझते हैं हायर ब्यूरोक्रेसी कई बार ऐसी हो गई केवल पेपर ब्यूरोक्रेसी जिसे कहिए यथार्थ से उनका कोई नहीं है बस वर्क बुक रूल से चलना करना सारा जो है लेकिन आज के चुनौतीपूर्ण समाज में ब्यूरोक्रेट को पॉलिटिकल मैनेजमेंट भी आना चाहिए वही सक्सेस होता है दैट वे तो गोविंद मोहनी पॉलिटिकल मैनेजमेंट जानते हैं तो वह जो 2873 लोगों की पहचान हुई है दैट वे जो है वो मुझे लगता है उन पे स्ट्रांग एक्शन होगा और लॉजिकल एंड पे वो सारी बात उसमें आनी चाहिए. तो
सवाल: आखिर सीजीपी प्रोटेस्ट का करंट स्टेटस क्या है?
जवाब: करंट स्टेटस यह है कि वो तो उस दिन जो उन्होंने कह दिया था प्लीज गो बैक योर होम्स वी हैव डन आवर जॉब अचीवमेंट हो गया दैट वे जो है ठीक है और उसमें देखा जाए तो उस समय चार राज्यों में 3500 लोग हिरासत में लिए गए थे 18 एफआईआर दर्ज हुई थी 12 राज्य इससे प्रभावित हुए बिहार में गोलीवोली भी चल गई प्रदर्शन हो गया आज तो शांति है एक मुद्दा टकराव का आ सकता था लेकिन सरकार ने संभाल लिया उन्होंने कहा था सरकार ने जो तय किया था कि छोड़ो नॉन क्रिमिनल बैकग्राउंड के लोगों को तो अब छोड़ छोड़ दिया. उन्होंने 99% लोग छूट गए होंगे. दैट इज तो आज टकराव का कोई मुद्दा नहीं है. लेकिन इसी बीच में एक नई बात कह दी है दीपके ने. उन्होंने कहा है कि भाई मुझे बीजेपी के लोग धमकियां दे रहे हैं. मेरे परिवार को और उनको कहते हैं भाजपा जॉइन करो आप. तो एक नया इशू. फिर ये दूसरा इशू आज मैंने पढ़ा कि वो कहते हैं कि हम भी गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग में शामिल हैं. यह दूसरा इशू. तो इशू क्लोज नहीं हो रहा. नरेंद्र मोदी ने अपनी तरफ से पूरा पैकेज देके इशू को क्लोज कर दिया है. लेकिन अभी ऑफ शूट थोड़े से बाकी है. तो इट टू बी सीन कि बाद वाले इशज़ कब क्लोज होते हैं?
सवाल: क्या ये बात सच है कि छात्रों के आंदोलन में बड़ी संख्या में बिना टोपी लगाए मुस्लिम युवक भी शामिल थे. जिन्होंने हिंदू लड़कियों से प्यार मोहब्बत के चक्कर में अपना नाम मोनू, अप्पू पप्पू और डब्ल्यू रखा है.
जवाब: हां, मैंने भी सुना है ये. इंटेलिजेंस की रिपोर्ट में शायद इसका जिक्र हुआ है. गृह मंत्रालय कोई रिपोर्ट गई है शायद वहां सुना है इसका जिक्र हुआ है. हो गया होगा. ऐसे टाइम पर तो मजनू किस्म के लोग फालतू लोग बहुत हैं घूमने वाले आंदोलन चल रहा होता है. चलो चलते हैं और कॉफी पी के आते हैं वहां जाके कुछ खाने का मिल रहा होता है. चलो चलते हैं और अपू चले गए कहीं वहां पे. इंटेलिजेंस की रिपोर्ट है कि हां ऐसा हुआ है जो है. सो अगली बार ध्यान रखेंगे लोग ये कि बिना टोपी के पहचान आ जाती थी. अब लड़के सब स्मार्ट हो गए हैं. सब समझते हैं ये और टोपी वैसे छोड़ दी उन्होंने और प्यार मोहब्बत में टोपी के साथ प्यार मोहब्बत कौन करेगा? कोई नहीं करेगा. तो टोपियों सब उतर गई जो है तो ऐसी रिपोर्ट है इंटेलिजेंस की. ठीक है.
सवाल: इस पूरे घटनाक्रम में 26 दिन तक आमरण अनशन करने वाले सोनम वांगचुक के आप रोल को कैसे देखते हैं?
