1.एक तीर, दो निशाने?
‘एक देश, एक चुनाव’ पर रिपोर्ट कार्ड जारी: क्या 2029 की तैयारी अभी से मुकम्मल है?
संसद के गलियारों में ‘एक देश, एक चुनाव’ पर बनी संयुक्त संसदीय समिति की बैठकों के बाद ताजा सर्वे चर्चा में है. अलबत्ता जनता का एक बड़ा तबका लगातार चुनावी आचार संहिता के फेर से राहत चाहता है, पर सियासी गणित इतना सीधा नहीं है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस दूरदर्शी सोच ने देश में बार-बार होने वाले चुनावों के भारी-भरकम वित्तीय बोझ और नीतिगत ठहराव को खत्म करने का एक बेहद मजबूत और व्यावहारिक रोडमैप सामने रखा है. उनके इस साहसिक प्रशासनिक सुधार को आर्थिक सुधारों की अगली बड़ी छलांग माना जा रहा है, जिसकी तारीफ उद्योग जगत और आम करदाता भी दबी जुबान में कर रहे हैं. सचमुच, जब मोदी किसी बड़े सुधार का बीड़ा उठाते हैं, तो उनकी कार्यशैली विरोधियों के संशय को दरकिनार कर विकास की गति को निर्बाध बनाए रखने पर केंद्रित रहती है. विपक्ष भले ही इसे क्षेत्रीय अस्मिताओं की चौखट पर चोट ठहराए, मगर सरकार का स्पष्ट मानना है कि राष्ट्रहित में नीतिगत निरंतरता सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. अब यक्ष प्रश्न अपनी जगह कायम है कि क्या सभी सूबों के क्षत्रप इस राष्ट्रव्यापी सुधार के साथ कदमताल करने को सहज तैयार होंगे या केवल अपनी सियासत साधेंगे !
2.राजभवनों की हलचल पर नजरें!
राज्यपाल बनाम राज्य सरकारें: संघीय ढांचे पर फिर गरमाई बहस!
गैर-भाजपा शासित राज्यों और राजभवनों के बीच विधेयकों की मंजूरी को लेकर चला आ रहा शीतयुद्ध एक बार फिर सुर्खियों में है. अलबत्ता संवैधानिक पदों पर बैठे लोग इसे नियमों और प्रक्रियाओं का पालन बता रहे हैं, जबकि सूबों के मुख्यमंत्री इसे निर्वाचित सरकारों के अधिकारों पर ब्रेक करार देते हैं,राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि यह टकराव नया नहीं है मगर हाल के दिनों में इसकी आवृत्ति कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है. सचमुच अदालतों की चौखट तक पहुंचते इन मामलों ने नौकरशाही को भी संशय में डाल रखा है. अब प्रश्न यह है कि संघवाद की इस गाड़ी को पटरी पर रखने के लिए दोनों पक्ष संवाद की मेज पर कब बैठेंगे या फिर कानून की किताबों से ही नए रास्ते तलाशे जाएंगे ?
3.अंदर आग, बाहर धुआं!
कांग्रेस में ‘ऑल इज वेल’ की तलाश: दिल्ली में डांट, पंजाब में ‘स्लीपर सेल’ और हरियाणा की चौपाल पर रार!
कांग्रेस आलाकमान एकजुटता का शंखनाद करने की पूरी कोशिश कर रहा है, लेकिन राज्यों से लेकर दिल्ली दरबार तक सुलगती अंतर्कलह की चिंगारियां अब दबी नहीं रह पा रहीं. दिल्ली में मल्लिकार्जुन खरगे की नाराजगी पर राहुल गांधी की खुली मुहर ने जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में पवन खेड़ा और राजेंद्र पाल गौतम के पसीने छुड़ा दिए, तो संदेश साफ गया कि अब ढिलाई पर खरी-खोटी बंद कमरों तक सीमित नहीं रहेगी. सचमुच, शीर्ष नेतृत्व की यह सख्ती नीचे पहुंचते-पहुंचते और उलझ गई है, पंजाब में राजा वडिंग के ‘स्लीपर सेल’ वाले तीर ने सुखजिंदर रंधावा को आलाकमान के दर पर शिकायत की अर्जी लगाने को मजबूर कर दिया, जिसका सीधा फायदा सत्ताधारी खेमा उठाने को तैयार बैठा है. उधर हरियाणा में प्रभारी संजय दत्त की ‘चौपाल योजना’ पर कुमारी शैलजा खेमे की असहजता ने यह साफ कर दिया है कि पुराने चुनावी घाव अभी भरे नहीं हैं. राजनीतिक प्रेक्षक चुटकी ले रहे हैं कि गांव-गांव तक पहुंचने से पहले पार्टी को अपने ही दिग्गजों के बीच का फासला पाटना होगा. अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि राहुल की सार्वजनिक फटकार और प्रभारियों की समझाइश नेताओं की इस आपसी तलवारबाजी को म्यान में ला पाएगी या चुनावी बिसात बिछने से पहले ही खेल बिगड़ जाएगा !
