1. लालकिले से लेकर ब्रिक्स तक कूटनीति की चटनी!
विश्व मंच पर नई दिल्ली का डंका.. आगामी घरेलू चुनावी बयार में सरकार को कितनी सियासी ऑक्सीजन!
नई दिल्ली में संपन्न 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त घोषणापत्र ने कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे सत्ता पक्ष की विदेश नीति की बड़ी कामयाबी मान रहे हैं कि आतंक पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का मसौदा वैश्विक नेताओं ने स्वीकार किया. अलबत्ता विपक्ष के खेमे से धीमे सुर में यह सुगबुगाहट भी उठ रही है कि बयानों की स्याही जमीनी हकीकत में कितनी बदलेगी. सचमुच जब मंच पर शी जिनपिंग और पुतिन जैसे दिग्गज मौजूद हों तो कूटनीतिक संतुलन साधना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं. अब यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि वैश्विक मंच पर मिली यह तालियां आगामी घरेलू चुनावी बयार में सरकार को कितना सियासी ऑक्सीजन दे पाएंगी!
2. तकनीकी हथियारबंदी पर प्रधानमंत्री की दो-टूक!
वैश्विक चौपाल पर आर्थिक संप्रभुता का बिगुल!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स के मंच से तकनीक और क्रिटिकल मिनरल्स के ‘वेपनाइजेशन’ पर खरी-खरी चेतावनी दी है. सत्ता पक्ष के थिंक टैंक इसे दूरदर्शी रणनीति बता रहे हैं, जो भविष्य के आर्थिक उपनिवेशवाद को रोकने के लिए जरूरी है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे चीन और पश्चिमी दबदबे के बीच भारत द्वारा ग्लोबल साउथ का नया अगुवा बनने की कवायद मान रहे हैं. अलबत्ता घरेलू विपक्ष दबी जुबान से पूछ रहा है कि सेमीकंडक्टर और दुर्लभ खनिजों के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने की रफ्तार क्या वैश्विक दावों से मेल खा रही है? सचमुच, भविष्य की सियासत अब जमीन से ज्यादा सिलिकॉन चिप्स पर लड़ी जाएगी. अब यक्ष प्रश्न यह है कि बहुपक्षीय मंचों पर दी गई यह चेतावनी व्यापारिक समीकरणों को कितना प्रभावित करेगी!
3. पुरानी फाइलों से निकला सियासी 'जिन्न'!
सियासी रसूख, खाकी और फॉरेंसिक की तिहरी घेराबंदी!
मायानगरी की एक बहुचर्चित और रहस्यमयी मौत की धूल खा रही फाइलों के पन्ने एक बार फिर फड़फड़ाने लगे हैं. देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी द्वारा दर्ज ताजा कानूनी दस्तावेज ने राजधानी से लेकर समंदर किनारे के सत्ता गलियारों तक बेचैनी बढ़ा दी है. इस बार जांच के रडार पर कोई एक शख्स नहीं, बल्कि एक रसूखदार सियासी घराने के 'चिराग' से लेकर सिल्वर स्क्रीन के चमकते चेहरे और उनके करीबी दायरे की कथित भूमिकाएं आ चुकी हैं.
राजनीतिक प्रेक्षक इस हलचल को केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि चुनावी और सियासी शतरंज की एक बेहद सधी हुई चाल के रूप में देख रहे हैं. अलबत्ता विपक्ष के खेमे में इसे बरसों पुराने मुद्दे को फिर से जिंदा कर विरोधियों को मनोवैज्ञानिक दबाव में लाने का उपक्रम माना जा रहा है.
इस पूरे कानूनी ताने-बाने में सबसे दिलचस्प मोड़ खाकी और प्रशासनिक तंत्र की मौजूदगी है. उस दौर के खाकी वर्दीधारी आला अफसर, विवादित जांच अधिकारी, पोस्टमॉर्टम की मेज पर देरी करने वाले सफेद कोट के नुमाइंदे और फॉरेंसिक लैब के जिम्मेदार तक जांच की जद में खिंचते नजर आ रहे हैं. यानी संदेश साफ है कि सुराग मिटाने और समय खींचने की कथित साजिश की हर कड़ी को एजेंसी बारीकी से जोड़ना चाहती है. सचमुच जब सत्ता, ग्लैमर, खाकी और सियासत का ऐसा कॉकटेल अदालत और जांच की चौखट पर पहुंचता है, तो गॉसिप के तवे पर रोटियां सबसे ज्यादा सिकती हैं!
