Political popcorn: वोटर लिस्ट पर चली ‘कैंची’, 47 लाख नामों ने बढ़ाई सियासी गर्मी, किसका बिगड़ेगा गणित?

Political popcorn: दिल्ली में SIR के तहत करीब 47 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है.

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Political Popcorn

1.वोटर लिस्ट का ‘डाइट प्लान’!

राजधानी में मतदाता सूची का शुद्धिकरण !

​दिल्ली में चुनाव आयोग के ताजा मतदाता पुनरीक्षण SIR ने चुनावी रणबांकुरों के होश फाख्ता कर दिए हैं. करीब 47 लाख नाम सूची से हटने पर आम आदमी पार्टी और विपक्ष ने इसे 'लोकतंत्र की सर्जरी' बताकर मोर्चा खोल दिया है. सत्ता पक्ष का कहना है कि यह केवल मृत, स्थानांतरित और फर्जी प्रविष्टियों की छंटनी भर है. अलबत्ता, जमीन पर कार्यकर्ता यह सोचकर पसीना बहा रहे हैं कि उनका पक्का कैडर वाला मतदाता बचा है या विदा हो गया. सचमुच जब 47 लाख वोट कट जाएं तो दोनों ही खेमों की धड़कनें तेज होना लाजमी है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि यह कोई साधारण फेरबदल नहीं, बल्कि आने वाले संग्राम की पूरी बिसात बदलने वाला कदम साबित हो सकता है. अब यक्ष प्रश्न यही है कि इस डिजिटल सफाई से किसका चुनावी अंकगणित सुधरेगा और किसके समीकरण धड़ाम होंगे !

2.गठबंधन की ‘मीठी-खट्टी’ चाशनी !

महाराष्ट्र में निगम अध्यक्ष पदों की रेवड़ी !
  
​महाराष्ट्र के सत्ता-गलियारे ‘वर्षा’ बंगले की हलचल इन दिनों गजब का सियासी स्वाद दे रही है. 171 राज्य महामंडलों और निगमों में नियुक्तियों का फार्मूला तय करने के लिए तीनों दल दिन-रात माथापच्ची कर रहे हैं. संख्याबल के लिहाज से भले ही संतुलन सधा हुआ दिखे, मगर मलाईदार निगमों की मांग पर सबकी नजरें टिकी हैं. अंदरखाने यह चर्चा जोरों पर है कि ‘50:30:20’ का यह बंटवारा दिल से हुआ है या मजबूरी की मुस्कान है. अलबत्ता स्थानीय निकाय चुनावों से पहले सहयोगियों को खुश रखना रणनीतिक तौर पर बेहद जरूरी हो चुका है. सचमुच पद बांटने का हुनर ही गठबंधन की सबसे बड़ी फेविकोल की तरह काम आता है. राजनीतिक प्रेक्षक मुस्कुराते हुए कहते हैं कि दिल्ली तक इसकी मिठास और खटास साफ महसूस की जा रही है. ऐसे में प्रश्न यही है कि निगमों की मलाई पाकर सभी खेमों के बागी शांत होंगे या असंतोष का नया मोर्चा खुलेगा !

3.अफसर एक, कुर्सियां दो !

शक्तिमान बने बक्सर वाले डीएसपी!