4.गठबंधन में 'दोस्ती' या अपनी-अपनी 'दुकान'?
सपा के PDA के सामने कांग्रेस का BMD दांव: यूपी में साधे जा रहे पुराने सिपहसालार!
गठबंधन के मंचों से दोनों दल साथ चलने की कसमें खा रहे हैं, लेकिन लखनऊ से दिल्ली तक अंदरूनी चालें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं. उत्तर प्रदेश में अपनी खोई सियासी जमीन तलाशने के लिए कांग्रेस ने अब अपने पुराने और पारंपरिक 'ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित' यानी BMD फॉर्मूले को फिर से तराशना शुरू कर दिया है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे अखिलेश यादव के चर्चित PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) एजेंडे के सामने कांग्रेस की अपनी स्वतंत्र चौखट खड़ी करने की कोशिश मान रहे हैं, जहां कार्यकर्ताओं को इन वर्गों के बीच जाकर अपनी पुरानी वफादारी याद दिलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. सचमुच गठबंधन की मर्यादाओं के बीच जमीनी जनाधार को अपने पाले में खींचने की यह चुपचाप हो रही कसरत यह बताने के लिए काफी है कि बड़े चुनावों से पहले हर कोई अपना स्वतंत्र दायरा बड़ा करना चाहता है. अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि कागजों पर बनी यह चुनावी साझेदारी क्या जमीन पर एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगाए बिना बरकरार रह पाएगी या सीटों की सौदेबाजी से पहले शक्ति प्रदर्शन का यह दौर नए मतभेद पैदा करेगा !
5.पश्चिम से पूरब तक सियासी चक्रव्यूह!
मुस्लिम वोटों पर ओवैसी की नजर, तो पश्चिम में गुर्जर बनाम जाट उलझन: डगमगाती साइकिल के इम्तिहान!
सपा के लिए आने वाले दिन आसान नहीं दिख रहे, क्योंकि चुनावी चौसर पर एक तरफ बाहरी चुनौती खड़ी हो रही है तो दूसरी तरफ अंदरूनी सामाजिक समीकरणों में गांठ पड़ रही है. बबीना के पूर्व विधायक अब्दुल मन्नान समेत AIMIM नेताओं को सपा में शामिल कराने के बाद असदुद्दीन ओवैसी ने पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक तीखे तेवरों के साथ मोर्चा खोलने का मन बना लिया है, जिससे मुस्लिम वोटों के बिखराव का खतरा सीधे अखिलेश यादव की चिंताएं बढ़ा रहा है. अलबत्ता मुश्किल केवल बाहर की नहीं है..सहारनपुर से उठी गुर्जर बनाम जाट की रस्साकशी ने पश्चिमी यूपी में स्थानीय संतुलन को हिला दिया है, जहां धीरपाल जैसे कद्दावर नेताओं की अनदेखी से समाज का एक धड़ा बेहद असहज नजर आ रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक साफ देख रहे हैं कि पश्चिम में जाट और गुर्जर दोनों को साधे बिना साइकिल की रफ्तार बरकरार रखना टेढ़ी खीर है. सचमुच स्थानीय नेताओं की आपसी होड़ ने शीर्ष नेतृत्व के लिए आग बुझाने का नया काम खड़ा कर दिया है. अब प्रश्न यही है कि क्या अखिलेश खुद मैदान में उतरकर नाराज क्षत्रपों को साध पाएंगे और ओवैसी के आक्रामक हमलों के बीच अपने कोर वोट बैंक को एकजुट रख पाएंगे ?