जवाब: रोल उनका कंस्ट्रक्टिव था. बस कुदरत से बच गए. जा सकते थे. सरकार अगर ऐन वक्त पे फैसला नहीं करती. करज कन्विक्शन के साथ उनको उठाती नहीं वहां से बेसिकली तो क्या है ही वेल मीनिंग पर्सन लद्दाख से छोटेोटे प्रदर्शन करते थे उनके पिता भी अनशन पर बैठते थे उनका पारिवारिक ये एक लीगेसी है अनशन पे बैठने की लंबे अनशन पे बैठने की जो है तो उन्होंने आंदोलन चलाया तो उसमें लद्दाख को स्वायता दो करके हिंसा हो गई थी तो हिंसा भड़काने के आरोप में उनको एनएसए में बंद कर दिया था सितंबर 25 में तो छ महीने फिर वो जोधपुर जेल में बंद रहे फिर जेल के बाहर आए बाहर आए तो एक दिन अचानक जंतर मंतर चले गए ये आंदोलन चल रहा था इसमें उनको अच्छा लगा तो आमरण अनशन पर बैठ गए वहां तो बड़ा नाम मिल गया उसको वांगचु के क्रेडिबल नाम था ना तो उस आंदोलन को भी थोड़ा सा सहारा मिला एक और एक 11 उस हिसाब से जो है तो बैठ गए वो अब हटे नहीं अनशन से प्रयास हो गए सारे फिर वो 26 दिन बाद जो है 24 जुलाई को जो है उनको जेपी नड्डा जितेंद्र सिंह सक्सीड हो गए उनको मनाने में ले गए शिफ्ट करके और फिर ये समझौता साइन वहां पे हो गया लेकिन जो समझौता हुआ उनके उससे कई लोगों को धक्का भी लगा कि यार यह बीच में ही छोड़ के चले गए हमको कांग्रेस पार्टी के.
तो कांग्रेस पार्टी ने दीपके वगैरह ने बयान दिया कि भाई उनका जो हुआ है वह सब ठीक है. लेकिन हमारा धर्मेंद्र प्रधान की इस्तीफे की मांग का स्टैंड और शैक्षणिक सुधार का जो स्टैंड है वो जारी रहेगा. उसमें कोई इशू नहीं है. लेकिन चांस ऐसा हुआ कि अगले दिन सरकार ने जो है धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा करा दिया. तो ऐसा भी लगता है कि वांगचुक के साथ जो समझौता हुआ था शायद उसी में अंडरस्टैंडिंग बन गई इस्तीफा हो जाए. अब क्रेडिट दिया जा सकता है नहीं दिया. फिलहाल तो क्रेडिट जो है वह कांग्रेस पार्टी को ही गया प्रधान के इस्तीफे का जो है तो आए थे मीनिंगफुल बात की उन्होंने ठीक है इज़ अ मीनिंगफुल पर्सन तो बीच में फिर कई आरोप भी लगते हैं तो उन्होंने कह दिया बिग गए डील हो गई इनकी उनकी पत्नी को और भाषा बोलने लग गई ये सब होता है आमतौर पे जो है लेकिन कुल मिला के वी कैन कंक्लूड वांगचुक इज़ अ मीनिंगफुल पर्सन ही प्लेड ए कंस्ट्रक्टिव रोल कैंपेन का जो एंड पार्ट था एंड ऑल इज वेल
सवाल: क्या यह बात भी सच है कि किसी भी बड़े आंदोलन की स्मृतियां और उपलब्धियां समय के साथ में बुला दी जाती हैं और सब कुछ पुराने ढर पे लौट आता है. क्या जेन जी आंदोलन इसका एक अपवाद साबित होगा?
जवाब: किसान आंदोलन हुआ था तो किसान राष्ट्र रक्षा और अपने किसान का झंडा और उस भाव में थे वहां पर जो है अब बाद में जब घर लौट गए वहां पे तो घर में वही धर्म की खूंटी और जाति की खूंटी उसमें बंध गए दैट वे जाकर के वहां वापस वैसे हो गए जो मुख्यधारा में जहां से आए थे तो दिस इज टू बी सीन लेकिन इसमें चांसेस कम है क्योंकि ये यंग लोग हैं इनका भविष्य है और किसान तो आए थे अपने काम से चले गए जो है तो इनको क्या चाहिए एंप्लॉयमेंट चाहिए किसी को क्या चाहिए मतलब ओनली द टाइम विल टेल कि ये भी किसान आंदोलन कितना वापस अपने घरों में लौट जाते हैं.
अपने काम करने ना सारी जिंदगी आंदोलन कौन करता रहेगा? किसी को पढ़ाई करनी है, किसी को और कोई नौकरी कर रहा हो, कुछ और कर रहा होगा तो वापस तो जाएंगे ना. सारी जिंदगी आंदोलन नहीं कर सकते. तो कह सकते हैं पार्टली लोग वापस जा सकते हैं काम में और एक्चुअली बात यह है कि समय के साथ पता लगेगा. अगले 6 महीने तीन महीने क्रूशियल है. ये जो लोग आए थे ये उस विचारधारा से या उसी आंदोलन से खड़े रहते हैं या फिर किसान आंदोलन की तरह अपने घरों में जाकर अपने रोजमर्रा कामों में जुट जाते हैं.
सवाल: मैंने सुना है कि फॉरेन पावर्स कुछ विपक्षी दल और इसके अलावा औद्योगिक घरानों के द्वारा इस आग को भड़काने में घी डालने का काम किया गया इनके द्वारा. आपको क्या लगता है और दूसरा यह आंदोलन था या वेल प्लेंड एक कांस्परेसी?
