PM Modi Foreign Policy: दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच बढ़ती खींचतान और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त व्यापार नीति के दौर में भारत अपनी विदेश नीति को एक नए तरीके से आकार देता नजर आ रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत पिछले एक साल में अलग-अलग देशों के साथ व्यापार, निवेश, रक्षा, टेक्नोलॉजी और रणनीतिक सहयोग के मोर्चे पर लगातार नए रिश्ते मजबूत कर रहा है. अब अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी प्रधानमंत्री मोदी की इस रणनीति पर विस्तार से चर्चा की है.
NYT के विश्लेषण में बताया गया है कि भारत ने पिछले एक साल में जिस तरह अपनी वैश्विक साझेदारियों का दायरा बढ़ाया है, उसे केवल सामान्य कूटनीतिक सक्रियता के तौर पर नहीं देखा जा सकता. प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं और विभिन्न देशों के साथ हुए समझौतों में खास आर्थिक और रणनीतिक लक्ष्यों पर जोर दिखाई देता है. यही नेटवर्क भविष्य में भारत को किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर होने से बचाने में मदद कर सकता है.
NYT 's analysis is good about how our Prime Minister Sh @narendramodi is travelling and signing agreements with different countries across the world but conclusions drawn are wrong that it's against USA and @realDonaldTrump . INDIA is a sovereign country and is free to trade and… https://t.co/3RZC3ukHzd
— Shesh Paul Vaid (@spvaid) August 31, 2026
ट्रंप की नीति के बीच भारत ने बढ़ाए अपने विकल्प
भारत और अमेरिका के संबंधों में व्यापार और टैरिफ जैसे मुद्दों को लेकर उतार-चढ़ाव के बीच नई दिल्ली ने अपने विकल्प सीमित नहीं किए हैं. भारत का संदेश यह रहा है कि किसी भी देश के साथ संबंध उसके राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय होंगे. जम्मू-कश्मीर के पूर्व DGP शेष पॉल वैद ने भी NYT के विश्लेषण पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दुनिया के अलग-अलग देशों के साथ समझौते करना अमेरिका या ट्रंप प्रशासन के खिलाफ कदम नहीं है. उनके मुताबिक भारत एक संप्रभु देश है और अपने विकास, आर्थिक हितों और रणनीतिक जरूरतों के हिसाब से साझेदारियां करने के लिए स्वतंत्र है. यही इस पूरी रणनीति का अहम पहलू है. भारत किसी एक धड़े के साथ खड़े होने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने हितों के मुताबिक रिश्ते मजबूत कर रहा है.
एक साल में 20 देशों की यात्रा
NYT के मुताबिक अगस्त 2025 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कम से कम 20 देशों का दौरा कर चुके हैं, जबकि करीब 13 देशों के शीर्ष नेता भारत आए हैं. इन यात्राओं को महज औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम के बजाय ठोस आर्थिक और रणनीतिक लक्ष्यों से जोड़कर देखा गया है.
इन मुलाकातों के दौरान व्यापार समझौतों, निवेश, रक्षा तकनीक, ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, समुद्री सुरक्षा और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर जोर दिया गया. इसका मकसद साफ है भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था और रणनीतिक व्यवस्था में ज्यादा मजबूत स्थिति दिलाना.
ब्रिटेन के साथ FTA से व्यापार को नई ताकत
भारत और ब्रिटेन के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट इस रणनीति की बड़ी उपलब्धियों में से एक के तौर पर सामने आया है. इस समझौते से दोनों देशों के बीच बड़ी संख्या में उत्पादों पर टैरिफ कम या खत्म होने की उम्मीद है. भारतीय उत्पादों के लिए ब्रिटिश बाजार में पहुंच आसान होने और ब्रिटेन से आने वाले उत्पादों पर भारतीय शुल्क में कमी से दोनों देशों के कारोबार को गति मिलने की संभावना है. लंबे समय में इस समझौते से द्विपक्षीय व्यापार में बड़ी बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है. भारत के लिए ऐसे समझौते केवल निर्यात बढ़ाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की रणनीति का भी हिस्सा हैं.
यूरोपीय संघ के साथ लंबे इंतजार के बाद बड़ी कामयाबी
भारत और यूरोपीय संघ के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के लिए लंबे समय से चल रही बातचीत में जनवरी 2026 में महत्वपूर्ण प्रगति हुई. यूरोपीय संघ भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है, इसलिए दोनों के बीच व्यापारिक रिश्तों को और मजबूत करना भारत के लिए बेहद अहम है. यूरोपीय बाजार तक बेहतर पहुंच भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर खोल सकती है. वहीं यूरोप के लिए भारत एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में महत्वपूर्ण है. ऐसे में यह साझेदारी सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा के नजरिए से भी अहम हो जाती है.
फ्रांस के साथ AI और रणनीतिक तकनीक पर फोकस
भारत और फ्रांस ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रिसर्च, इनोवेशन, शिक्षा और अत्याधुनिक तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया है. दोनों देशों के बीच रणनीतिक रिश्ते अब पारंपरिक रक्षा सहयोग से आगे बढ़कर नई तकनीकों और वैश्विक चुनौतियों तक पहुंच रहे हैं. AI जैसी उभरती तकनीक भविष्य की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने वाली है. ऐसे में फ्रांस के साथ भारत का सहयोग नई दिल्ली को तकनीकी मोर्चे पर वैश्विक साझेदारियों का मजबूत नेटवर्क बनाने में मदद कर सकता है.
