Political Popcorn: मायावती की ‘रील’ वाली राजनीति से जगन की घरवापसी तक... सियासत में मचा घमासान

Political Popcorn: मायावती की नजर अब Gen-Z पर, जगन की संभावित घरवापसी की चर्चा तेज और कांग्रेस में जमीनी चेहरों को लेकर मंथन जारी.

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Political Popcorn

1.सोशल मीडिया पर नीला परचम?

हाथी की चाल में अब 'रील्स' की रफ्तार, नए वोटर्स को लुभाने की कवायद!

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने अब युवाओं की नई पीढ़ी, यानी 'जेन-जी' और 'अल्फा' के मुद्दों को पार्टी एजेंडे में शामिल करने के निर्देश दिए हैं. राजनीतिक प्रेक्षक हैरान हैं कि पारंपरिक कैडर राजनीति करने वाली बसपा अब डिजिटल जेनरेशन को रिझाने की कोशिश कर रही है. अलबत्ता मायावती ने कार्यकर्ताओं को अनुशासन में रहने और सोशल मीडिया पर भटकाव से बचने की नसीहत भी दी है. सचमुच स्मार्टफोन की स्क्रीन पर स्क्रॉल करते युवाओं को बसपा के पारंपरिक फॉर्मूले से जोड़ना आसान नहीं होगा. अब यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या सोशल मीडिया के दौर में बहुजन राजनीति अपनी खोई हुई रफ्तार वापस पा सकेगी ?

2.पड़ोसी मुल्क की कूटनीति, ब्रिक्स से पहले ढाका का दांव !

चाय पर चर्चा का न्योता तो मिला.. मेहमान की घड़ी अभी सुस्त है!

नई दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन से पहले बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान की प्रस्तावित भारत यात्रा टलने की खबरों ने सियासी गलियारे में हलचल मचा दी है. विदेश मंत्रालय ने इसे नियमित प्रक्रिया का हिस्सा बताया, जबकि ढाका ने स्पष्ट किया कि उन्हें रिश्ते साधने में कोई जल्दबाजी नहीं है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे दोनों देशों के बीच शेख हसीना के मुद्दे पर बने कूटनीतिक तनाव से जोड़कर देख रहे हैं. अलबत्ता भारत का रुख भी संतुलित है और 'परस्पर हित' की बात दोहराई गई है. सचमुच पड़ोसी से रिश्ते सुधारना दोतरफा सड़क जैसा है. प्रश्न यही है कि क्या ढाका का यह विलंब घरेलू दबाव की वजह से है या कोई नया भू-राजनीतिक समीकरण?

3.दक्षिण का दंगल..जगन की घरवापसी या नई सियासी खिचड़ी?

बहन से नहीं जमी बात, तो क्या पुराने 'घर' का दरवाजा खटखटाएंगे जगन?

दक्षिण के सियासी गलियारों से छनकर आ रही खबर ने सबको चौंका दिया है. चर्चा गर्म है कि आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी अब विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं. कांग्रेस आलाकमान के दो वरिष्ठ रणनीतिकारों ने पर्दे के पीछे मोर्चा संभाला और कहा जा रहा है कि राहुल गांधी ने भी हरी झंडी दे दी है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि वाई.एस. शर्मिला के जरिए जो उम्मीदें लगाई गई थीं, वे जमीन पर वोट बैंक में तब्दील नहीं हो सकीं, इसलिए मजबूरी में ही सही, पुराने वारिस की तरफ हाथ बढ़ाना पड़ा. अलबत्ता, बात सिर्फ गठबंधन तक सीमित नहीं है, भविष्य में वाईएसआरसीपी के कांग्रेस में विलय तक की अटकलें हैं. सचमुच सियासत में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न दुश्मन. अब यक्ष प्रश्न यही है कि क्या राजशेखर रेड्डी की पुरानी विरासत को समेटने की यह जुगत दक्षिण के किले को वाकई अभेद्य बना पाएगी?

​4. प्रियंका का चाबुक..हवा-हवाई जिलाध्यक्षों की होगी विदाई!

सिफारिशी कुर्सियों पर चली कैंची, अब 'जमीन' नापने वालों की ही लगेगी लॉटरी!

कांग्रेस संगठन के भीतर नियुक्तियों को लेकर एक बार फिर घमासान मच गया है. कई राज्यों के सांसदों और विधायकों ने आलाकमान के सामने खुला मोर्चा खोल दिया कि हाल ही में बनाए गए जिलाध्यक्ष जमीन से कटे हुए हैं और सिर्फ कागजों पर दौड़ रहे हैं. मामला बिगड़ा तो प्रियंका गांधी ने खुद मोर्चा संभाल लिया है. संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के साथ हुई मैराथन बैठक के बाद यूपी समेत तमाम राज्यों के प्रभारियों को सूची के पुनरीक्षण के कड़े निर्देश दिए गए हैं. राजनीतिक प्रेक्षक इसे संगठन को 'ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स' से बाहर निकालने की कोशिश बता रहे हैं. अलबत्ता जब भी सूचियां बदलती हैं, तो नए असंतोष का धुआं उठना तय होता है. सचमुच संगठन की नब्ज वही पहचान सकता है जो पसीने की कद्र करे. अब प्रश्न यही है कि क्या इस समीक्षा से वाकई जमीनी चेहरों को हक मिलेगा या सिर्फ नए चेहरों को पुरानी कुर्सी सौंप दी जाएगी?

5.रील्स पर फिदा, जमीन से जुदा!

'व्यूज' से नहीं बनती सरकार, हाईकमान ने चेताया..AI छोड़ो, पसीना बहाओ!

यूपी कांग्रेस के डिजिटल वॉर-रूम में इन दिनों सन्नाटा पसरा है और वजह है दिल्ली से आई तीखी फटकार. सोशल मीडिया टीम लगातार हाई-टेक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले वीडियो बनाकर लाखों व्यूज तो बटोर रही थी, लेकिन जमीन पर पार्टी का झंडा उठाने वाला कोई नहीं दिख रहा था. इस पर स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने आलाकमान के सामने शिकायत की कि "AI के चक्कर में कैडर खत्म हो रहा है." सूत्रों के मुताबिक नेतृत्व ने सख्त लहजे में कहा है कि 'AI-AI खेलना बंद करो और धूल फांकने जमीन पर उतरो.' राजनीतिक प्रेक्षक इस विवाद को तकनीकी चमक और पारंपरिक राजनीति के सीधे टकराव के रूप में देख रहे हैं. अलबत्ता डिजिटल युग में प्रचार की अपनी अहमियत है, लेकिन बूथ खाली रह जाए तो वीडियो किस काम का? सचमुच एल्गोरिदम कभी वोट नहीं डालता. अब प्रश्न यही है कि क्या डिजिटल टीम रील्स की दुनिया से बाहर आकर कार्यकर्ताओं के साथ पसीना बहाने को तैयार होगी ?

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