1.कुनबा एक, राहें अनेक!
कांग्रेस की 'ड्राइविंग सीट' की चाहत में अधर में लटका 'इंडी' ब्लॉक !
विपक्षी एकता के बहुचर्चित मंच 'इंडिया' ब्लॉक की गाड़ी एक बार फिर पटरी से उतरती नजर आ रही है. 8 जून को दिल्ली में हुई बैठक में तय हुआ था कि हर दो महीने पर कुनबा जुटेगा और अगस्त के पहले हफ्ते में हैदराबाद में साझा रणनीति बनेगी, लेकिन सितंबर चढ़ने के बावजूद किसी ने बैठक की सुध तक नहीं ली. अलबत्ता दिल्ली की पिछली बैठक में भी गांठें साफ दिख रही थीं ममता बनर्जी तो पहुंची थीं, मगर डीएमके ने कांग्रेस पर 'गद्दारी' का तमगा लगाकर किनारा कर लिया था और अरविंद केजरीवाल भी नदारद रहे थे. अब क्षेत्रीय क्षत्रपों का मानना है कि 2024 के बाद कांग्रेस खुद को ड्राइविंग सीट पर देख रही है, जबकि राहुल गांधी के रणनीतिकार यह मान बैठे हैं कि जब मुख्य लड़ाई वे अकेले लड़ रहे हैं तो मंच साझा कर दूसरों को मुफ्त का क्रेडिट क्यों बांटा जाए. सचमुच गोवा से लेकर पंजाब और बिहार तक सहयोगियों के बीच बना अविश्वास का माहौल इस बात की गवाही दे रहा है कि न कोई संयोजक तय हो पाया और न ही औपचारिक सचिवालय. राजनीतिक प्रेक्षक इसे गठबंधन के बिखरते वजूद की नई इबारत मान रहे हैं. अब सियासी गलियारों में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही तैर रहा है कि जब हर कोई अपनी ढपली और अपना राग अलापने में जुटा है, तो 2029 की साझा बिसात आखिर बिछेगी किसके दम पर?
2.वोटर लिस्ट का सियासी 'शिफ्ट' !
पंजाब की ड्राफ्ट मतदाता सूची से राघव चड्ढा का नाम हटने पर गरमाई सियासत !
मोहाली की नई ड्राफ्ट मतदाता सूची में 'शिफ्टेड' श्रेणी का ऐसा ठप्पा लगा कि संसद से लेकर सोशल मीडिया तक भूचाल आ गया. राज्यसभा सांसद ने जहां इसे राजनीतिक बदले की भावना से जोड़ा, वहीं चुनाव प्रबंधन इसे नियमित तकनीकी सत्यापन बता रहा है. प्रशासनिक अमला अलबत्ता सफाई देने में जुटा है, लेकिन विपक्ष को बैठे-बिठाए एक तीखा मुद्दा मिल गया है. चुनावी तंत्र के डिजिटलाइजेशन के दौर में ऐसी चूक सचमुच चर्चा का विषय बन गई है. राजनीतिक गलियारों में यह यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि कागजी फेरबदल अनजाने में हुआ या इसके पीछे भी कोई रणनीतिक संकेत है !चड्ढा ने दो-टूक कहा कि जब से उन्होंने पार्टी छोड़ी है, तब से 'आप' का शीर्ष नेतृत्व गुस्से में जल रहा है और राज्य की प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग कर सियासी बदले की भावना से काम कर रहा है. उन्होंने तंज कसते हुए याद दिलाया कि पंजाब की वोटर लिस्ट किसी पार्टी की 'निजी जागीर' नहीं है. अलबत्ता, पलटवार में 'आप' ने सफाई दी कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव आयोग का काम है और इसमें राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं है.
3.ब्रिक्स की चौपाल और कूटनीति का इम्तेहान !
दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की तैयारियों के बीच वैश्विक कूटनीतिक हलचल !
