नई दिल्ली: नेपाल और सिक्किम में ग्लेशियल झील फटने से हुई तबाही के बाद हिमालय में ऐसी झीलों का खतरा एक बार फिर चर्चा में है. केंद्र सरकार अब हिमालयी क्षेत्र की 188 बेहद संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी कर रही है. इसका मकसद झील फटने से पहले खतरे का पता लगाकर लोगों को समय पर अलर्ट करना है.
28 हजार झीलों में 188 ज्यादा संवेदनशील
कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में करीब 28,043 ग्लेशियल झीलें हैं. इनमें 188 को ज्यादा जोखिम वाली माना गया है. इनसे करीब 3 करोड़ लोगों पर खतरा हो सकता है. सबसे ज्यादा 129 संवेदनशील झीलें सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में हैं. इसके अलावा लद्दाख-कश्मीर में 26, हिमाचल में 20 और उत्तराखंड में 13 झीलें जोखिम वाली हैं.
ग्लेशियर तेजी से पिघलने के कारण इन झीलों में पानी बढ़ रहा है. अगर झील को रोकने वाली बर्फ, चट्टान या मलबे की दीवार टूट जाए तो लाखों घन मीटर पानी अचानक नीचे आ सकता है. इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ कहा जाता है.
सिक्किम और नेपाल में हो चुकी है तबाही
अक्टूबर 2023 में सिक्किम की साउथ ल्होनक झील फटने से तीस्ता घाटी में भारी तबाही हुई थी. इसमें 55 लोगों की मौत हुई और 70 लोग लापता हुए थे. सड़क, पुल और बिजली परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचा था.
अगस्त 2024 में नेपाल के थामे गांव में भी ग्लेशियल झील फटने से बाढ़ आई थी. इस घटना में 25 घर तबाह हुए और 135 लोग विस्थापित हुए. इन घटनाओं से साफ है कि पहाड़ों में शुरू हुई ऐसी बाढ़ नदी के रास्ते काफी दूर तक तबाही मचा सकती है.
कैसे काम करेगा अलर्ट सिस्टम?
अर्ली वॉर्निंग सिस्टम झील के पानी का स्तर, आकार, आसपास के ग्लेशियर और चट्टानों में बदलाव पर नजर रखेगा. सैटेलाइट, सेंसर और दूसरी तकनीकों से खतरे के संकेत मिलते ही प्रशासन और स्थानीय लोगों को अलर्ट भेजा जा सकेगा.
हालांकि सिर्फ चेतावनी काफी नहीं होगी. लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए रास्ते, शेल्टर, सायरन और स्थानीय बचाव दल भी तैयार रखने होंगे. जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से यह खतरा आगे और बढ़ सकता है.
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