Political Popcorn: कहीं कुर्सी की जंग, कहीं कूटनीति पर संग्राम... सियासत के गलियारों में हलचल तेज

यूपी की क्विक रिस्पांस टीम से लेकर BRICS पर कांग्रेस की तकरार, उद्धव-शिंदे की बयानबाजी और बिहार-हिमाचल की सियासी हलचल तक... सियासत के गलियारों में हलचल तेज, पढ़ें ‘Political Popcorn’

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Political Popcorn

1. कौवा कान ले गया तो कान देखें या कौवा दौड़ाएं?

यूपी में नैरेटिव की काट, भाजपा की 'क्विक रिस्पांस टीम' का मैदान में शंखनाद!

उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में नैरेटिव की लड़ाई अब डिजिटल मोर्चे पर लड़ी जाने लगी है. सत्ता पक्ष ने विपक्ष के तीखे हमलों और सोशल मीडिया प्रचार की काट निकालने के लिए 'क्विक रिस्पांस टीम' उतारने की रणनीति बनाई है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे चुनावी बिसात पर खुद को आगे रखने की चाक-चौबंद कोशिश बता रहे हैं. अलबत्ता विपक्ष के साइबर वार के सामने यह टीम कितना असरदार ढाल बन पाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा. सरकार अपनी योजनाओं के रिपोर्ट कार्ड को लेकर सचमुच पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही है. उधर विरोधी खेमा इसे सत्ता पक्ष की घबराहट करार देने में लगा है. अब यक्ष प्रश्न यही है कि जनता को रिझाने में किसका एल्गोरिदम ज्यादा असरदार साबित होगा?

2. अंगूर खट्टे हैं या फिर कूटनीति के फल मीठे हैं?

ब्रिक्स सम्मेलन पर छिड़ा दंगल, कांग्रेस के भीतर ही चिदंबरम और थरूर आमने-सामने!

राजधानी दिल्ली में ब्रिक्स की मेजबानी को लेकर विदेशी मेहमानों का जमावड़ा लगा हुआ है, लेकिन इस पर घरेलू राजनीति भी खूब सुलग रही है. कांग्रेस के दो दिग्गज पी. चिदंबरम और शशि थरूर ब्रिक्स के नफे-नुकसान को लेकर आपस में ही उलझ पड़े. एक नेता ने वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को बड़ा मौका बताया तो दूसरे ने पूछ लिया कि हासिल क्या हुआ. राजनीतिक प्रेक्षक इसे पार्टी के आंतरिक वैचारिक मंथन का रंग-बिरंगा नजारा मान रहे हैं. अलबत्ता विदेश नीति के इस मामले पर सत्ता पक्ष चुपचाप मुस्कराते हुए तालियां बजा रहा है. सचमुच जब अपने ही घर में दो अलग सुर गूंजने लगें तो बाहर वालों को तंज कसने का बहाना मिल जाता है. अब प्रश्न यही है कि इस कूटनीतिक आयोजन की साख घरेलू राजनीति के चश्मे से आंकी जाएगी या देश के बढ़ते कद से?

3. शेर कौन और लोमड़ी कौन, जंगलराज में सब हैरान!

उद्धव और शिंदे गुट के बीच तंजबाजी का नया एपिसोड ऑन-एयर!

मुंबई की सड़कों से लेकर टीवी डिबेट्स तक उद्धव और शिंदे गुट के बीच तंजबाजी का नया एपिसोड ऑन-एयर हो चुका है. उद्धव के 'ऑपरेशन टाइगर' वाले ताने पर शिंदे सेना ने दो टूक जवाब देते हुए कहा कि जनता अच्छे से जानती है कि शेर कौन है ?राजनीतिक प्रेक्षक इस तीखी बयानबाजी को कैडर का मनोबल ऊंचा बनाए रखने की कसरत मान रहे हैं. अलबत्ता सत्ता पक्ष विकास योजनाओं और बुनियादी ढांचे के दम पर जनता को साधने का दावा कर रहा है. सचमुच बालासाहेब की विरासत पर दावेदारी की यह लड़ाई दिन-ब-दिन और ज्यादा व्यक्तिगत होती जा रही है. अब यक्ष प्रश्न यह है कि जनता किस गुट के दहाड़ने पर मुहर लगाएगी और किसे सिर्फ कागजी गर्जना समझेगी?

4. तीर के तरकश से नया नाम या पुराने साथी का पत्ता साफ?

पटना से दिल्ली तक कुर्सी की रार.. सहयोगी दल के कोटे में हलचल!

​दिल्ली के सत्ता गलियारों में होने वाले संभावित कैबिनेट विस्तार की चर्चा ने बिहार के राजनीतिक तापमान को अचानक बढ़ा दिया है. सूबे की सत्ताधारी पार्टी के भीतर एक खास पद के लिए लॉबिंग का खेल चरम पर पहुंच चुका है. दिल्ली दरबार में पैठ रखने वाले एक तेज-तर्रार रणनीतिकार का नाम रेस में सबसे आगे तैर रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि अगर इस नए चेहरे की ताजपोशी हुई, तो वर्तमान में मंत्री पद संभाल रहे कद्दावर पुराने सिपहसालार की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है. अलबत्ता पार्टी का एक खेमा इसे संगठन और सत्ता के बीच संतुलन साधने की कवायद बता रहा है. दोनों दिग्गजों के समर्थक अंदरखाने सचमुच अपनी-अपनी गोटी सेट करने में जी-जान से जुटे हैं. अब यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि पटना के 'सुप्रीम कमांडर' की हरी झंडी और रजामंदी की अंतिम मुहर किसके नाम पर लगती है.

5. पहाड़ों में गिरी सियासी बर्फ या दिल्ली दरबार से आई गर्म हवा?

आलाकमान ने ली सरकार की क्लास, संगठन बनाम सत्ता की रार तेज!

​देवभूमि की ठंडी वादियों में सियासी पारा उस वक्त अचानक उबल पड़ा, जब शिमला जिला परिषद की गद्दी पर पूरे 26 साल बाद विरोधी खेमे ने अपना परचम लहरा दिया. अपने ही मजबूत गढ़ में लगी इस अप्रत्याशित सेंध से दिल्ली दरबार में बैठे कर्ता-धर्ताओं के तेवर बेहद तल्ख हो गए हैं. राजनीतिक प्रेक्षक इसे महज एक निकाय चुनाव की हार नहीं, बल्कि प्रशासनिक पकड़ और जमीनी पकड़ के ढीले होने का संकेत मान रहे हैं. अलबत्ता सत्ता पक्ष इसे स्थानीय समीकरणों का फेर बताकर डैमेज कंट्रोल में जुटा है, लेकिन प्रदेश संगठन का असंतुष्ट खेमा पहले से ही त्योरियां चढ़ाए बैठा था. प्रभारी महोदया द्वारा दिल्ली तलब कर दी गई नसीहतों ने यह साफ कर दिया है कि भीतरखाने सचमुच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा. सरकार और संगठन की इस नूरा-कुश्ती का सीधा असर अब चुनावी नतीजों में दिखने लगा है. अब प्रश्न यही बना हुआ है कि क्या मुख्यमंत्री अपनी सियासी बिसात से दिल्ली दरबार में खोई साख को दोबारा हासिल कर पाएंगे या यह अंतर्कलह आने वाले दिनों में और गुल खिलाएगी.

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