केरल हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी महिला या नाबालिग के निजी अंग पर वाइब्रेटिंग उपकरण या किसी अन्य वस्तु का इस्तेमाल करना केवल यौन उत्पीड़न नहीं माना जाएगा. ऐसी हरकत कानून के तहत रेप और गंभीर यौन हमले की श्रेणी में आ सकती है.
अदालत ने यह फैसला एक आरोपी की सजा के खिलाफ दायर याचिका खारिज करते हुए सुनाया.
10 साल की सजा को रखा बरकरार
मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को एक 17 वर्षीय नाबालिग से जुड़े यौन अपराध का दोषी मानते हुए 10 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी.
हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सही था और सजा में किसी तरह की राहत देने का कोई आधार नहीं बनता.
क्या था पूरा मामला?
यह मामला साल 2019 का है. पीड़िता पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी और प्रशिक्षण की तलाश में थी. इसी दौरान उसे प्रशिक्षण और नौकरी दिलाने का भरोसा देकर एक जगह बुलाया गया.
जांच के दौरान आरोप लगा कि वहां एक व्यक्ति ने पीड़िता के साथ जबरदस्ती की और उसकी इच्छा के खिलाफ एक वाइब्रेटिंग उपकरण का इस्तेमाल किया. पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि उसे चुप रहने के लिए धमकी दी गई थी.
कोर्ट ने कानून की स्पष्ट व्याख्या की
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी उपकरण का निजी अंग पर इस तरह इस्तेमाल करना कानून में तय गंभीर यौन अपराध की परिभाषा के दायरे में आता है.
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पोक्सो कानून और भारतीय दंड संहिता के संबंधित प्रावधान लागू होंगे.
सजा में राहत देने से किया इनकार
कोर्ट ने कहा कि इस तरह के अपराध के लिए कानून में न्यूनतम 10 साल की सजा तय है. इसलिए आरोपी की सजा कम करने का कोई कानूनी आधार नहीं है.
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी.
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