4. मरुधरा के 'पायलट' को मिली पंजाब की गोपनीय 'फ्लाइट'!
झाड़ू के पुराने साथी ने खोला कागजी पिटारा: सूबे की सियासत में 'सीक्रेट फाइलों' से घेराबंदी की तैयारी!
सतलुज के किनारे से उठी सियासी गंध अब दिल्ली के ड्राइंग रूम्स में पॉपकॉर्न की तरह चटक रही है. चर्चा बड़ी दिलचस्प और धमाकेदार है कहते हैं कि राजस्थान से ताल्लुक रखने वाले एक बेहद फुर्तीले और युवा सियासी ‘पायलट’ के हाथ अब पंजाब की सत्ता के कुछ अति-गोपनीय दस्तावेज लग चुके हैं. और यह कोई हवा-हवाई उड़ती खबर नहीं, बल्कि ‘आप’ के ही एक बागी पूर्व सांसद के जरिए बंद कमरों में सौंपा गया बारूदी बंडल बताया जा रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक इस मुलाकात और कागजी लेन-देन को महज शिष्टाचार नहीं, बल्कि सूबे में सत्ताधारी दल की जड़ें हिलाने के लिए तैयार किया जा रहा एक बड़ा चक्रव्यूह मान रहे हैं. अंदरूनी सूत्रों की मानें तो इन कागजातों में प्रशासनिक फैसलों, कथित नीतियों और परदे के पीछे चले 'खेल' की पूरी जन्मपत्री दर्ज है, जिसे सही वक्त पर सियासी मिसाइल बनाकर दागने की योजना है. अलबत्ता सत्ता पक्ष के रणनीतिकार इसे विरोधियों की हताशा और अपने पुराने असंतुष्ट साथियों की खीझ करार देकर खारिज करने की मुद्रा में हैं. उनका तर्क है कि जब जमीन खिसकती है, तो फाइलों की सनसनी से ही सुर्खियां बटोरी जाती हैं. सचमुच जब घर का ही कोई पुराना भेदी लंका ढहाने के लिए कागजों की पोटली लेकर प्रतिद्वंद्वी खेमे के सबसे धारदार चेहरे के पास पहुंच जाए तो सियासी पारा चढ़ना लाजिमी है!
5. नक्शा बदलने की मेज पर सजा नया सियासी पासा!
हफ्ते-दस दिन में लोकसभा में दस्तक दे सकता है परिसीमन बिल.. 'चाणक्य' का गुप्त गणित मुकम्मल या नया चक्रव्यूह?
संसद के गलियारों में सेंट्रल विस्टा की ठंडी हवाओं के बीच अचानक पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है. कानाफूसी है कि अगले 8 से 10 दिनों के भीतर लोकसभा की मेज पर बहुप्रतीक्षित और बहुचर्चित परिसीमन बिल को पेश करने की पूरी पटकथा तैयार कर ली गई है. रायसीना हिल्स के भीतरखाने से आ रहे संकेत बता रहे हैं कि देश के सियासी भूगोल को नया आकार देने वाला यह मास्टरस्ट्रोक अब फाइलों से निकलकर सदन के पटल पर उतरने को बेताब है.
राजनीतिक प्रेक्षक इस पूरी हलचल का सीधा और सपाट अर्थ निकाल रहे हैं यानी अमित शाह ने फ्लोर पर जरूरी संख्याबल का अपना जादुई गणित पूरी तरह साध लिया है. लुटियंस का पुराना तजुर्बा गवाही देता है कि जब गृह मंत्री किसी जटिल मिशन की फाइल अपने हाथ में लेते हैं, तो उसे अंजाम तक पहुंचाकर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेज पर सौंपते हैं. धारा 370 से लेकर महिला आरक्षण तक की नजीरें सामने हैं, तो भला परिसीमन का यह ऐतिहासिक मसौदा कोई अपवाद कैसे हो सकता है?
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