राफेल जेट बनेगा और खतरनाक! ब्रह्मोस-NG मिसाइल से बढ़ेगी मारक क्षमता, जानें क्या आ रही है अड़चन

राफेल लड़ाकू विमान की ताकत से दुनिया परिचित है. भारत पहले ही फ्रांस से 36 राफेल विमान खरीद चुका है और अब 114 और राफेल लेने की तैयारी चल रही है.

Rafale jets set to become lethal BrahMos-NG missile to boost strike capability
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

Rafale Fighter Jet: राफेल लड़ाकू विमान की ताकत से दुनिया परिचित है. भारत पहले ही फ्रांस से 36 राफेल विमान खरीद चुका है और अब 114 और राफेल लेने की तैयारी चल रही है. करीब सवा तीन लाख करोड़ रुपये की इस संभावित डील को भारत की वायुसेना के लिए बड़ा कदम माना जा रहा है. 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भी राफेल की क्षमता देखने को मिली थी.

अब राफेल में स्वदेशी ब्रह्मोस मिसाइल लगाने की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है. फिलहाल राफेल पर ब्रह्मोस लगाने के लिए जरूरी तकनीकी मंजूरी और सहयोग का मुद्दा है. भारत और फ्रांस के बीच इस पर बातचीत जारी है. दूसरी तरफ भारत ब्रह्मोस का हल्का और छोटा वर्जन ब्रह्मोस-NG तैयार कर रहा है. इसका आकार कम होने के कारण इसे अलग-अलग लड़ाकू विमानों पर लगाना आसान हो सकता है. अगर इसे राफेल के साथ सफलतापूर्वक जोड़ा जाता है तो विमान की लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता काफी बढ़ सकती है.

ब्रह्मोस-NG कितनी खास है?

ब्रह्मोस-NG को मौजूदा ब्रह्मोस का हल्का व छोटा रूप माना जा रहा है. इसका वजन करीब 1.33 टन, लंबाई लगभग 6 मीटर और मारक क्षमता करीब 290 से 300 किलोमीटर बताई जाती है. इसकी रफ्तार मैक 2.8 से ज्यादा हो सकती है.

कम वजन और छोटे आकार के कारण इसे लड़ाकू विमानों पर लगाने की संभावना बढ़ जाती है. हालांकि, किसी विदेशी लड़ाकू विमान में नई मिसाइल जोड़ना आसान काम नहीं है. सिर्फ मिसाइल को विमान के बाहरी हिस्से पर फिट कर देना काफी नहीं होता. विमान के कंप्यूटर, हथियार और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को भी आपस में सही तरीके से काम करना होता है.

राफेल और मिसाइल के बीच सही तालमेल जरूरी

राफेल का मिशन कंप्यूटर हथियार के साथ लगातार जानकारी का आदान-प्रदान करता है. इसके लिए विमान और मिसाइल के बीच एक खास डिजिटल व्यवस्था की जरूरत होती है. इसे इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट यानी आईसीडी से तय किया जाता है.

इसमें यह जानकारी होती है कि विमान और मिसाइल के बीच बिजली, लक्ष्य की जानकारी, मिसाइल की स्थिति और उसे छोड़ने से जुड़ी कमांड किस तरह भेजी जाएंगी. अगर यह जानकारी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हो तो राफेल के सिस्टम के साथ ब्रह्मोस-NG को जोड़ना मुश्किल हो सकता है.

इसके अलावा आधुनिक लड़ाकू विमानों में कई सुरक्षा व्यवस्थाएं सॉफ्टवेयर के जरिए काम करती हैं. ये यह तय करती हैं कि हथियार किन परिस्थितियों में सक्रिय होगा और कब उसे छोड़ा जा सकता है. इसलिए केवल मिसाइल को विमान से जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा.