जवाब: देखो कास्परेसी तो नहीं ये स्वतः स्फूर्त एक आंदोलन था. इसमें किसी को आईडिया नहीं था इस बात का. दैट वे जो है तो कास्परेसी के चार्ज अभी फिलहाल स्टैंड नहीं कर रहा है. ऐसा नहीं लग रहा निष्पक्ष ढंग से देखा जाए तो लेकिन दूसरा यह बात जरूर है कि ऐसे टाइम फॉरेन पावर्स तो एक्टिव होती हैं. अमेरिका सबसे ज्यादा बदनाम है इस काम में जो है आप देखते हैं किया हुआ कुछ. औद्योगिक हराने भी करते हैं. कुछ तो ट्रेडिशनली करते हैं. उनको करना ही होता है. एक तरह से वो सरकार से थोड़ा सा नाराज रहते हैं. किनहीं कारणों से तो वो करते हैं. थोड़ा बहुत क्या है उनको खास फर्क नहीं पड़ता उससे.
इन लोगों के लिए 5 10 करोड़ ही बहुत होते हैं. ऐसे टाइम पे जब खाने का इंतजाम होता है, गाड़ी का इंतजाम होता है और लाने का इंतजाम होता है. तो कोई बड़ी बात नहीं है. लेकिन है उसने कहा हमें कोई फॉरेन फंड से किसी से कोई सहायता नहीं मिली है. सहायता मिली तो हमारी जांच करा लीजिए. दैट वे जो है तो मुझे अपेरेंटली अभी नहीं लग रहा है इसमें यह चर्चा जरूर है इंटेलिजेंस की रिपोर्ट भी ऐसी है कि औद्योगिक घरानों का इनडायरेक्ट सपोर्ट है इन लोगों को फॉरेन पावर्स का सपोर्ट है लेकिन अभी कोई ऐसा बड़ा खर्चा इन लोगों ने किया नहीं इस तरह का सपोर्ट है दिए होंगे आगे फ्यूचर में प्रमोट कर सकते हैं अभी तो खाना पीना रुकना इस तरह का काम था जो लगता है लोगों ने कोई जेब से किया होगा थोड़ा बहुत आ गया होगा पैसा कोई लंबी चौड़ी बात इसमें नहीं है लेकिन यह धारणा मजबूत है औद्योगिक घराने फॉरेन पावर्स जो है इस मौके को एनकश कर रही हैं. ये एक परसेप्शन कंप्लीट है.
सवाल: क्या इस सारे माहौल में जो परीक्षा में नकल रोकने का काम है उसमें क्या स्टूडेंट्स की भी कोई मोरल रिस्पांसिबिलिटी आप मानते हैं?
जवाब: हां माननी चाहिए. मतलब जैसे मोहन भागवत एक आदर्श की बात कर रहे थे कि अभी बच्चे ठहरे हुए नहीं. इनको सोचना चाहिए अपने बारे में. तो हर सोचना चाहिए ये तो तय करना ही चाहिए कि यार मैं तो नकल नहीं करूं कम से कम एग्जाम में खुद तो और मैं अपने साथी को दोस्त को नकल नहीं करने दूं. आज नई थ्योरी चल रही है ना बेस्ट फ्रेंड्स की. लड़के लड़कियों में तो बेस्ट फ्रेंड्स को तो नहीं करने दो भाई कम से कम आप भी नहीं करो बेस्ट फ्रेंड को भी प्रॉमिस लो उससे कि यार तू नकल नहीं करेगा दैट वे जो है तो ये कम से कम इतना तो होना ही चाहिए क्योंकि मैंने शुरू से भी कहा था ना आपसे थिन डिफरेंस है प्रोटेस्ट और उसके बीच में और सबसे बड़ी बात ये है कि नैतिक जिम्मेदारी है कोशिश तो करो ये इतना तो करो जब इतना आंदोलन आप कर रहे हो तो आप खुद तो तय कर दो कम से कम मैं तो नकल नहीं करूंगा और दोस्त को नहीं करने दूंगा तो है जिम्मेदारी इतनी तो तो
सवाल: क्या इस मूड पर भारत को अपने मौलिक शिक्षा दर्शन में झांक कर देखना चाहिए?
जवाब: बिल्कुल इंडिया शुड गो बैक टू ओरिजिनल लीजसी ऑफ ओरिजिनल एजुकेशन सिस्टम जो मैंने आपसे कहा ना हमारा सिस्टम हाईजैक हो गया वेस्टर्न सिस्टम से सारा का सारा सिस्टम जो है ये हाईली कॉस्टली जिसे कहना चाहिए अब बहुत ही उंखल इनडिसिप्लिंड बहुत प्रॉब्लम होगी शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षा का सब्जेक्ट तो इन लोगों ने ठीक उठाया है बस यह है कि एक अपॉर्चुनिटी क्राइसिस जिसे कहते हैं नरेंद्र मोदी क्राइसिस को अपॉर्चुनिटी में कन्वर्ट करते हैं तो एक कट सी इस आंदोलन की है. काकरोच की है कि इन्होंने शिक्षा के मुद्दे को नकल के मुद्दे को इस मुद्दे को उठाया तो है उस मुद्दे को जिसे है. तो उससे क्या होगा? सरकार के ध्यान में था लेकिन सरकार का फोकस हो गया. अब और प्रधानमंत्री भी चाहते होंगे मुझे एजुकेशन और टोटल क्लीन अप करना है. इट माइट बिगेन विद द शिफ्टिंग ऑफ प्रधान इवन. यू कांट से जो है. लेकिन ये तो बात तय हो गई कि ओवरऑल शिफ्टिंग की जरूरत तो है सिस्टम में. क्लीनिंग ऑफ ऑपरेशन की जरूरत है. ये तो लेट्स सी करेंगे प्राइम मिनिस्टर.