EFTA देशों से निवेश और रोजगार का लक्ष्य
नॉर्वे समेत EFTA देशों के साथ भारत की आर्थिक साझेदारी भी इस व्यापक रणनीति का हिस्सा है. EFTA देशों की ओर से भारत में बड़े निवेश का लक्ष्य रखा गया है, जिसका उद्देश्य आने वाले वर्षों में निवेश के साथ रोजगार के अवसर बढ़ाना है. भारत के लिए विदेशी निवेश केवल पूंजी जुटाने का जरिया नहीं है. इसका लक्ष्य मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और रोजगार के जरिए घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करना भी है.
दक्षिण कोरिया के साथ जहाज निर्माण पर बड़ा फोकस
दक्षिण कोरिया के साथ भारत की साझेदारी एक ऐसे क्षेत्र में आगे बढ़ रही है, जिसे भारत अपनी औद्योगिक रणनीति के लिए महत्वपूर्ण मानता है-जहाज निर्माण. कोरिया की अत्याधुनिक शिपबिल्डिंग विशेषज्ञता और भारत की बढ़ती औद्योगिक क्षमता का मेल दोनों देशों के लिए बड़ा अवसर बन सकता है. भारत 2047 तक दुनिया के प्रमुख जहाज निर्माण केंद्रों में शामिल होने का लक्ष्य रखता है. ऐसे में दक्षिण कोरिया के साथ तकनीकी और औद्योगिक सहयोग इस लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
जर्मनी से रक्षा तकनीक
भारत की यूरोपीय साझेदारियों में जर्मनी भी अहम भूमिका निभा रहा है. NYT के विश्लेषण में जर्मन पनडुब्बी तकनीक से जुड़े सहयोग को खास तौर पर महत्वपूर्ण बताया गया है. भारत अपनी नौसैनिक क्षमता और रक्षा आत्मनिर्भरता को बढ़ाने पर लगातार जोर दे रहा है, ऐसे में अत्याधुनिक तकनीक तक पहुंच रणनीतिक रूप से अहम है. दूसरी ओर न्यूजीलैंड के साथ भारत का सहयोग समुद्री सुरक्षा और व्यापार के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है. इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री मार्गों की बढ़ती अहमियत के बीच यह साझेदारी भारत की व्यापक समुद्री रणनीति से जुड़ती है.
जापान और ऑस्ट्रेलिया भी भारत की रणनीति के अहम हिस्से
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में जापान और ऑस्ट्रेलिया भारत के महत्वपूर्ण साझेदार हैं. दोनों देशों के साथ भारत के संबंध आर्थिक और व्यापारिक सहयोग से आगे बढ़कर समुद्री सुरक्षा, टेक्नोलॉजी और क्षेत्रीय रणनीति तक पहुंच चुके हैं. यह साझेदारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इंडो-पैसिफिक में चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच भारत अपने रणनीतिक विकल्पों को व्यापक रखना चाहता है. अलग-अलग देशों के साथ समानांतर रिश्ते भारत को किसी एक शक्ति पर निर्भर रहने से बचाते हैं.
‘मेलोडी’ टॉफी में भी NYT ने देखा कूटनीतिक संदेश
प्रधानमंत्री मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी की मुलाकात के दौरान ‘मेलोडी’ टॉफी का पैकेट भेंट करने का छोटा-सा वाकया भी NYT के विश्लेषण में चर्चा का हिस्सा बना. देखने में यह एक सामान्य और हल्का-फुल्का पल था, लेकिन इसके पीछे भारत की व्यापक कूटनीतिक रणनीति की तस्वीर देखी गई. भारत की रणनीति का मूल संदेश यही है कि नई दिल्ली अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहती. व्यापार हो, रक्षा हो, ऊर्जा हो या तकनीक-भारत अलग-अलग साझेदारों के साथ अपने विकल्प बढ़ा रहा है.
क्या मोदी की रणनीति ट्रंप के खिलाफ है?
इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ भारत-अमेरिका रिश्तों के संदर्भ में देखना शायद तस्वीर को छोटा कर देगा. प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति का फोकस किसी एक देश के खिलाफ गठजोड़ बनाना नहीं, बल्कि भारत के लिए अधिकतम रणनीतिक विकल्प तैयार करना दिखाई देता है. अमेरिका भारत का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है, लेकिन भारत यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि वैश्विक राजनीति में किसी एक सरकार के फैसले से उसके आर्थिक या रणनीतिक हित प्रभावित न हों. यही वजह है कि भारत एक साथ अमेरिका, यूरोप, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और अन्य देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है.
भारत अब दुनिया के ‘चुनने’ का इंतजार नहीं कर रहा
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी तस्वीर यही है कि भारत अब केवल किसी बड़े शक्ति समूह का हिस्सा बनने की कोशिश नहीं कर रहा. वह अपनी जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग देशों के साथ रिश्तों का ऐसा नेटवर्क तैयार कर रहा है, जिसमें व्यापार, निवेश, रक्षा, तकनीक, ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा और मैन्युफैक्चरिंग सभी शामिल हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स का विश्लेषण इसी बदलाव की ओर इशारा करता है.
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