​बिहार के प्रशासनिक महकमे में इन दिनों गृह विभाग के एक अजब-गजब कारनामे पर सचिवालय से लेकर थानों तक ठहाके गूंज रहे हैं. बक्सर वाले डीएसपी पंकज कुमार सिंह को विभाग के बाबूओं ने रातों-रात ऐसा 'शक्तिमान' बनाया कि 27 अफसरों की तबादला सूची में उनका नाम दो-दो बार चमका दिया गया. लिस्ट के 19वें नंबर पर उन्हें त्रिवेणीगंज (सुपौल) की कमान मिली, तो 25वें नंबर पर सहरसा सदर का एसडीपीओ बना डाला. अलबत्ता, फाइल दर्जनों टेबलों से गुजरी और आला अफसरों के दस्तखत भी हुए, लेकिन किसी को यह 'डबल रोल' दिखा ही नहीं. गलियारों में चुटकी ली जा रही है कि क्या साहब आधा दिन सुपौल और बाकी आधा दिन सहरसा में ड्यूटी बजाते? सचमुच जब फजीहत चरम पर पहुंची, तो आनन-फानन में लीपापोती करते हुए नया फरमान जारी हुआ कि 19 और 25 नंबर को छोड़कर बाकी सब रवानगी डालें. राजनीतिक प्रेक्षक हंसते हुए कह रहे हैं कि बाबूओं की ऐसी 'गलती से मिस्टेक' ने सुशासन की फाइलों का गजब मनोरंजन कर दिया है !

4.तीस सेकंड का बाण, विपक्ष परेशान!

रील के दौर में बेअसर हुई रवायती प्रेस कॉन्फ्रेंस?

​डिजिटल सियासत के अखाड़े में अब लंबे-लंबे भाषणों का नहीं, बल्कि 30 सेकंड की धारदार रीलों का दौर चल पड़ा है. सत्ता पक्ष की नई सोशल मीडिया टीम ने राहुल, अखिलेश और केजरीवाल पर ऐसे चुटीले और हल्के-फुल्के तंज कसे हैं कि विरोधी खेमे के तरकश में जवाब के तीर कम पड़ने लगे हैं. बिना किसी भारी-भरकम विवाद या गाली-गलौज के, सीधे जनमानस के जेहन में बात उतारने की यह नई कला खूब रंग ला रही है. अलबत्ता रवायती राजनीति के पन्नों पर बीजेपी का यह नया डिजिटल अध्याय पुराने ढर्रे के राजनेताओं की नींद उड़ा रहा है. सचमुच जब आधे मिनट का रचनात्मक वीडियो लाखों लोगों के मोबाइल में पैठ बना ले, तो घंटों चलने वाली उबाऊ प्रेस कॉन्फ्रेंस पानी मांगती नजर आती है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि डिजिटल नैरेटिव की इस जंग में विपक्ष फिलहाल बैकफुट पर दिखाई दे रहा है. ऐसे में विपक्षी रणनीतिकारों के सामने अब प्रश्न यही है कि इस सटीक डिजिटल प्रहार की काट वे पारंपरिक बयानों से निकालेंगे या खुद भी अपना कंटेंट और तेवर बदलेंगे ?

5.सहारनपुर से उठी चिंगारी, लखनऊ तक धुआं!

अखिलेश की नीतियों पर सवाल से गठबंधन में खलबली !

​उत्तर प्रदेश की सियासत में सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद के तीखे बोलों ने अपनी ही पार्टी के भीतर असहज स्थिति पैदा कर दी है. अखिलेश यादव की योजनाओं और राजनीतिक रुख पर मसूद की बेबाक टिप्पणियों ने सपा-कांग्रेस गठबंधन की सेहत पर सवालिया निशान लगा दिया है. प्रदेश के कई वरिष्ठ नेताओं ने मर्यादा और अनुशासन का पाठ पढ़ाते हुए अपनी शिकायतें सीधे दिल्ली दरबार तक पहुंचा दी हैं. नेताओं की दलील है कि इस तरह की बयानबाजी से विपक्षी एकता की धार कुंद होगी और दूसरे खेमे को बैठे-बिठाए सीधा चुनावी फायदा मिल जाएगा. अलबत्ता इमरान मसूद अपने खास सियासी तेवर और मिजाज के लिए जाने जाते हैं, जिन्हें पूरी तरह खामोश रखना नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगा. सचमुच चुनावी समर से पहले अगर साथी दलों के बीच बयानों का यह 'फ्रेंडली मैच' जारी रहा, तो इसका असर सीधे जमीन पर पड़ेगा. राजनीतिक प्रेक्षक इसे दोनों दलों के भीतर अपना सियासी वजन बढ़ाने की खींचतान बता रहे हैं !

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