सवाल: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि एजुकेशन सिस्टम में सुधार के लिए राज्यों के मुख्यंत्रियों को भी जिम्मेदारी लेनी होगी?
जवाब: बिल्कुल जिम्मेदारी लेनी होगी उसके साथ-साथ में और मैं इतिहास में देख रहा था कि पहले बहुत से ऐसे इस्तीफे हुए हैं उप मुख्यंत्रियों के मंत्रियों के. इन्हीं घटनाओं को लेकर के जो है एक आरआर पाटिल उप मुख्यमंत्री गृह महाराष्ट्र सुधाकर राव नायक हैं गायत्री प्रसाद हैं नर गुर्जर हैं. तो कई उदाहरण मौजूद है. इन प्रिंसिपल आई एग्री विद यू कि ये मामला केवल धर्मेंद्र प्रधान की जिम्मेदारी तक और जिम्मेदारी क्या है? धर्मेंद्र प्रधान को इसलिए तो नहीं हटाया गया कि तुम रेसोंसिबल हो. वो तो पूरा मान सम्मान दिया गया उनको. और एक सिंबॉलिक शिफ्टिंग था वो अंडर सरकमस्ट्ससेस इन द लार्जर इंटरेस्ट शिफ्टिंग था. दैट वेल जो है लेकिन अगर आप मान भी लेते हो चलो जिम्मेदारी है तब भी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों की भी नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए उन राज्यों में जहां नकल के बड़े केस हुए और सरकार कोई एक्शन लेने में विफल रही है.
सवाल: ये छात्र आंदोलन अब तो खत्म हो गया है. इसके बाद बीजेपी ने संगठन स्तर पर क्या-क्या डैमेज कंट्रोल के लिए रोड मैप तैयार किया है.
जवाब: बीजेपी एक्टिव हो गई है पूरे तौर पे. जो है पार्टी अध्यक्ष अमित शाह नरेंद्र मोदी जेपी नड्डा सबके लेवल पर कलेक्टिव थिंकिंग हो गया है कि इन लड़कों के मुकाबले में या यूथ के मुकाबले में दूसरी कांग्रेस के लोग खड़े हुए हैं यूथ कांग्रेस के और कोई जो भी है पार्टी का जो बेस है संसार की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी है इतने मेंबर्स हैं ये कहां है ये दिखाई नहीं दिए इस आंदोलन के दौरान इनको खड़े होना चाहिए था राज्यों में जो डिक्टेट गया यहां से तो प्रदर्शन हुए सब राज्यों में कांग्रेस वाले कर रहे थे तो बीजेपी वाले भिड़े उनसे वन टू वन एक पता लगा कि हां पार्टी भी इनके साथ है सरकार के जो है ये तो उन्होंने युवा संवाद करके कार्यक्रम चालू किया है.
उसमें बड़े पैमाने पे सब जगह वो इंप्लीमेंट होगा खासकर ये जो कोचिंग सेंटर्स हैं जहां-जहां फेमस कोचिंग सेंटर्स हैं बड़े प्रयागराज है पटना है जयपुर है वहां वो लोग जाएंगे समझाएंगे बच्चों को बात करेंगे इस तरह से महिला मोर्चा जो है उनकी लड़कियां जो है वो वुमेन जो कोचिंग में लड़कियां पढ़ रही हैं उनसे मिलेंगे कोचिंग सेंटर पे जाके उनको समझाएंगे और ग्रास रूट पे सारा इसको जो है वो देखेंगे तो पार्टी जागृत हुई है इस बात पे और पार्टी अपनी मशीनरी का उपयोग करेगी और मैंने आपसे कहा ना कि जितनी गति और जितने कमिटमेंट से और जितनी स्पीड से नरेंद्र मोदी काम करते हैं जिसे कहना चाहिए ना वन मिशन मैन है अब ये हो गया ना इसका ये क्राइसिस जो हुआ तो कितनी तन्मयता से कितनी जुझारूपन से लगे हुए थे वो इन सात दिनों में देखो ना आप रात को 12:00 बजे हो रहा है रात को 1:30 बजे हो रहा है दिन में देख रहे नींद सो ही नहीं पा रहे होंगे लगता है दो घंटे सोते होंगे इन पांच सात दिनों में क्योंकि उनको पता है कि मुझे करना है दिस इज माय रेस्पोंसिबल िटी अगर पार्टी का हर कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी की भावना से खड़ा हो जाए इसके अंदर कि मुझे करना है मेरा कमिटमेंट है अकेले नरेंद्र मोदी नहीं मेरी भी जिम्मेदारी इसके अंदर है तो पार्टी कर देगी पार्टी के पास में करोड़ों कार्यकर्ता है जो किसी के पास में देश में नहीं है सो लेट्स सी
सवाल: राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि सारे प्रकरण में बीजेपी पहले ऑफगार्ड थी और किसी को इसका अनुमान भी नहीं था तो आपका क्या आकलन है इसको लेकर
जवाब: अब्सोलुटली करेक्ट ये तो फैक्ट देखो ये बीजेपी के जो पॉलिसी मेकर्स हैं, स्ट्रेटजी मेकर्स हैं उनके सिलेबस में नहीं था कि ऐसा कोई छात्र आंदोलन खड़ा हो सकता है एकदम से सडन 24 घंटे में और इतना फैल सकता है इस तरह से सरकार खुद ये सोचे 48 घंटे में कि इस आंदोलन को चलते रहना है कि इसको खत्म करना है और सरकार में उस समय आम धारणा बनी थी कि इस आंदोलन के चलते रहने से पब्लिक सेफ्टी को खतरा है. प्रॉपर्टी को खतरा है.
