पति बोला- बच्चा मेरा नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने DNA टेस्ट को दी मंजूरी, पत्नि से पूछा- अगर आप वफादार तो...

किसी बच्चे का जैविक पिता कौन है, यह पता लगाने के लिए डीएनए टेस्ट कराया जाता है. आम तौर पर शादी के बाद जन्मे बच्चे को पति का ही बच्चा माना जाता है, लेकिन वैवाहिक विवाद में कभी-कभी पति बच्चे के पिता होने से इनकार कर देते हैं.

Husband claimed The child is not mine Supreme Court approved a DNA test
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

नई दिल्ली: किसी बच्चे का जैविक पिता कौन है, यह पता लगाने के लिए डीएनए टेस्ट कराया जाता है. आम तौर पर शादी के बाद जन्मे बच्चे को पति का ही बच्चा माना जाता है, लेकिन वैवाहिक विवाद में कभी-कभी पति बच्चे के पिता होने से इनकार कर देते हैं. ऐसे मामलों में बच्चे का पितृत्व पता करने के लिए डीएनए टेस्ट अहम सबूत बन सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ऐसे ही एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है.

मामले में पति ने पत्नी के चरित्र पर सवाल उठाते हुए तलाक की मांग की थी. उसका दावा था कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे वैवाहिक विवाद में जरूरत पड़ने पर बच्चे का डीएनए टेस्ट कराया जा सकता है.

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने महिला की याचिका खारिज कर दी. महिला ने बच्चे के डीएनए टेस्ट का विरोध किया था. उसका कहना था कि किसी व्यक्ति को जबरन डीएनए टेस्ट कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और उसके पति की तलाक याचिका का फैसला बिना डीएनए जांच के किया जाना चाहिए.

‘अगर आप वफादार हैं तो टेस्ट से ऐतराज क्यों?’

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महिला से पूछा कि अगर वह वफादार है तो फिर डीएनए टेस्ट पर आपत्ति क्यों है. कोर्ट ने पुणे की फैमिली कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट के उन आदेशों को बरकरार रखा, जिनमें तलाक की कार्यवाही के दौरान बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने का निर्देश दिया गया था.

पति ने अदालत में कहा था कि पत्नी के चरित्र को लेकर लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट जरूरी है.

पति ने पहले ही कराया था डीएनए टेस्ट

इस मामले में पति ने पहले निजी तौर पर बच्चे का डीएनए टेस्ट कराया था. रिपोर्ट में दावा किया गया कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है. इसके बाद पति ने इसी रिपोर्ट के आधार पर तलाक की याचिका दायर की और अदालत से आधिकारिक डीएनए टेस्ट कराने की मांग की.

हाईकोर्ट ने क्या कहा था?

बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी पति की ओर से पेश की गई डीएनए रिपोर्ट का जिक्र किया था. यह टेस्ट हैदराबाद की एक लैब में कराया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक बच्चे का जैविक पिता होने की पति की संभावना शून्य बताई गई थी.

हाईकोर्ट ने माना था कि यह रिपोर्ट पहली नजर में पति के दावे का समर्थन करती है. ऐसे में बच्चे के पितृत्व की सच्चाई पता करने के लिए अदालत डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दे सकती है.

डीएनए टेस्ट क्यों जरूरी माना गया?

हाईकोर्ट के मुताबिक, पति की तलाक याचिका का मुख्य आधार पत्नी के चरित्र को लेकर लगाए गए आरोप हैं. ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि पति बच्चे का जैविक पिता है या नहीं.

अदालत ने माना कि इस मामले में डीएनए रिपोर्ट महत्वपूर्ण सबूत हो सकती है. इसके अलावा ऐसा कोई दूसरा निर्णायक सबूत मिलना मुश्किल हो सकता है, जिससे बच्चे के पितृत्व की सही जानकारी सामने आए.

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की दलील को सही मानते हुए उसके आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया. इस तरह बच्चे के पितृत्व की जांच के लिए डीएनए टेस्ट कराने का रास्ता साफ हो गया.

कोर्ट ने माना कि इस मामले की परिस्थितियों में डीएनए जांच जरूरी है, क्योंकि इससे पति की ओर से लगाए गए आरोपों की सच्चाई सामने लाने में मदद मिल सकती है.

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