डसॉल्ट का सहयोग सबसे अहम

राफेल बनाने वाली कंपनी डसॉल्ट एविएशन का सहयोग इस पूरे काम में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. तकनीकी जानकारी और जरूरी इंटरफेस मिलने से ब्रह्मोस-NG को राफेल के साथ जोड़ने की प्रक्रिया ज्यादा आसान हो सकती है.

हालांकि, इस मामले में कुछ तकनीकी और सुरक्षा से जुड़े सवाल भी हैं. ब्रह्मोस के विकास में रूसी तकनीकी भागीदारी रही है. ऐसे में फ्रांस की तरफ से अपने संवेदनशील सॉफ्टवेयर और तकनीक की सुरक्षा को लेकर चिंता हो सकती है. यही इस पूरे मामले की बड़ी अड़चनों में से एक मानी जा रही है.

डसॉल्ट का पूरा सहयोग न मिला तो दूसरा रास्ता

अगर डसॉल्ट की तरफ से पूरी तकनीकी मदद या आईसीडी की जानकारी नहीं मिलती है तो भारत दूसरे विकल्पों पर काम कर सकता है. इनमें एक तरीका अलग वेपन मैनेजमेंट यूनिट लगाने का हो सकता है. यह एक अलग सिस्टम होगा, जो विमान और मिसाइल के बीच जरूरी जानकारी पहुंचाने का काम कर सकता है.

इससे राफेल के मूल सॉफ्टवेयर में बड़े बदलाव करने की जरूरत कम हो सकती है. पायलट को मिसाइल से जुड़ी जरूरी जानकारी अलग स्क्रीन या विशेष सिस्टम के जरिए दी जा सकती है.

इसके अलावा हार्डवेयर-इन-द-लूप परीक्षण की मदद से जमीन पर विमान और मिसाइल के बीच होने वाले पूरे संवाद की जांच की जा सकती है. हालांकि, यह भी आसान प्रक्रिया नहीं होगी. आधुनिक लड़ाकू विमानों में सुरक्षित डिजिटल सिस्टम, एन्क्रिप्शन और दूसरी सुरक्षा व्यवस्थाएं होती हैं. इसलिए सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक संकेतों को समझ लेना काफी नहीं होगा.

असली चुनौती होगी उड़ान परीक्षण

तकनीकी व्यवस्था तैयार होने के बाद भी ब्रह्मोस-NG को राफेल पर इस्तेमाल करने से पहले कई चरणों में परीक्षण करना होगा. इसमें विमान पर पड़ने वाले वजन और दबाव, उड़ान के दौरान मिसाइल का असर, मिसाइल के सुरक्षित तरीके से विमान से अलग होने और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के सही काम करने जैसी चीजों की जांच होगी.

इसके बाद वास्तविक परिस्थितियों में मिसाइल के परीक्षण भी करने होंगे. अलग-अलग ऊंचाई, रफ्तार और उड़ान की स्थिति में विमान और मिसाइल के सुरक्षित काम करने की पुष्टि करना जरूरी होगा.

भारत के लिए क्यों अहम है यह कदम?

भारत पिछले कुछ वर्षों में अपने स्वदेशी हथियारों को अलग-अलग प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ने में तेजी से आगे बढ़ा है. अस्त्र और रुद्रम जैसी मिसाइलों को भारतीय विमानों के साथ जोड़ा जा चुका है. लेकिन किसी विदेशी लड़ाकू विमान में भारतीय हथियार लगाना ज्यादा जटिल काम होता है.

इसी वजह से विशेषज्ञों के अनुसार डसॉल्ट एविएशन से जरूरी तकनीकी सहयोग हासिल करना सबसे आसान और कम जोखिम वाला रास्ता हो सकता है. अगर ब्रह्मोस-NG को राफेल के साथ सफलतापूर्वक जोड़ा जाता है तो भारतीय वायुसेना के पास एक ऐसा लड़ाकू संयोजन होगा, जो लंबी दूरी से हमला करने की उसकी क्षमता को काफी मजबूत कर सकता है.