दिल्ली में लोगों की लाइफ को खतरा है. तो इन द लार्जर इंटरेस्ट जो है इसको रोको. वो इस्तीफा करना है जो भी करना है पीस बाय करो. इसलिए अफ लिखा भी था उसमें कि धर्म प्लान डेिग्नेशन पे द वे ऑफ़ पीस उसे एक शांति का मार्ग प्रदान करता है. इसी तरह से क्या है कि अब वो ऑफगार्ड थी. उस समय किसी को इसका अंदाजा नहीं. ऐसा हो जाएगा. मैंने कहा ना आपसे जो है ये तो अब क्या है कि बीजेपी के सामने सब चैलेंज ये है इस समय. उसके समझ में नहीं आ रहा है कि इस पार्टी को कैसे हैंडल करें काज को. यह पार्टी है भी नहीं और है भी सही. नो वन इज इन द पार्टी बट मिलियंस फॉलो दिस पार्टी. जैसे कहते हैं ना पार्टी में कोई है भी नहीं और लाखों लोग पार्टी के साथ भी हैं. दैट वे तो चैलेंज है बीजेपी के सामने तो कर रहे हैं इसको हैंडल.
सवाल: एक पल के लिए जेन जी आंदोलन को छोड़ दीजिए. देश के युवा एजुकेशन एंड एग्जामिनेशन सिस्टम से क्यों नाराज है?
जवाब: नाराज इसलिए कि दोबारा परीक्षा देने से बर्बाद है बेचारे. वो एक ही बात कहते हैं. अरे भाई नौकरी तो मत दो. परीक्षा तो ठीक से करा लो यार. सही बात है ना? और नरेंद्र मोदी ने खुद बिल में कहा है ना कि पेपर लीक करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा. युवा पीढ़ी से खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा. वो खुद मानते हैं ना. तो क्या है इस पे सहमति है. नरेंद्र मोदी भी सहमत हैं. सारा देश सहमत है. आंदोलनकारी छात्र भी सहमत हैं कि शिक्षा में सुधार होना चाहिए और व्यवस्था सुधरनी चाहिए. परीक्षाएं जो है नकल मुक्त होनी चाहिए. परीक्षाएं पेपर लीक से मुक्त होनी चाहिए. इसलिए आम सहमति है देश में. नरेंद्र मोदी ने कानून लाकर आम सहमति बना दी है.
अब आपने कहा कि लोग क्यों परेशान है युवक तो यही कह रहे हैं कि यार परीक्षा तो करा दो ठीक से नौकरी मत देना हम खुद कर लेंगे और दोबारा परीक्षा तो मौत है. 22 लाख नीट की परीक्षा हुई दोबारा करना पड़ा. कितने लोगों ने आत्महत्या भी कर ली. मैंने सुना 20 21 लोग उसमें आत्महत्या कर गए जो है ये नहीं भी करते तो सैकड़ों लोगों ने बिना आत्महत्या किए हुए मानसिक आत्महत्या की होगी. मैं कहता हूं आप खुद सोचिए अपने आपको. आप परीक्षा देके आए. इतने दिन पढ़ते रहे, मेहनत करी, ये किया, वो किया. एग्जाम दोबारा हो रहा है. अरे क्या मजाक है भाई ये? इससे तो कभी मुझे ऐसा लगता है कि जो परीक्षा रद्द करने का फैसला है वो नहीं होना. जो हो गया सो हो गया. जितनी बेईमानी हुई थोड़ी बहुत तो जाने दो उसको. 22 साल लोग तो रैंसम पे नहीं होते. 22 लोग तो दोबारा से कष्ट नहीं पाते उसको.
