1.एक देश, एक चुनाव और घड़ियों का तालमेल !
जेपीसी की फाइलें दौड़ीं, क्षेत्रीय छत्रपों की धड़कनें बढ़ीं !
राजधानी के सत्ता गलियारों में 'एक देश, एक चुनाव' की सुगबुगाहट फिर तेज हो गई है. विधि आयोग और जेपीसी के पन्नों पर तारीखों का गणित कुछ यूं बैठाया जा रहा है कि पूरे देश की सुइयां एक ही समय पर टिक-टिक करें. अलबत्ता, क्षेत्रीय दलों के दफ्तरों में कैलकुलेटर की बैटरी अचानक गरम होने लगी है. सचमुच जब सारा देश एक साथ वोट डालेगा तो स्थानीय क्षत्रप राष्ट्रीय लहरों के बीच अपना जहाज कैसे तैराएंगे, यह उनके लिए सबसे बड़ा प्रश्न बन चुका है. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि केंद्र सरकार जहां बचत और व्यवस्था का तर्क दे रही है, वहीं विपक्ष का मानना है कि सब कुछ एक साथ हो जाने पर रोज-रोज का सियासी ड्रामा देखने वाली जनता को बोरियत न घेर ले !
2.अध्यक्ष की कुर्सी और 2027 का टाइमर !
कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर पार्टी में घमासान तेज !
कांग्रेस मुख्यालय पर इन दिनों 2027 के कैलेंडर के पन्ने अभी से पलटे जा रहे हैं. मल्लिकार्जुन खरगे का कार्यकाल पूरा होने में भले वक्त हो, लेकिन कुर्सी की दावेदारी को लेकर खेमों में गुणा-भाग शुरू हो चुका है. पार्टी का एक धड़ा कह रहा है कि दलित चेहरे के बाद अब कमान किसी ओबीसी नेता के हाथ में आनी चाहिए, जबकि युवा तुर्कों की रट वही पुरानी है या तो राहुल गांधी संभालें या प्रियंका गांधी. अलबत्ता, हालिया यूथ मूवमेंट के बाद गांधी परिवार को आगे लाने की मांग ने फिर जोर पकड़ा है. सचमुच यह तय करना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न बन चुका है कि कमान किसके हाथ दी जाए. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि चुनाव चाहे तीन साल दूर हों, लेकिन कांग्रेस में अध्यक्ष पद की रस्साकशी का सीजन कभी खत्म नहीं होता !
3.मायावती की 'एकला चलो रे' और गठबंधन का सस्पेंस !
मायावती ने कांग्रेस के गठबंधन के मंसूबों पर फेरा पानी !
उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश और राजस्थान तक 'हाथ' के साथ 'हाथी' की सवारी के ख्वाब देख रहे कांग्रेस रणनीतिकारों को बहनजी ने बड़ा झटका दिया है. बसपा सुप्रीमो मायावती ने साफ कर दिया है कि वे तीनों राज्यों में अकेले दम पर ताल ठोकेंगी. कांग्रेस और सपा के साथ पर्दे के पीछे चल रही बातचीत पूरी तरह बेनतीजा साबित हुई. अलबत्ता दलित वोटों की लामबंदी का जो खाका तैयार किया जा रहा था, उस पर अब पानी फिरता नजर आ रहा है. सचमुच जब-जब विपक्ष एक मंच पर आने की बात करता है, तब-तब मायावती का यह रुख नया सियासी समीकरण बना देता है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि बसपा के अकेले लड़ने से त्रिकोणीय मुकाबलों की जमीन फिर से तैयार हो गई है !
4.मालवा का चक्रव्यूह और अध्यक्ष की परीक्षा !
पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष राजा वडिंग के सामने मालवा की अग्निपरीक्षा !
पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान अब सीधे-सीधे अल्टीमेटम के दौर में पहुंच गई है. विरोधी चन्नी-रंधावा गुट ने प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के सामने मालवा का ऐसा टारगेट रख दिया है जिसे पार पाना लोहे के चने चबाने जैसा है. मालवा की 69 सीटों में से कम से कम 55 सीटें जिताने की शर्त रख दी गई है, जबकि पिछली बार पार्टी को यहां महज 5 सीटें मिली थीं. अलबत्ता आलाकमान को मजबूत उम्मीदवारों की सूची सौंपने का दबाव भी वडिंग पर ही है. सचमुच अगर मालवा का यह किला फतह नहीं हुआ तो प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर खतरा मंडराना तय है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे पंजाब कांग्रेस की वो गुटबाजी मान रहे हैं, जहां दोस्त कम और टांग खींचने वाले ज्यादा नजर आते हैं !
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