Nepal Flash Flood: हिंदू कुश हिमालय (HKH) सिर्फ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों का इलाका नहीं है. इसे एशिया का ‘वाटर टावर’ भी कहा जाता है, क्योंकि यहां से निकलने वाली नदियां एशिया के करोड़ों-अरबों लोगों की पानी की जरूरत पूरी करती हैं. लेकिन अब यह पूरा इलाका जलवायु परिवर्तन के बड़े खतरे से जूझ रहा है.
काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की हालिया रिपोर्टों ने ग्लेशियरों को लेकर चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 के बाद से हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार करीब दोगुनी हो गई है. वहीं, 1975 के मुकाबले कुछ जगहों पर बर्फ की मोटाई में करीब 27 मीटर तक की कमी दर्ज की गई है.
इसका असर भारत, नेपाल, भूटान और चीन समेत कई देशों पर पड़ सकता है. इन ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियों पर करीब दो अरब लोगों का जीवन, खेती और पानी की जरूरत काफी हद तक निर्भर है.
4,000 मीटर की ऊंचाई पर बर्फ की जगह बारिश
नेपाल में हाल ही में आई अचानक बाढ़ ने भी हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते खतरे को सामने ला दिया. इस बाढ़ में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई. वैज्ञानिक अभी भी इसके सही कारणों की जांच कर रहे हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस घटना के पीछे कई वजहें हो सकती हैं. इनमें सबसे चिंता की बात यह है कि 4,000 मीटर या उससे ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में अब कई बार बर्फ की जगह बारिश हो रही है.
देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, बढ़ता तापमान इसकी एक बड़ी वजह हो सकता है. तापमान बढ़ने से उन इलाकों में भी बारिश होने लगी है जहां पहले बर्फबारी होती थी. इसका सीधा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है और वे तेजी से छोटे हो रहे हैं.
लगातार कम हो रहा ग्लेशियरों का आकार
ICIMOD की रिपोर्ट के अनुसार, 1990 से 2020 के बीच हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों ने अपने कुल क्षेत्रफल का करीब 12 प्रतिशत हिस्सा खो दिया. इस दौरान ग्लेशियरों में जमा बर्फ की मात्रा में भी लगभग 9 प्रतिशत की कमी आई.
ICIMOD की ‘HKH Glacier Outlook 2026’ रिपोर्ट में 38 ग्लेशियरों से मिले आंकड़ों का अध्ययन किया गया. इसमें सामने आया कि साल 2000 के बाद ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार काफी तेज हुई है. वैज्ञानिकों के लिए यह गंभीर संकेत है. अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो हिमालय के कुछ हिस्सों में ग्लेशियरों को ऐसा नुकसान हो सकता है, जिसकी भरपाई करना बेहद मुश्किल होगा.
हालांकि, एक बड़ी समस्या यह भी है कि हिमालय के सभी ग्लेशियरों पर पर्याप्त निगरानी नहीं हो रही है. निगरानी में शामिल 38 ग्लेशियरों में से सिर्फ सात ही विश्व स्तर के तय मानकों के मुताबिक पर्याप्त डेटा देते हैं. काराकोरम, सिक्किम, जांस्कर और भूटान जैसे कई इलाकों में भी बड़े ग्लेशियर हैं, लेकिन इनकी लगातार और पर्याप्त निगरानी अभी चुनौती बनी हुई है.
क्या ग्लेशियरों से खिसका बर्फ और मलबा बना बाढ़ की वजह?
नेपाल में आई हालिया बाढ़ को लेकर वैज्ञानिक यह भी जांच कर रहे हैं कि कहीं ऊंचाई वाले इलाके से बर्फ, चट्टान और मलबा खिसकने की वजह से तो यह घटना नहीं हुई. आशंका है कि बड़ी मात्रा में बर्फ और चट्टानों का मलबा लेंडे खोला नाम की सहायक नदी में गिरा. इससे अचानक पानी, मिट्टी और पत्थरों का तेज बहाव नीचे की तरफ आ गया होगा.
ICIMOD के वरिष्ठ क्रायोस्फीयर विशेषज्ञ और IIT इंदौर के एसोसिएट प्रोफेसर मोहम्मद फारूक आजम के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ का क्षेत्र कम हो रहा है और ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं. इससे कई जगहों पर चट्टानी और खुली जमीन सामने आ रही है.
खुली जमीन ज्यादा गर्मी सोखती है. इससे पहाड़ों की ढलान कमजोर हो सकती है और उनके खिसकने का खतरा बढ़ सकता है. हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह भी साफ किया है कि नेपाल में आई बाढ़ की सटीक वजह अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है. लेकिन ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और पर्माफ्रॉस्ट का कमजोर होना चिंता बढ़ाने वाले संकेत हैं.
अरबों लोगों के पानी पर बढ़ता संकट
हिंदू कुश हिमालय में ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर दुनिया की सबसे बड़ी बर्फीली संपदा मौजूद है. ICIMOD के मुताबिक, 55,000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर हैं. इन्हीं ग्लेशियरों से एशिया की 10 बड़ी नदी प्रणालियों को पानी मिलता है. इन नदियों पर अरबों लोगों की खेती, पीने का पानी, बिजली और रोजी-रोटी निर्भर है.
ICIMOD की रिपोर्ट के मुताबिक, 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई के बीच मौजूद ग्लेशियरों का करीब 78 प्रतिशत हिस्सा बढ़ते तापमान के प्रति बेहद संवेदनशील है. इसका मतलब साफ है कि हिमालय में बढ़ता तापमान सिर्फ बर्फ को नहीं पिघला रहा, बल्कि आने वाले समय में पानी की उपलब्धता, खेती और करोड़ों लोगों की जिंदगी को भी प्रभावित कर सकता है. इसलिए ग्लेशियरों की निगरानी बढ़ाना और जलवायु परिवर्तन के असर को कम करना अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है.
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