Political Popcorn: पहिया-पुलिया से पोस्टर वॉर तक... सियासत में आज पूरा ड्रामा ऑन!

Political popcorn: तेलंगाना से बंगाल और दिल्ली से उत्तर प्रदेश तक सियासत में घमासान जारी है. कहीं पुलिस की कार्रवाई तो कहीं केंद्रीय एजेंसियों की छापेमारी और पोस्टर वॉर ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है.

political-popcorn-pahiya-puliya-se-poster-war-tak-siyasat-mein-drama
Political Popcorn

1.तेलंगना में 'पहिया' और 'पुलिया': पुलिस का पराक्रम या सियासी ड्रामा?

वैन में सवार नेताजी, सड़क पर तकरार !
 
​हैदराबाद के सियासी चौराहे पर आज दोपहर बड़ा गदर कटा जब बीआरएस नेता केटीआर को पुलिस ने उठाकर सीधे गाड़ी में बैठा दिया. विपक्षी खेमा इसे लोकतंत्र का दमन बता रहा है तो सत्ता पक्ष का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है. अलबत्ता धक्का-मुक्की के बीच भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से लेकर तमाम दलों के रणनीतिकार भी इस बहती गंगा में हाथ धोने आ पहुंचे. सचमुच जब कैमरे चालू हों तो नेताओं का आक्रोश और पुलिस की फुर्ती दोनों दोगुने हो जाते हैं. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि दक्षिण की राजनीति में आगामी चुनावों की रिहर्सल अभी से शुरू हो चुकी है. अब यह जनहित का संघर्ष है या सिर्फ सुर्खियां बटोरने का नुस्खा, यही जनता के सामने सबसे बड़ा प्रश्न बना हुआ है. सरकार कानून-व्यवस्था की दुहाई दे रही है और विपक्ष इसे बदले की भावना बताकर ढोल पीट रहा है. दोनों अपनी-अपनी जगह 'सच्चे' साबित होने की होड़ में हैं. कुल मिलाकर, जनता के लिए यह मुफ़्त का ड्रामा-शो साबित हुआ !

2.पश्चिम बंगाल में छापेमारी और सियासी तपिश !

आखिर फाइलों में छिपा क्या है?

​कोलकाता के सियासी गलियारों में आज सुबह-सुबह केंद्रीय जांच एजेंसियों की हलचल ने चाय की चुस्कियों को और कड़वा कर दिया. टीएमसी सांसद से जुड़े ठिकानों पर हुई कार्रवाई के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया. अलबत्ता जांच एजेंसियों का दावा हमेशा की तरह पुख्ता सबूतों का है, जबकि विपक्ष इसे सीधे तौर पर 'प्रतिशोध की राजनीति' करार दे रहा है. सचमुच बंगाल की सियासत में जब तक केंद्रीय एजेंसियों की एंट्री न हो, तब तक दिन का सियासी कोटा पूरा नहीं माना जाता. राजनीतिक प्रेक्षक इसे आगामी स्थानीय चुनावों से पहले की मनोवैज्ञानिक घेराबंदी के तौर पर देख रहे हैं. अब इस कार्रवाई से असली भ्रष्टाचार उजागर होगा या सिर्फ चुनावी भाषणों के लिए नया मसाला तैयार हो रहा है, यही यक्ष प्रश्न है. सत्तापक्ष इसे जीरो टॉलरेंस की नीति बता रहा है और विपक्ष इसे चुनावी हथकंडा !

3.दिल्ली में जर्जर ढांचे पर गिरा 'म्यूनिसिपल' का डंडा !

एक्शन या दिखावा..इमारत गिरी तो जागी हुकूमत ?
 