उससे वो से लोग फेल हो गए. मुझे तो अगर एग्जाम पास करने का मैं तो चार बार फेल हो जाऊंगा उसके अंदर. दोबारा एग्जाम मानसिक प्रताड़ना है ये. और सरकार ने तो क्या ईमानदारी के नाते किया होगा बेईमानी नहीं होनी चाहिए कैंसिल करो उसमें किसी ने सोचा होता है कैंसिल करने से 22 लाख परिवारों में कितना असर पड़ेगा फिर से कोचिंग में जाएंगे फिर से फीस भरेंगे फिर से वो करेंगे सारा मेंटल ट्रॉमा दैट विल है इसलिए युवा निराश था परीक्षा से यार दोबारा तो मत करो इसको कम से कम जो है तो ये है युवा का जो सबसे बड़ा इशू जो है ना और फिर एंप्लॉयमेंट है वो तो खैर ठीक है पूरी दुनिया में हमारे देश में फिर भी कंपेरेटिवली अच्छा है नरेंद्र मोदी सरकार करोड़ों लोगों को रोजगार दे तो रही लेकिन बेरोजगारी बहुत ज्यादा है. वो एक अलग विषय है. दैट इज तो दिस इज ऑल.
सवाल: दिल्ली पुलिस कमिश्नर के पद से सतीश गोलजा के सडन डिपार्चर को कैसे देखते हैं आप? और इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की इनसाइड स्टोरी क्या है?
जवाब: इनसाइड स्टोरी तो मुझे ऐसा लगता है कि क्योंकि नए जो कमिश्नर आए उन्होंने आते ही पहला काम ये कहा कि देयर इज अ जीरो टॉलरेंस ऑन करप्शन. मैं भी हैरान हुआ. ये क्या हुआ? भाई आज आप आए हैं चार लिया है एक घंटा हुआ है. आप करप्शन की बात कह रहे हैं. इसका मतलब है कि जो अधिकारी गए हैं जो घटना हुई है उसमें कोई ना कोई करप्शन का बैकग्राउंड है. कोई ना कोई इशू है. उसमें कोई इनवॉल्वमेंट या कोई बात सामने आई होगी. ईडी ने सुना है किसी को अरेस्ट किया है. उसने कोई बयान दिया है. उसके आधार पे हुआ होगा. अनफॉर्चूनेट है. बिकम इस टॉप लेवल पे तो हमारी इंटीग्रिटी पे उंगली नहीं उठनी चाहिए ना. तो इनसाइड स्टोरी मुझे ऐसा लगा करप्शन का कहीं ना कहीं शायद कोई कारण इस तरह मतलब दैट या कुछ रहा होगा दैट वे बात आई होगी सामने और आप जानते हैं अमित शाह की गवर्नेंस को और उनके साथ नीचे गोविंद मोहन जो है सेक्रेटरी होम जो है उनकी गवर्नेंस को जो है दैट वे जो है इमीडिएट होता है तो आई होगी खबर ऐसी जो है तो अमित शाह ने फैसला लिया होगा लेना ही था.
सवाल: लोकसभा में सात दिन से जो गतिरोध चल रहा था उसको तोड़ने उस डेडलॉक को तोड़ने के लिए आप ओम बिरला के रोल को कैसे देखते हैं
जवाब: स्पीकर ओम बिरला के रोल ही इज़ वेरी इफेक्टिव ही इज़ अनदर साइलेंट परफॉर्मर जिसे कहते हैं मुस्कुराते मुस्कुराते बात करना और ये जो तोड़ा है तो उन्होंने दोनों पक्षों के जो फ्लोर मैनेजर्स हैं उनको बुला के उनसे बात की राहुल गांधी मिलने गए उनसे बात की और अंततः गतिरोध टूटा सरकार भी खुश थी प्रधानमंत्री अमित शाह भी खुश होंगे चलो गतिरोध टूटा कुल मिला के ये हो गया है ओम बिरला कार्यकाल भी कि जिस तरह देश में एक धारणा बन गई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक प्रतिस्थापित हो गया चेहरा चेहरा गृह मंत्री अमित शाह एक चेहरा प्रतिस्थापित है.
लोकसभा स्पीकर अब ओम बिरला का चेहरा इसी तरह से प्रतिस्थापित हो गया है. लोकसभा स्पीकर कौन? ओम बिरला मतलब यह कि आदर्श है ये अपनेप क्षेत्रों के अपने-अपने व्यवस्था के जिसे हम कहते हैं एक ये भी एक पाया है ना लोकसभा संसद एक पाया है उसका इंपॉर्टेंट जो है तो वहां भी एक इक्वली कॉम्पिटेंट जिसे कहना चाहिए एक साइलेंट परफॉर्मर वहां पे जो रिजल्ट ओरिएंटेड है आप देखिए वहां बैठा हुआ है तो निश्चित तौर पे ओम बिला रिजर्व्स वोट ऑफ़ थैंक्स जिसे कहना चाहिए पार्लियामेंट को चालू करवाया बहुत अच्छी बात है
सवाल: आपको लगता है कि इस मौजूदा हालात के बीच में सरकार संसद से परिसीमन बिल और महिला आरक्षण बिल पास करा लेगी.
