धर्म परिवर्तन करते ही खत्म हो जाएगा अनुसूचित जाति का दर्जा, सुप्रीम कोर्ट ने रिव्यू याचिका की खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (एससी) दर्जे से जुड़े अपने पुराने फैसले को बदलने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने उस पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें धर्म परिवर्तन के बाद एससी दर्जा खत्म होने वाले फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की गई थी.

Scheduled Caste status will be lost upon conversion Supreme Court
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (एससी) दर्जे से जुड़े अपने पुराने फैसले को बदलने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने उस पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें धर्म परिवर्तन के बाद एससी दर्जा खत्म होने वाले फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 24 मार्च 2026 को दिए गए फैसले में कोई ऐसी स्पष्ट गलती नहीं है, जिसके आधार पर उसे बदला जाए.

क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपना लेता है, तो धर्म परिवर्तन के साथ ही उसका अनुसूचित जाति का दर्जा खत्म हो जाता है.

कोर्ट ने साफ किया था कि जन्म से किसी व्यक्ति का संबंध अनुसूचित जाति से हो सकता है, लेकिन धर्म बदलने के बाद वह संविधान के तहत मिलने वाले एससी आरक्षण और सुविधाओं का दावा नहीं कर सकता.

रिव्यू याचिका क्यों हुई खारिज?

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 15 जुलाई को इस मामले में आदेश जारी किया.

पीठ ने कहा कि फैसले की समीक्षा के लिए रिकॉर्ड में कोई बड़ी या स्पष्ट गलती नहीं मिली है. इसलिए पुनर्विचार याचिका को खारिज किया जाता है.

कोर्ट ने याचिका पर अलग से मौखिक सुनवाई की मांग को भी स्वीकार नहीं किया.

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को रखा था बरकरार

यह मामला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले से जुड़ा था. हाईकोर्ट ने कहा था कि अनुसूचित जाति से संबंधित कोई व्यक्ति यदि ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह तुरंत अपना एससी दर्जा खो देता है.

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही माना और कहा कि संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के नियमों के अनुसार धर्म परिवर्तन के बाद एससी दर्जा जारी नहीं रह सकता.

संविधान के नियमों का दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के तहत अनुसूचित जाति का लाभ केवल उन्हीं लोगों को मिल सकता है जो तय धर्मों के अंतर्गत आते हैं.

कोर्ट ने कहा कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने पर अनुसूचित जाति की पहचान समाप्त हो जाती है.

धर्म और जातीय पहचान पर कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की जातीय पहचान केवल जन्म से नहीं बल्कि सामाजिक और धार्मिक पहचान से भी जुड़ी होती है.

यदि कोई व्यक्ति अपनी पुरानी जातीय परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक पहचान को छोड़कर नए धर्म की परंपराओं को पूरी तरह अपना लेता है, तो यह माना जा सकता है कि उसकी पुरानी पहचान समाप्त हो गई है.

फैसले का क्या असर होगा?

इस फैसले का असर उन लोगों पर पड़ेगा जो अनुसूचित जाति से जुड़े होने के बावजूद हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति के दर्जे और उससे मिलने वाले संवैधानिक लाभों का दावा नहीं किया जा सकता.

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