मौत की सजा का जिक्र होते ही यह सवाल उठता है कि किसी दोषी को मौत देने का तरीका कितना दर्दनाक होता है. अलग-अलग देशों में इसके लिए अलग तरीके अपनाए जाते हैं. कुछ देशों में फांसी दी जाती है, कहीं जहरीले इंजेक्शन का इस्तेमाल होता है, जबकि कुछ जगहों पर गोली मारकर मौत की सजा दी जाती है.
जहरीले इंजेक्शन को अक्सर फांसी के मुकाबले आधुनिक और कम तकलीफ वाला तरीका माना जाता है. लेकिन भारत में सुप्रीम कोर्ट के सामने आए एक मामले में इसी सोच पर सवाल उठाए गए. कोर्ट ने कहा कि उसके सामने ऐसा कोई मजबूत वैज्ञानिक सबूत नहीं रखा गया है, जिससे यह साबित हो सके कि जहरीला इंजेक्शन फांसी से ज्यादा मानवीय तरीका है.
यह मामला ऋषि मल्होत्रा बनाम भारत संघ से जुड़ा था. याचिका में मांग की गई थी कि मौत की सजा देने के लिए फांसी की जगह जहरीले इंजेक्शन जैसे दूसरे तरीके को अपनाया जाए. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस मांग को खारिज कर दिया.
जहरीले इंजेक्शन पर क्या सवाल उठे?
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि नस में दवा देकर मौत देना फांसी के मुकाबले ज्यादा वैज्ञानिक और कम तकलीफ वाला तरीका हो सकता है. हालांकि, कोर्ट के सामने इस दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक जानकारी नहीं रखी जा सकी.
कोर्ट ने यह भी देखा कि जहरीले इंजेक्शन की प्रक्रिया में खुद कई तरह की परेशानियां सामने आ चुकी हैं. इसलिए केवल किसी तरीके को आधुनिक मान लेना काफी नहीं है. यह देखना भी जरूरी है कि वह तरीका वास्तव में कितना सुरक्षित, भरोसेमंद और कम तकलीफ वाला है.
सुप्रीम कोर्ट ने किन बातों को देखा?
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य रूप से यह बात आई कि जहरीला इंजेक्शन फांसी से ज्यादा मानवीय है, इसका कोई पक्का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है.
अमेरिका में जहरीले इंजेक्शन से मौत देने की प्रक्रिया के दौरान कई बार परेशानी सामने आई है. कुछ मामलों में मेडिकल टीम नस तक ठीक से पहुंच नहीं सकी और पूरी प्रक्रिया रोकनी पड़ी.
वहीं, याचिकाकर्ता भारत में फांसी की सजा के दौरान ऐसी असफल प्रक्रिया का कोई उदाहरण कोर्ट के सामने नहीं रख सके.
कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि 1983 में भी सुप्रीम कोर्ट मौत की सजा देने के अलग-अलग तरीकों पर विचार कर चुका है.
जहरीले इंजेक्शन में क्या होता है?
जहरीले इंजेक्शन को कई जगह मौत की सजा देने का आधुनिक तरीका माना जाता है. इसमें आम तौर पर अलग-अलग दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. इनका उद्देश्य व्यक्ति को बेहोश करना और फिर शरीर की जरूरी गतिविधियों को रोकना होता है.
लेकिन इस प्रक्रिया में भी परेशानी हो सकती है. अगर व्यक्ति पूरी तरह बेहोश नहीं हो पाया तो बाहर से शरीर शांत दिखाई देने के बावजूद उसे अंदर से तकलीफ महसूस होने की आशंका हो सकती है.
यही वजह है कि कोर्ट के सामने यह सवाल भी आया कि क्या जहरीले इंजेक्शन को हर स्थिति में फांसी से ज्यादा मानवीय कहा जा सकता है.
अमेरिका में भी सामने आईं कई परेशानियां
सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले में प्रोजेक्ट 39ए की ओर से अमेरिका में मौत की सजा से जुड़ी जानकारी रखी गई थी. इसमें बताया गया कि वहां जहरीले इंजेक्शन की प्रक्रिया कई बार उम्मीद के मुताबिक पूरी नहीं हो पाई.