जवाब: 100% मैंने कहा था आपसे जब तक अमित शाह सीन में है सारे बिल जो पेश होंगे लोकसभा राज्यसभा में वह सारे पास होंगे और परिसीमन महिला बिल आल्सो विल नॉट बी एन एक्सेप्शन टॉपिक एंड्स ओनली अ टाइमिंग मे बी डिफरेंट दैट्स ऑल
सवाल: संसद में एंटी पेपर लीक पर बहस के दौरान नई दिल्ली की युवा सांसद बांसुरी स्वराज ने जिस शोध के साथ ओजस्वी शैली के साथ सरकार का पक्ष रखा उसने देश को एक बार फिर से पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीय सुषमा स्वराज के भाषणों की याद दिला दी. एक युवा सांसद के रूप में बांसुरी स्वराज की इस आउटस्टैंडिंग परफॉर्मेंस को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: अब्सोलुटली आर राइट. उस दिन कई सीनियर मेंबर्स की आंखों में आंसू थे जिन्होंने सुषमा स्वराज के भाषणों को सुना था. वही तेज धार, वही व्यंग, वही गहरा अध्ययन, वही प्रखर वक्ता का रूप वो सारा उन्होंने उसमें देखा. तो मुझे ऐसा लगता है कि नाउ शी इस द वुमेन फेस ऑफ़ बीजेपी. पहले स्मृति ईरानी होती थी वो भी प्रखर वक्ता थी तो अब पार्टी की जो वुमेन फेस है वुमेन वक्ता है एक तरह से जो है यह बांसुरी है और दूसरी बात ये मुझे लगता है कि पार्टी में फील्ड बांसुरी अगेंस्ट प्रियंका पॉलिटिकली जो एक चेहरा होता है ना वमेन टू वमेन का जो है तो लगता है उसको आगे फेस करेंगे परफस अच्छी थी सब लोगों को अच्छा लगा और टू द पॉइंट बोली वो सो शी डिर्व्स अ वोट ऑफ एप्रिसिएशन
सवाल: आखिर कितना व्यापक है देश भर में पेपर माफिया का माया जाल
जवाब: बहुत जबरदस्त है. 116 पेपर मैंने सुना लीक हो गए. 7 करोड़ बच्चे उससे प्रभावित हैं. 19 राज्य उससे प्रभावित हैं. डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा और जेपी नड्डा ने भी कहा कि अब तो क्रिमिनल हो गया. ये माफिया जो है. इसीलिए प्राइम मिनिस्टर ने कहा कि उनको बख्शा नहीं जाएगा. तो अब ये इंडिविजुअल इशू नहीं रहा. ये एक धंधा बन गया. एक तरह से बिजनेस जो कहना चाहिए तो बहुत खतरनाक इसका साम्राज्य है और इससे क्या है लोकल क्रिमिनल जो लोग हैं वो जो आपने कहा 2873 लोग घूमते रहते हैं.
इधर से उधर वो शामिल हो गए हैं इसके अंदर जो है एक बहुत अच्छी बात ये है कि हर नेगेटिविटी में पॉजिटिव चीज होती है सपोज़ करिए आंदोलन की चुनौती हुई सरकार में चिंता हुई थोड़ा सा पैनिकिक दो चार दिन रहा रहता है हर ऐसे टाइम पे कि पता नहीं कैसे हैंडल करेंगे लेकिन अंत इतना अच्छा हुआ और सबसे बड़ी बात यह है सरकार और ज्यादा सेंसिटाइज हो भाई इस मुद्दे पे और एक बार नरेंद्र मोदी अमित शाह किसी मुद्दे को पकड़ लेते हैं तो उसको लॉजिकल लेवल पे लाके ही छोड़ते हैं. तो मान लीजिए अगले दो चार छ महीने सारा फोकस इसी पे रहने वाला है. तो युवा पीढ़ी का स्वर्णिम काल आने वाला है इस एंगल से कि पेपर लीक बंद हो जाएगा आपका. ऐसा लगता है मुझे.
सवाल: मौजूदा हालात में आप क्या संभावनाएं देखते हैं बांकपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की जीत पर?
जवाब: वहां का देखो अब तो बीजेपी जीत तो रही है अपेरेंटली लेकिन 99% 1% का आप मान लीजिए बीजेपी जीत रही है लेकिन बहुत कम मार्जिन से. 34% वोट पड़ा है. पिछली बार 52 हजार से जीते थे नितिन जो पार्टी अध्यक्ष हैं. ठीक है इस बार अंतर कम रहेगा. पीके जो तीन नंबर पे थे वो नंबर दो पे चल रहे हैं. दैट्स जो है पीके इसमें खेल कर सकते थे. लेकिन प्रॉब्लम क्या है कि वो जो कास्टेंसी है वह एनडीए की कास्टेंसी है.