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन की तैयारियों ने रायसीना हिल्स को व्यस्त कर दिया है. भारत की अध्यक्षता में ग्लोबल साउथ की आवाज को बुलंद करने की पूरी तैयारी है. अलबत्ता पश्चिम एशिया के बदलते समीकरणों के बीच संतुलन साधना किसी रस्सी पर चलने जैसा है. कूटनीतिक हलकों में इसे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की बड़ी जीत बताया जा रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक भी मान रहे हैं कि वैश्विक मंच पर भारत की यह मौजूदगी सचमुच प्रभावकारी है. अब प्रश्न यह है कि बहुध्रुवीय दुनिया के इस मंच से साझा घोषणापत्र पर आम सहमति कैसे बनती है !
4.साहब का 'बेमन' सचिवालय और फेरबदल की सुगबुगाहट!
लुटियंस की गलियों में सेक्रेटरी साहब का उचटा मन !
केंद्रीय सचिवालय के गलियारों से छनकर आ रही एक खबर ने नौकरशाही के भीतर खासी हलचल मचा दी है. केंद्र सरकार में अहम ओहदे पर तैनात एक वरिष्ठ सचिव महोदय का अपने मौजूदा मंत्रालय में बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा है. अंदरखाने चर्चा है कि फाइलों के बोझ और विभाग की मौजूदा कार्यशैली से साहब इस कदर ऊब चुके हैं कि उन्होंने सीधे शीर्ष नीति-निर्माताओं के दरबार में अर्जी लगा दी है. साहब की ख्वाहिश साफ है किसी तरह विभाग का तख्ता पलट जाए और उन्हें मनमाफिक नया ठिकाना मिल जाए. अलबत्ता प्रशासनिक संतुलन बनाए रखना पहली प्राथमिकता है, इसलिए फिलहाल उनकी अर्जी पर खामोशी बरती जा रही है. सचमुच जब बड़े कद के अफसर का ही मन उचट जाए तो तंत्र की रफ्तार पर सवाल उठना लाजिमी है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे जल्द होने वाले संभावित उच्चस्तरीय फेरबदल की पहली आहट मान रहे हैं. अब गलियारों में यही प्रश्न तैर रहा है कि साहब की यह गुहार कब तक सुनी जाएगी या फिर उन्हें इसी कुर्सी पर दिल लगाने का सलीका सीखना होगा !
5.लाल किले में दो फाड़!
लाल झंडों में आर-पार, 'उप नेता प्रतिपक्ष' की कुर्सी पर अड़ी सीपीआई !
केरल में पूरे एक दशक तक सत्ता का सुख भोगने के बाद लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट एलडीएफ के सत्ता से बेदखल होते ही लाल कुनबे में सिर-फुटौव्वल शुरू हो गई है. 140 सीटों वाली विधानसभा में महज 35 पर सिमटे वाम मोर्चे में अब पदों की बंदरबांट को लेकर तलवारें खिंच चुकी हैं. पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी तो संभाल ली, लेकिन सीपीएम अब उप नेता प्रतिपक्ष का ओहदा भी अपने ही पास रखना चाहती है. अलबत्ता आठ विधायकों वाली सीपीआई ने 'सामूहिक नेतृत्व' का लाल झंडा लहराते हुए इस पद पर अपनी दावेदारी ठोक दी है और 'बड़े भाई' के एकाधिकार को खुली चुनौती दे दी है. सरकार में रहते हुए भी पीएम-श्री योजना से लेकर फंड तक के मुद्दे पर दोनों में तल्खी जगजाहिर थी, जो अब विपक्ष की बेंचों पर आते ही खुलकर सतह पर आ गई है. सचमुच 26 और आठ के इस सियासी अनुपात ने वर्षों पुराने गठजोड़ की नींव हिला दी है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि जनादेश गंवाने के बाद यह आपसी तकरार वाम राजनीति को और हाशिए पर धकेल सकती है. अब तिरुवनंतपुरम के सियासी गलियारों में यह प्रश्न गूंज रहा है कि हार के सदमे से उबरने के बजाय आपस में उलझे ये दोनों दल विपक्ष का धर्म कैसे निभाएंगे भाई ?
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