​सत्य निकेतन और राजधानी के अन्य इलाकों में बिल्डिंग हादसों के बाद नगर निगम ने फुर्ती दिखाते हुए पांच अधिकारियों को सस्पेंड तो कर दिया, लेकिन राजनीति की दीवारें अभी भी हिल रही हैं. अलबत्ता, जब भी कोई मलबा गिरता है तो सरकारी फाइलों में फौरन 'सख्त कार्रवाई' का मलहम लगा दिया जाता है. सचमुच यह समझ पाना मुश्किल है कि जब इमारतें बन रही होती हैं, तब ये निगरानी तंत्र किस गहरी नींद में सो रहा होता है. राजनीतिक प्रेक्षक इस कार्रवाई को केवल जनता के गुस्से को शांत करने की औपचारिक कवायद मान रहे हैं. क्या सिर्फ कुछ अफसरों को सस्पेंड कर देने से जर्जर हो चुका प्रशासनिक ढांचा रातों-रात मजबूत हो जाएगा, यही आज का यक्ष प्रश्न है. विपक्ष इसे सिस्टम की नाकामी कह रहा है, जबकि सत्ताधारी दल इसे तुरंत की गई अनुकरणीय सख्ती बताकर बचाव में जुटा है !

4.यूपी की सियासत में 'पोस्टर वॉर' !

इतिहास के पन्नों से निकलती सियासत..अतीत के जख्म या भविष्य का चुनावी कार्ड?

​उत्तर प्रदेश में सहारनपुर मस्जिद विवाद और मुजफ्फरनगर के पुराने दंगों के नाम पर लगे पोस्टरों ने एक बार फिर सियासी हलचल बढ़ा दी है. नजरबंद सांसदों का चकमा देकर पहुंचना और बयानों की आग सुलगाना अब कोई नई बात नहीं रही. अलबत्ता, प्रशासन हर बार शांति व्यवस्था का हवाला देकर हालात काबू में होने की बात दोहराता है. सचमुच पश्चिमी यूपी की उपजाऊ जमीन पर फसलों से ज्यादा सियासी नफा-नुकसान की खेती तेजी से फलती-फूलती है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि जब-जब चुनावी सुगबुगाहट तेज होती है, तब-तब पुराने मुद्दे संदूक से बाहर निकाल लिए जाते हैं. क्या विकास के दावों के बीच ये भावनात्मक मुद्दे ही हमेशा निर्णायक साबित होंगे, यह आम जनता के सामने खड़ा यक्ष प्रश्न है. सरकार इसे असामाजिक तत्वों की साजिश बता रही है, तो विपक्षी दल इसे ध्रुवीकरण की सुनियोजित कोशिश !

5.हाथ के कुनबे में 'सर्जरी' की तैयारी: कुर्सियां हिल रहीं, चेहरे मुरझा रहे!

राज्यों में नए सेनापतियों की तलाश: कहीं पटरी नहीं बैठ रही, तो कहीं रिपोर्ट कार्ड में 'फेल'!

​कांग्रेस में इन दिनों फाइलों के पन्ने कुछ ज्यादा ही तेजी से फड़फड़ा रहे हैं,आलाकमान के दरबार में कई राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों और प्रभारियों के रिपोर्ट कार्ड पर लाल स्याही फिरने की पूरी तैयारी है. राजधानी दिल्ली में तो अध्यक्ष और प्रभारी दोनों की विदाई का मुहूर्त लगभग तय माना जा रहा है. मध्य प्रदेश में भी तलवार लटक गई है. अलबत्ता सबसे दिलचस्प किस्सा उत्तर प्रदेश का है, जहां प्रभारी राजेश पाल गौतम और प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के बीच की सियासी केमिस्ट्री इतनी ठंडी है कि प्रियंका गांधी वाड्रा को खुद एक्टिव होकर नाराजगी जतानी पड़ी है. उधर अल्पसंख्यक विभाग में इमरान प्रतापगढ़ी की शायरी जैसी चमक से संगठन के अपने ही नेता अब असहज दिखने लगे हैं. सचमुच जब अपनों की ही तान टूटने लगे, तो आलाकमान का डंडा चलना लाजिमी है. राजनीतिक प्रेक्षक इस मंथन को संगठन में नई जान फूंकने की आखिरी कोशिश मान रहे हैं. अब देखना यह है कि इस बड़े फेरबदल से जमीनी स्तर पर कोई करिश्मा होगा या सिर्फ नए प्यादों के सिर पुरानी शिकस्त का ठीकरा फूटेगा ?

ये भी पढ़ें- Political Popcorn: मायावती की ‘रील’ वाली राजनीति से जगन की घरवापसी तक... सियासत में मचा घमासान