अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच डूरंड रेखा पर एक बार फिर हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं. हाल ही में हुई सैन्य झड़पों में दर्जनों सैनिकों की मौत और एक टैंक के जब्त होने की खबरों ने इस सीमा विवाद को और गहरा बना दिया है. लेकिन इस बार मामला केवल इन दोनों देशों तक सीमित नहीं है, सऊदी अरब की भूमिका भी चर्चा में आ गई है.
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सितंबर 2025 में एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौता हुआ था, जिसे "संयुक्त सुरक्षा संधि" का नाम दिया गया. इस समझौते के तहत, यदि किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दूसरे पर हमला माना जाएगा, और दोनों मिलकर जवाबी कार्रवाई करने को बाध्य होंगे. अब जब अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच संघर्ष छिड़ चुका है, तो इस समझौते की पहली अग्नि परीक्षा शुरू हो गई है.
क्या पाकिस्तान के बचाव में आएगा सऊदी?
झड़पों के दौरान अफगान बलों द्वारा पाकिस्तानी सैन्य चौकियों पर हमला किया गया, जिसका जवाब पाकिस्तान ने तोप, टैंक और हवाई हमलों के जरिए दिया. दोनों ओर से भारी हथियारों का इस्तेमाल हुआ और सीमा पर दर्जनों सैनिक हताहत हुए.
तालिबान ने इसके बाद अस्थायी संघर्षविराम की घोषणा की, लेकिन हालात अभी भी तनावपूर्ण बने हुए हैं. इस पूरे घटनाक्रम ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सऊदी अरब इस झगड़े को पाकिस्तान पर हमला मानकर सक्रिय हस्तक्षेप करेगा?
सऊदी अरब का संतुलित रुख
अभी तक सऊदी अरब ने बहुत सावधानीपूर्वक और संतुलित प्रतिक्रिया दी है. उसके विदेश मंत्रालय की ओर से बयान जारी हुआ जिसमें कहा गया, "हम पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हैं. दोनों पक्षों को संयम बरतना चाहिए और बातचीत के माध्यम से विवाद का समाधान निकालना चाहिए. क्षेत्र की स्थिरता और सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है."
यह बयान स्पष्ट रूप से किसी पक्ष का समर्थन नहीं करता, बल्कि मध्यस्थ की भूमिका में खड़े रहने की रणनीति को दर्शाता है.
क्यों है सऊदी अरब दुविधा में?
सऊदी अरब की यह चुप्पी और कूटनीतिक तटस्थता समझने योग्य है. उसके पाकिस्तान से लंबे समय से सैन्य और रणनीतिक संबंध हैं. दोनों देशों के बीच सुरक्षा, खुफिया और सैन्य क्षेत्र में गहरे सहयोग हैं. इसके अलावा, पाकिस्तान सऊदी अरब में काम करने वाले लाखों मजदूरों का देश है, जिनसे उसे बड़ी मात्रा में रेमिटेंस भी प्राप्त होता है.
दूसरी ओर, सऊदी अरब का अफगानिस्तान, विशेष रूप से तालिबान के साथ भी रणनीतिक संबंध हैं. 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद, सऊदी अरब ने कूटनीतिक संबंधों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया और मानवीय सहायता व आर्थिक समर्थन के माध्यम से वहां अपनी उपस्थिति बनाए रखी.
इस द्विपक्षीय संतुलन को बिगाड़ने से सऊदी अरब को मध्य एशिया में अपने आर्थिक और धार्मिक प्रभाव को खतरा हो सकता है.
सऊदी-पाक रक्षा समझौते की पृष्ठभूमि
सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच जो रक्षा समझौता हुआ, वह औपचारिक रूप से एक "म्यूचुअल डिफेंस पैक्ट" है. इस समझौते की घोषणा करते हुए सऊदी रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान ने कहा था, "सऊदी अरब और पाकिस्तान किसी भी हमले का मिलकर सामना करेंगे. हमारी सुरक्षा साझेदारी समय की कसौटी पर खरी उतरेगी."
इस वक्तव्य का आशय यही था कि किसी भी बाहरी आक्रमण की स्थिति में दोनों देश एक-दूसरे के साथ खड़े होंगे. लेकिन मौजूदा हालात में जब पाकिस्तान पर हमला हुआ है और वह भी अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम बहुल पड़ोसी देश से, तो सऊदी अरब के लिए यह तय करना मुश्किल हो गया है कि कैसे प्रतिक्रिया दी जाए.
यह हमला सऊदी के लिए 'हमला' माना जाएगा?
इस सवाल का जवाब इतना सीधा नहीं है.
यदि सऊदी अरब इसे रक्षा समझौते के दायरे में मानता है, तो उसे पाकिस्तान की सैन्य मदद करनी होगी, जो कि अफगानिस्तान के साथ उसके संबंधों को नुकसान पहुंचा सकती है.
क्षेत्रीय असर और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं
भारत और चीन जैसे बड़े क्षेत्रीय खिलाड़ी भी अफगान-पाक तनाव को अपनी रणनीति के हिसाब से देखने लगे हैं. भारत अफगानिस्तान में स्थायित्व का पक्षधर है, जबकि चीन ने पाकिस्तान में भारी निवेश कर रखा है.
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