एक उदाहरण थॉमस क्रीच का भी दिया गया. फरवरी 2024 में अमेरिका के इडाहो में उसे जहरीले इंजेक्शन के जरिए मौत देने की कोशिश की गई थी. लेकिन मेडिकल टीम कई बार कोशिश करने के बावजूद नस में कैथेटर लगाने में सफल नहीं हो सकी.
काफी समय तक कोशिश करने के बाद प्रक्रिया रोकनी पड़ी और क्रीच को वापस उसकी सेल में ले जाया गया. इस मामले का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया गया कि जहरीला इंजेक्शन भी हमेशा आसान या बिना परेशानी वाला तरीका नहीं है.
अमेरिका में फांसी और इंजेक्शन को लेकर क्या रिकॉर्ड है?
कोर्ट के सामने अमेरिका में हुई असफल मौत की सजाओं से जुड़े आंकड़े भी रखे गए. बताया गया कि 1890 से 2010 के बीच वहां करीब 9,000 फांसी दी गईं. इनमें लगभग 276 मामलों को ऐसी प्रक्रियाओं के तौर पर दर्ज किया गया, जिनमें गंभीर गड़बड़ी हुई या सजा तय तरीके से पूरी नहीं हो सकी.
अमेरिका में जहरीले इंजेक्शन को लेकर भी ऐसी परेशानियां सामने आती रही हैं. नस नहीं मिलना, दवाओं की उपलब्धता में समस्या और नए तरीके आजमाने जैसी वजहों से कई बार प्रक्रिया मुश्किल हुई है.
भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भी कोर्ट के सामने इन समस्याओं का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि अमेरिका में जहरीले इंजेक्शन के दौरान कई तरह की दिक्कतें सामने आ चुकी हैं.
क्या फांसी ज्यादा दर्दनाक है?
याचिकाकर्ता की तरफ से यह दलील दी गई थी कि फांसी शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से काफी कठिन हो सकती है. लेकिन कोर्ट ने कहा कि फांसी को जहरीले इंजेक्शन से ज्यादा दर्दनाक साबित करने के लिए भी पर्याप्त और निर्णायक वैज्ञानिक सबूत सामने नहीं रखे गए हैं.
इसलिए कोर्ट का फैसला यह नहीं था कि फांसी निश्चित रूप से कम दर्दनाक तरीका है. कोर्ट ने सिर्फ इतना कहा कि जहरीले इंजेक्शन को फांसी से बेहतर और ज्यादा मानवीय साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत मौजूद नहीं हैं.
1983 में भी सुप्रीम कोर्ट कर चुका है इन तरीकों की तुलना
मौत की सजा देने के तरीकों पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी विचार कर चुका है. 1983 में दीना बनाम भारत संघ मामले में कोर्ट ने फांसी के अलावा बिजली का झटका, जहरीली गैस, गोली मारना और जहरीले इंजेक्शन जैसे विकल्पों पर चर्चा की थी.
उस समय भी कोर्ट को ऐसा कोई स्पष्ट आधार नहीं मिला था, जिससे यह कहा जा सके कि इन तरीकों में फांसी के मुकाबले कोई बड़ा फायदा है और इसलिए फांसी की व्यवस्था को बदल दिया जाना चाहिए.
उस मामले में रॉयल कमीशन ऑन कैपिटल पनिशमेंट की रिपोर्ट का भी जिक्र हुआ था. रिपोर्ट में जहरीले इंजेक्शन को लेकर चिंता जताई गई थी. इसमें कहा गया था कि नस में दवा देना काफी सावधानी और कुशलता का काम है.
यानी मौत की सजा देने के तरीके को लेकर बहस नई नहीं है. सुप्रीम कोर्ट पहले भी अलग-अलग विकल्पों पर विचार कर चुका है. मौजूदा मामले में भी कोर्ट ने उपलब्ध सबूतों को देखते हुए फांसी की मौजूदा कानूनी व्यवस्था को बदलने से इनकार कर दिया.