भारत की UNSC सीट पर अटका पेच, ताजिकिस्तान के पास 57 मुस्लिम देशों का समर्थन, कैसे निकलेगा रास्ता?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मध्य एशिया यात्रा को लेकर कूटनीतिक हलकों में काफी चर्चा है. इस दौरे का एक अहम मकसद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में भारत की दावेदारी को मजबूत करना भी माना जा रहा है.

Hitch in India's UNSC bid Tajikistan has the backing of 57 Muslim nations
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मध्य एशिया यात्रा को लेकर कूटनीतिक हलकों में काफी चर्चा है. इस दौरे का एक अहम मकसद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में भारत की दावेदारी को मजबूत करना भी माना जा रहा है. भारत 2028-2029 के लिए सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता चाहता है, लेकिन उसकी राह में ताजिकिस्तान अड़चन बन सकता है. दोनों देश एशिया की एक सीट के लिए चुनाव मैदान में हैं और ताजिकिस्तान को इस्लामिक सहयोग संगठन यानी OIC का समर्थन भी मिल चुका है.

भारत के लिए यह चुनाव इसलिए भी अहम है क्योंकि हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र में हुए चुनावों के नतीजों ने कई बार बड़े देशों को चौंकाया है. मजबूत दावेदारी के बावजूद जर्मनी जैसे देशों को हार का सामना करना पड़ा है. ऐसे में भारत सीधे मुकाबले में जाने के बजाय पहले ताजिकिस्तान के साथ सहमति बनाने की कोशिश कर सकता है.

जून 2027 में होगा फैसला

2028-2029 के लिए UNSC की अस्थायी सदस्यता का चुनाव जून 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में होगा. इस चुनाव में जीतने के लिए किसी उम्मीदवार को मतदान करने वाले देशों के दो-तिहाई वोट हासिल करने होते हैं.

संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्य देश हैं. अगर सभी देश मतदान करते हैं तो जीत के लिए 129 वोटों की जरूरत होगी. ताजिकिस्तान के पक्ष में OIC के 57 देशों का समर्थन पहले से मौजूद है. यह उसके लिए काफी बड़ा आधार है.

दूसरी तरफ भारत को अमेरिका, ऑस्ट्रिया, फिजी और श्रीलंका जैसे देशों का शुरुआती समर्थन मिलने की बात सामने आई है. गुप्त मतदान होने की वजह से भारत को कुछ खाड़ी देशों का समर्थन भी मिल सकता है. अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों के साथ भारत के मजबूत रिश्ते हैं, जिससे उसे फायदा मिलने की उम्मीद है.

भारत के लिए मुकाबला आसान नहीं

भारत को 2021-2022 के UNSC चुनाव में 184 वोट मिले थे. उस समय भारत ने बड़ी जीत दर्ज की थी. लेकिन इस बार मुकाबला उतना आसान नहीं माना जा रहा है. हाल के चुनावों में कई ऐसे नतीजे आए हैं, जिनसे पता चलता है कि संयुक्त राष्ट्र में अंतिम समय तक तस्वीर बदल सकती है.

इस साल जर्मनी को पुर्तगाल और ऑस्ट्रिया के हाथों हार मिली, जबकि फिलीपींस को किर्गिज गणराज्य ने पीछे छोड़ दिया. संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष पद के चुनाव में भी बांग्लादेश के उम्मीदवार खलीलुर रहमान ने साइप्रस के उम्मीदवार को हरा दिया था.

इन घटनाओं ने भारत के लिए भी सावधानी बढ़ा दी है. यही वजह है कि नई दिल्ली सीधे चुनावी मुकाबले से पहले ताजिकिस्तान के साथ समझौते की संभावना तलाश सकती है.

मोदी के दौरे में उठ सकता है मुद्दा

प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान और किर्गिज गणराज्य की यात्रा को इसी नजर से भी देखा जा रहा है. दौरे के दौरान BRICS, UNSC की सदस्यता और भारत-मध्य एशिया संबंधों से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा हो सकती है.

भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन भी 2022 के बाद से नहीं हुआ है. ऐसे में भारत इस क्षेत्र के साथ अपनी सक्रियता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक चुनौती यह भी होगी कि मध्य एशियाई देशों के बीच भारत की पुरानी सक्रिय भूमिका को फिर मजबूत किया जाए.

ताजिकिस्तान से समझौता सबसे आसान रास्ता?

अगर भारत ताजिकिस्तान को इस चुनाव से पीछे हटने के लिए तैयार कर लेता है तो मुकाबला काफी आसान हो सकता है. इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमाली रहमान से बातचीत कर सकते हैं.

भारत पहले भी इस तरह की कूटनीतिक रणनीति अपना चुका है. 2009 में नई दिल्ली ने कजाकिस्तान को 2011-2012 के UNSC कार्यकाल की दौड़ से हटने के लिए राजी किया था. इसके बदले भारत ने बाद में 2017-2018 के कार्यकाल के लिए कजाकिस्तान की उम्मीदवारी का समर्थन किया था.

अब भारत के सामने भी कुछ ऐसा ही रास्ता है. अगर ताजिकिस्तान के साथ आपसी सहमति बन जाती है तो भारत को 2027 के चुनाव में मुश्किल मुकाबले से बचने का मौका मिल सकता है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी की आगामी मध्य एशिया यात्रा को UNSC की सदस्यता की तैयारी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.