सामाजिक समीकरण ऐसे हैं जो एनडीए के साथ हैं. 3 लाख 3 लाख 70000 वोटर हैं तो 3 लाख एनडीए के साथ हैं. दैट वे जो है और फिर पूरा एनडीए वहां पड़ा हुआ था. चीफ मिनिस्टर वहां पड़े हुए पांच बार यह जाए पार्टी प्रेसिडेंट प्रतिष्ठा का प्रश्न है दैट वे तो फ्रॉम ऑल एंगल्स और जो वोट जिस तरह से पड़ा है लगता है कि बीजेपी जीत रही है और अंतर दोनों में कम रहेगा और अगर प्रशांत किशोर जीतते हैं तो सिर्फ मिरेकल नहीं होता जन्मपत्री का वैसा लेकिन कंक्लूड मैं यही कर रहा हूं कि बीजेपी जीत रही है.
सवाल: अमित शाह ने नक्सल मुक्त भारत जो अभियान के तहत झारखंड में एक बड़ी कारवाई की है. उस कारवाई के तहत उन्होंने झारखंड में 2.2 करोड़ रुपये के नक्सली मिस्र बसेरा की गिरफ्तारी की है. उस पूरी गिरफ्तारी उस प्रकरण को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: देखो ये नक्सल क्रांति के जो प्रणेता हैं कहिए या सूत्रधार हैं. नरेंद्र मोदी के सुपरविजन में अमित शाह का यह एक और चमत्कार है 370 जैसा जिसे कहना चाहिए. इमेजिन करिए किसी ने कल्पना की थी कि बस्तर वहां पर स्कूल खुल जाएंगे. ढाबे रेस्टोरेंट खुल जाएंगे. सिनेमा खुल जाएंगे और सारा नक्सल 95% सरेंडर हो जाएगा और कितना बड़ा कैच है यह वाला जो लिया है गजब है जिसे कहना चाहिए कितनी बड़ी बात है नक्सल जो कि 50 साल से चला आ रहा है और बात ये है कि अमित शाह ने दावा किया था कि मैं कर दूंगा इसको और कर दिया यार कमाल है मैं कहता हूं दावा तो बहुत लोग करते हैं वो कैसे करते हैं क्या करते हैं अद्भुत यहीं पे फिर वो तालमेल काम आता है उनकी मिनिस्ट्री में अफसर अच्छे लगे हुए हैं उनका तालमेल अच्छा अफसर ब्यूरोक्रेसी अच्छी है उनके यहां जो है उनके उनके खुद के लीडरशिप के साथ-साथ जो है तो निश्चित तौर पे ये एक चमत्कार है और इसके लिए जो है ना जैसे कहना चाहिए अमित शाह को ये जिम्मेदारी सौंपने के लिए प्रधानमंत्री की भी तारीफ होनी चाहिए. उन्होंने इस ये काम उन्हें सौंपा एक तरह से और काम उन्होंने करके दिखाया. नक्सल फ्री इंडिया.
सवाल: मैंने सुना है प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान में उस देश की टॉप लीडरशिप में प्रधानमंत्री मोदी के साथ सेल्फी को लेकर बड़ा क्रेज रहता है और इसीलिए पीएम मोदी की Itinerary के अंदर एक सेल्फी टाइम का जिक्र होता है. आप इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?
जवाब: सच है ये इट्स अ मोमेंट ऑफ़ प्राइड फॉर एव्री इंडियन कि आपका लीडर आपका प्राइम मिनिस्टर ग्लोबल लीडर है. हैं जहां पहले मिलने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था. अमेरिका में लोग पर्ची देके प्राइम मिनिस्टर बैठे रहते थे. इंदिरा जी के टाइम में हो गया था ऐसा मान लोग सेल्फी ले रहे हैं. आईने में लिख रहे हैं कि सेल्फी टाइम 12 मिनट 10 मिनट 11 मिनट और नरेंद्र मोदी सेल्फी के हीरो हो रहे हैं. आप देखिए अद्भुत जिसे कहना चाहिए और मैंने ये भी सुना है कि विदेशों में नारे लगाने की परंपरा नहीं है. नरेंद्र मोदी जाते हजारों लोग नारे लगाते हैं. वो कौतूहल से देखते हैं वहां के प्रधानमंत्री राष्ट्रपति क्या हो रहा है ये? ये कौन सा दृश्य है ये? तो नरेंद्र मोदी तो एक ग्लोबल लीडर तो है ही. कुदरत जिसे कहना चाहिए ईश्वर शक्ति अपना चमत्कार बाकी आप बिल्कुल सच कह रहे हैं कि यह बात जो है उनका सेल्फी का भी टाइम तय हो रहा है.
सवाल: आखिर नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के रिश्तों की अबूज पहेली को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: तो ट्रंप को आप छोड़ेंगे नहीं. ठीक है आपने सवाल पूछा है तो मैं इसका दो लाइन में जवाब दूंगा आपको. वो यह है कि ट्रंप लव्स मोदी. हम ट्रंप रेस्पेक्ट्स मोदी बट व्हेन कम्स टू बिजनेस ठीक है ही इज Dubious.
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