भारतीय जनसंघ के संस्थापक और प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई. इस खास मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें याद करते हुए एक विस्तृत लेख लिखा, जिसमें उन्होंने डॉ. मुखर्जी के व्यक्तित्व, राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका और उनके सिद्धांतों को विस्तार से रेखांकित किया. प्रधानमंत्री ने कहा कि डॉ. मुखर्जी का पूरा जीवन ज्ञान, साहस, राष्ट्रभक्ति और जनसेवा के प्रति समर्पण का उदाहरण रहा. उन्होंने भारत की एकता और विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और इसी उद्देश्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया.
Today, on the 125th Jayanti of Dr. Syama Prasad Mookerjee, I bow to one of India's most remarkable nation-builders, whose life was defined by scholarship, courage and an unwavering commitment to national service. He dedicated himself to the cause of India's unity, dignity and…
— Narendra Modi (@narendramodi) July 6, 2026
भारत की अखंडता डॉ. मुखर्जी का सबसे बड़ा संकल्प
अपने लेख में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यदि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन को एक विचार में समेटा जाए तो वह भारत की अखंडता का संकल्प था. उन्होंने कहा कि देश की एकता और संप्रभुता को मजबूत करना ही उनके सार्वजनिक जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य था. पीएम मोदी ने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A को हटाने का फैसला डॉ. मुखर्जी के लंबे संघर्ष और बलिदान को सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में देखा जा सकता है. उनके अनुसार, यह निर्णय उस विचारधारा को आगे बढ़ाने वाला कदम था, जिसके लिए डॉ. मुखर्जी लगातार आवाज उठाते रहे.
'भारत की एकता और प्रगति के लिए समर्पित जीवन' -PM मोदी
प्रधानमंत्री ने अपने लेख में लिखा कि इतिहास में कुछ ऐसे अवसर आते हैं, जब किसी व्यक्ति का बलिदान केवल राजनीतिक घटना नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का स्थायी हिस्सा बन जाता है. उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी का जीवन और उनका अंतिम बलिदान ऐसे ही प्रेरणादायक अध्यायों में शामिल है. प्रधानमंत्री के अनुसार, डॉ. मुखर्जी का योगदान केवल अपने समय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आज भी उनकी सोच देश के विकास और राष्ट्रीय एकता के लिए प्रेरणा देती है.
Penned an Op-Ed on Dr. Syama Prasad Mookerjee's life, emphasising his diverse accomplishments, be it Vice Chancellor, Minister, political leader and more. Highlighted his unparalleled efforts in boosting India's unity. The removal of Articles 370 and 35(A) in 2019 remains a…
— Narendra Modi (@narendramodi) July 6, 2026
सुविधाजनक जीवन छोड़ राष्ट्रसेवा का रास्ता चुना
पीएम मोदी ने डॉ. मुखर्जी के निजी जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रतिष्ठित शिक्षाविद् सर आशुतोष मुखर्जी के परिवार से होने के बावजूद उन्होंने आरामदायक जीवन के बजाय सार्वजनिक सेवा को चुना. उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत जीवन में कई कठिन परिस्थितियों और पारिवारिक दुखों का सामना करने के बाद भी डॉ. मुखर्जी का राष्ट्र के प्रति समर्पण कभी कम नहीं हुआ. विभाजन के दौर में पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाए रखने के प्रयास हों या फिर जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर उनका स्पष्ट रुख, उन्होंने हर परिस्थिति में राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी.
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के पक्षधर थे डॉ. मुखर्जी
प्रधानमंत्री ने अपने लेख में डॉ. मुखर्जी को शिक्षा क्षेत्र का दूरदर्शी सुधारक बताया. उन्होंने याद दिलाया कि कम उम्र में ही वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने और शिक्षा व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण बदलावों की शुरुआत की. उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान, पुस्तकालयों के आधुनिकीकरण, कृषि शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और विद्यार्थियों के समग्र विकास को बढ़ावा दिया. प्रधानमंत्री ने डॉ. मुखर्जी के उस विचार का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी करने वाले लोगों को तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक बनाना होना चाहिए जो समाज और राष्ट्र का नेतृत्व कर सकें.
औद्योगिक विकास की मजबूत नींव रखने का श्रेय
प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में डॉ. मुखर्जी के योगदान को भी रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि देश के औद्योगिक विकास की शुरुआती आधारशिला रखने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. दामोदर घाटी निगम, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और कई औद्योगिक परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इन पहलों ने आधुनिक भारत के औद्योगिक विकास को नई दिशा दी. उन्होंने यह भी बताया कि उनकी सरकार ने वर्षों से बंद पड़े सिंदरी उर्वरक संयंत्र को दोबारा शुरू किया, जो आत्मनिर्भर भारत की सोच को मजबूत करने वाला कदम है.
सिद्धांतों से समझौता नहीं किया
प्रधानमंत्री ने कहा कि डॉ. मुखर्जी लोकतांत्रिक संवाद और स्वस्थ बहस में विश्वास रखते थे. वैचारिक मतभेदों के बावजूद उन्होंने स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में शामिल होकर राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया. हालांकि, जब उन्हें लगा कि कुछ राष्ट्रीय मुद्दों पर उनके सिद्धांतों से समझौता हो रहा है, तब उन्होंने मंत्री पद छोड़ने का फैसला किया. प्रधानमंत्री ने इसे इस बात का उदाहरण बताया कि डॉ. मुखर्जी ने हमेशा पद से अधिक अपने सिद्धांतों को महत्व दिया. उन्होंने प्रथम संविधान संशोधन के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर डॉ. मुखर्जी द्वारा जताई गई चिंताओं का भी उल्लेख किया और कहा कि बाद की कई घटनाओं ने उन आशंकाओं को सही साबित किया.
मानवीय सेवा के कार्यों को भी किया याद
राजनीतिक योगदान के अलावा प्रधानमंत्री ने डॉ. मुखर्जी के सामाजिक और मानवीय कार्यों का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि 1943 के बंगाल अकाल और 1942 के मेदिनीपुर चक्रवात के दौरान उन्होंने राहत कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई और संकट की घड़ी में लोगों की मदद के लिए आगे आए. प्रधानमंत्री के अनुसार, डॉ. मुखर्जी केवल एक राजनेता नहीं बल्कि समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता रखने वाले जनसेवक भी थे.
युवाओं को दिया कर्म और समर्पण का संदेश
अपने लेख के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने युवाओं के लिए डॉ. मुखर्जी के संदेश को याद किया. उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी का मानना था कि जो भी कार्य हाथ में लिया जाए, उसे पूरी ईमानदारी, लगन और उत्कृष्टता के साथ पूरा किया जाना चाहिए. प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि देश का युवा वर्ग डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आदर्शों से प्रेरणा लेकर एक मजबूत, आत्मनिर्भर, एकजुट और संवेदनशील भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
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